Family · Hindi

बरसात की वह रात

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Part 4

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उसके जीवन में मैंने विद्या की जगह ले ली थी। “शायद इंसान की पहचान सिर्फ नाम और रूप से नहीं होती। कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसी भूमिका दे देती है, जिसमें हम खुद को नए तरीके से पहचानने लगते हैं।”मैंने खुद से कहा,
उस दिन से मैंने तय कर लिया कि अगर मैं इस परिवार का हिस्सा बनकर रहूँगा, तो इस रिश्ते की जिम्मेदारी भी पूरी ईमानदारी से निभाऊँगा।अब उस घर में मेरे लिए एक ही नाम था—विद्या।
जब भी कलावती माँ मेरे साथ बाहर जातीं, तो मुझे अपनी बहू विद्या के रूप में ही परिचित करातीं। धीरे-धीरे उनके लिए यह केवल एक भूमिका नहीं रही थी, बल्कि उनके मन में मैं सचमुच उनकी बहू जैसा स्थान पा चुका था।
एक दिन हम दोनों बाज़ार गए। रास्ते में कलावती माँ की एक पुरानी सहेली मिल गईं। उन्होंने मुस्कुराकर पूछा,“कलावती, यह कौन है?”कलावती माँ ने बड़े गर्व और स्नेह से मेरी ओर देखते हुए कहा,
“अरे, यह मेरी बहू विद्या है… श्याम की पत्नी।”मैं एक पल के लिए चुप रह गया। कलावती माँ ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मुझे अपने पास कर लिया।उनकी सहेली ने मेरी ओर देखकर कहा,“बहुत प्यारी बहू है तुम्हारी।”कलावती माँ मुस्कुराईं।“हाँ, मेरी बहू बहुत अच्छी है। घर का पूरा ध्यान रखती है और मेरा भी।”
मैंने सिर झुकाकर नमस्ते किया और हल्की मुस्कान के साथ उनके पास खड़ा रहा।ऐसे ही जब भी कलावती माँ की कोई सहेली या परिचित हमसे मिलता, वह मेरा परिचय उसी तरह करातीं—“यह मेरी बहू विद्या है, श्याम की पत्नी।”समय के साथ मुझे भी उस परिचय में अजनबीयत महसूस होना कम हो गई। कलावती माँ के जीवन में मेरा स्थान अब विद्या जैसा हो चुका था।उनके लिए मैं उनकी बहू था, उनके घर का हिस्सा था और उनके अकेलेपन का सहारा था।और हर बार जब वह गर्व से कहतीं, “यह मेरी बहू विद्या है,” तो उनके चेहरे पर जो संतोष दिखाई देता, वह मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण हो गया था।
समय के साथ कलावती माँ और मेरे बीच का रिश्ता और गहरा होता चला गया। अब वह मुझे केवल अपनी बहू के रूप में लोगों के सामने परिचित नहीं कराती थीं, बल्कि अपने मन से भी मुझे अपनी बहू विद्या ही मानने लगी थीं।मैं भी उनके साथ उसी अपनत्व से रहने लगा था, जैसे कोई बहू अपनी सास के साथ रहती है।सुबह उनके लिए चाय बनाना, घर के कामों में हाथ बँटाना, उनकी दवाइयों का ध्यान रखना और शाम को उनके पास बैठकर बातें करना—ये सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था।
कलावती माँ कभी मुझे प्यार से समझातीं,“विद्या बेटा, तू अपने लिए भी थोड़ा आराम कर लिया कर।” मैं मुस्कुराकर कहता,“माँ, आप मेरी सास हैं। आपकी सेवा करना मेरा फर्ज है।” यह सुनकर उनके चेहरे पर संतोष आ जाता।धीरे-धीरे हमारे बीच का रिश्ता इतना स्वाभाविक हो गया कि मुझे भी महसूस होने लगा कि इस घर में कलावती मेरी सास की तरह हैं और मैं उनकी बहू की तरह। कलावती माँ के सामने मैं उनके लिए विद्या, उनकी बहू था।
उनके लिए यह रिश्ता किसी दिखावे का नहीं था। वह मुझे अपनी खोई हुई बहू के रूप में स्वीकार कर चुकी थीं और मैं उनके स्नेह का सम्मान करते हुए उस रिश्ते को पूरी जिम्मेदारी से निभा रहा था।
इस तरह एक असाधारण परिस्थिति में हमारे बीच एक ऐसा माँ-बेटे से भी गहरा सास-बहू जैसा पारिवारिक रिश्ता बन गया, जिसकी शुरुआत एक बरसाती रात से हुई थी।समय के साथ श्याम और मेरे बीच का रिश्ता भी बदल चुका था। अब कलावती माँ मुझे अपनी बहू विद्या मानती थीं और मैं उनके घर का हिस्सा बन चुका था।
एक दिन कलावती माँ ने श्याम और मुझे अपने पास बुलाया। उन्होंने गंभीर होकर कहा,“बेटा, अगर तुम दोनों एक-दूसरे को दिल से स्वीकार करते हो, तो समाज के सामने भी इस रिश्ते को एक नाम मिलना चाहिए।”श्याम कुछ देर तक चुप रहा। फिर उसने मेरी ओर देखा।उसकी आँखों में अब सिर्फ अपनी खोई हुई पत्नी की याद नहीं थी, बल्कि मेरे लिए भी एक अलग तरह का अपनापन था।
उसने धीरे से कहा,“विद्या… मैं तुम्हें किसी की जगह भरने के लिए स्वीकार नहीं करना चाहता। अगर तुम अपनी इच्छा से मेरे साथ जीवन बिताना चाहती हो, तभी मैं यह रिश्ता स्वीकार करूँगा।”
मैंने भावुक होकर उसकी ओर देखा और कहा,
“श्याम, मैंने तुम्हारे साथ रहते हुए तुम्हारा अकेलापन और तुम्हारा दर्द देखा है। अगर हम एक-दूसरे का साथ सम्मान और सच्चाई से निभा सकें, तो मुझे यह रिश्ता स्वीकार है।”
कलावती माँ की आँखों में आँसू आ गए।
कुछ समय बाद परिवार के करीबी लोगों की मौजूदगी में श्याम और मेरा विवाह हुआ। कलावती माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया।
उस दिन उन्होंने मुझे देखकर कहा,“आज मेरी बहू फिर से मेरे घर में दुल्हन बनकर आई है।”मैंने उनके पैर छुए।श्याम मेरे पास खड़ा था। उसके चेहरे पर वर्षों बाद एक हल्की मुस्कान थी।
हम दोनों जानते थे कि हमारा रिश्ता साधारण नहीं था। उसके पीछे दर्द, यादें और बहुत-सी उलझी हुई भावनाएँ थीं। लेकिन उस दिन हमने तय किया कि आगे का जीवन अतीत की छाया में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सम्मान और साथ के आधार पर जिएँगे।
समय के साथ मेरे मन में एक बड़ा निर्णय आकार लेने लगा। अब मैं केवल विद्या के रूप में जीवन जीना नहीं चाहता था, बल्कि अपने शरीर और अपनी पहचान को भी उसी रूप में स्वीकार करना चाहता था।
मैंने श्याम और कलावती माँ से अपने मन की बात कही। दोनों ने मेरी बात ध्यान से सुनी।

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