Hindi · Family
yesterday
राज को घूमने-फिरने का बहुत शौक था। नई जगह, नई मुसीबत और नई सेल्फी—इन तीनों के बिना उसकी यात्रा अधूरी मानी जाती थी। इस बार उसने गोमुख जाने का फैसला किया।
दोस्तों ने उसे समझाया, “भाई, गोमुख ट्रेक आसान नहीं है।”
राज ने मुस्कुराकर कहा, “मुश्किल क्या है? पहाड़ हैं, रास्ता है और मैं हूँ।”
उसका दोस्त मोनू बोला, “और भालू?”
राज का चेहरा उतर गया। “भालू भी हैं?”
मोनू ने गंभीरता से कहा, “हाँ… और अगर किस्मत खराब हुई तो मैं भी हूँ।”
पहाड़ों की ओर
गंगोत्री पहुँचते-पहुँचते मौसम बदल चुका था। चारों तरफ ऊँचे पहाड़, घने बादल और ठंडी हवा थी। राज जितना आगे बढ़ता, जंगल उतना ही शांत होता जाता।
शाम होते-होते वे एक छोटे से कैंप के पास पहुँचे। वहाँ एक बूढ़ा गाइड बैठा था।
उसने राज को देखते ही कहा, “रात में जंगल की तरफ मत जाना।”
राज ने पूछा, “क्यों?”
बूढ़े ने धीमी आवाज़ में कहा, “क्योंकि वहाँ… कोई रहता है।”
मोनू ने तुरंत पूछा, “किराए पर या बिना किराए के?”
बूढ़े ने घूरकर देखा।
मोनू चुप हो गया।
रात में राज अपने टेंट में लेटा हुआ था। बाहर तेज हवा चल रही थी।
अचानक—
खर्र… खर्र… खर्र…
टेंट के बाहर किसी के चलने की आवाज़ आई।
राज ने धीरे से मोनू को जगाया।
“मोनू… उठ।”
“क्या हुआ?”
“बाहर कोई है।”
मोनू ने आँखें खोले बिना कहा, “अगर भूत है तो उससे बोल देना कि मैं सो रहा हूँ।”
तभी बाहर से आवाज़ आई—
“राज…”
दोनों की आँखें खुल गईं।
“इसने मेरा नाम कैसे जाना?” राज फुसफुसाया।
मोनू काँपते हुए बोला, “शायद… इंस्टाग्राम से।”
आवाज़ फिर आई—
“राज… बाहर आओ…”
राज ने हिम्मत करके टेंट की ज़िप खोली।
बाहर घना अँधेरा था।
और बर्फ पर किसी के पैरों के निशान थे।
लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि निशान टेंट की तरफ आ रहे थे… और वापस नहीं जा रहे थे।
राज का गला सूख गया।
तभी पीछे से मोनू चीखा—
“भाग!”
दोनों बिना सामान उठाए पहाड़ की तरफ दौड़ पड़े।
रहस्यमयी गुफा
भागते-भागते वे एक चट्टान के पीछे बनी छोटी-सी गुफा में जा घुसे।
अंदर अँधेरा था।
राज ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
दीवार पर पुराने निशान बने हुए थे।
उनमें से एक जगह लाल रंग से लिखा था—
“जो यहाँ आता है, वह अकेला वापस नहीं जाता।”
मोनू ने पढ़ते ही कहा, “राज, मुझे लगता है हमें वापस जाना चाहिए।”
राज बोला, “लेकिन बाहर वही चीज़ है!”
मोनू ने सिर हिलाया।
“ठीक है। फिर यहीं मर जाते हैं। कम से कम गूगल मैप में लोकेशन तो अच्छी आएगी।”
अचानक गुफा के अंदर से किसी के हँसने की आवाज़ आई।
ही… ही… ही…
दोनों जम गए।
फिर आवाज़ आई—
“तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो?”
राज और मोनू चीखते हुए एक-दूसरे से चिपक गए।
टॉर्च की रोशनी सामने पड़ी तो एक आदमी दिखाई दिया। उसके हाथ में लकड़ी थी और कंधे पर बड़ा-सा बैग।
राज ने काँपते हुए पूछा, “आप… भूत हैं?”
वह आदमी बोला, “नहीं। मैं पोर्टर हूँ।”
मोनू ने राहत की साँस ली।
“भाई साहब, आपने तो हमारी जान ही निकाल दी!”
पोर्टर बोला, “तुम लोगों ने मेरी भी निकाल दी। मैं आधे घंटे से तुम्हें ढूँढ रहा हूँ।”
राज ने पूछा, “लेकिन बाहर जो हमारा नाम लेकर बुला रहा था, वो कौन था?”
पोर्टर का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“कौन?”
तभी गुफा के बाहर से फिर वही आवाज़ आई—
“राज…”
तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।
पोर्टर ने फुसफुसाकर कहा—
“मैंने तो तुम्हारा नाम लिया ही नहीं था।”
कुछ पल के लिए गुफा में सन्नाटा छा गया।
फिर बाहर से आवाज़ आई—
“मोनू…”
मोनू का चेहरा सफेद पड़ गया।
“भाई… मेरा नाम तो कोई जानता भी नहीं था।”
राज ने धीरे से कहा, “शायद अब जानता है।”
अचानक गुफा के बाहर बर्फ का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरा।
धड़ाम!
तीनों चीख पड़े।
और फिर…
अँधेरे में दो चमकती आँखें दिखाई दीं।
राज ने आँखें बंद कर लीं।
मोनू ने प्रार्थना शुरू कर दी।
पोर्टर ने अपनी लकड़ी उठा ली।
कुछ सेकंड बाद वह चीज़ धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ी।
और फिर…
वह एक पहाड़ी कुत्ता निकला।
मोनू ने गुस्से में कहा, “कमीने! तूने हमारी जान निकाल दी!”
कुत्ता चुपचाप बैठ गया।
उसके गले में एक कैमरा लटका हुआ था।
राज ने कैमरा उठाया।
उसमें आखिरी तस्वीर देखकर उसके होश उड़ गए।
तस्वीर में राज और मोनू अपने टेंट के बाहर खड़े थे।
और उनके ठीक पीछे…
एक काली परछाईं खड़ी थी।
लेकिन तस्वीर खींचने वाला कोई इंसान वहाँ था ही नहीं।
राज ने धीरे से कहा—
“मोनू… हमें यहाँ से निकलना होगा।”
मोनू ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
फिर उसने कुत्ते की तरफ देखा।
“और इसे भी साथ ले चलते हैं।”
राज ने पूछा, “क्यों?”
मोनू बोला—
“भूत से तो नहीं बचा सकता… लेकिन कम से कम रास्ते में भालू आया तो भूत को आगे कर देंगे।”
सुबह होते ही तीनों गोमुख की ओर निकल पड़े।
लेकिन राज ने उस दिन एक बात समझ ली—
पहाड़ खूबसूरत जरूर होते हैं, लेकिन उनकी खामोशी को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।
और मोनू ने एक और बात समझी—
अगली बार घूमने जाना हो तो होटल में रहना ही बेहतर है।
गोमुख की बर्फीली वादियों में राज और मोनू आगे बढ़ रहे थे। पिछली रात की डरावनी घटना के बाद दोनों ने तय कर लिया था कि अब बिना सोचे कोई कदम नहीं उठाएँगे।
लेकिन मोनू था कि हर पाँच मिनट में कोई न कोई बेवकूफी कर देता था।
चलते-चलते अचानक उसे एक आवाज़ सुनाई दी—
“मोनू…”
मोनू रुक गया।
“राज… तूने मेरा नाम लिया?”
राज ने सिर हिलाया। “नहीं।”
फिर आवाज़ आई—
“मोनू… इधर आओ…”
मोनू ने धीरे से कहा, “भाई, कोई मुझे बुला रहा है।”
राज बोला, “मत जाना। पिछली बार भी किसी ने नाम लेकर बुलाया था।”
मोनू ने बहादुरी दिखाते हुए कहा, “मैं डरता नहीं हूँ।”
इतना कहकर वह आगे बढ़ा और एक पत्थर से टकराकर सीधे बर्फ में मुँह के बल गिर पड़ा।
राज हँसते हुए बोला, “हाँ, दिख रहा है।”
मोनू उठकर बोला, “मैं जानबूझकर गिरा था। बर्फ की क्वालिटी चेक कर रहा था।”
आवाज़ फिर आई।
इस बार बिल्कुल पास से—
“मोनू…”
दोनों ने पीछे देखा।
चट्टानों के बीच एक साध्वी खड़ी थी।
लंबे खुले बाल, सफेद वस्त्र, हाथ में कमंडल और आँखों में अजीब-सी चमक।
मोनू ने राज का हाथ पकड़ लिया।
“भाई…”
“क्या?”
“अगर ये भूत हुई तो?”
राज ने फुसफुसाकर कहा, “पहले पूछते हैं।”
दोनों धीरे-धीरे साध्वी के पास पहुँचे।
साध्वी ने गंभीर आवाज़ में पूछा, “तुम लोग यहाँ क्यों आए हो?”
राज ने कहा, “गोमुख घूमने।”
साध्वी ने मोनू की तरफ देखा।
“और तुम?”
मोनू बोला, “मैं राज के साथ आया हूँ।”
साध्वी ने पूछा, “तुम्हारा उद्देश्य?”
मोनू ने थोड़ा सोचकर कहा—
“मेरा? गरम चाय।”
राज ने अपना माथा पकड़ लिया।
साध्वी पहली बार मुस्कुराई।
“तुम बहुत विचित्र हो।”
मोनू बोला, “धन्यवाद। घर वाले भी यही कहते हैं।”
लेकिन तभी साध्वी का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
उसने कहा—
“जिस रहस्य की तलाश में तुम यहाँ आए हो, वह तुम्हारे पीछे है।”
राज ने तुरंत पीछे देखा।
कुछ नहीं था।
मोनू ने भी पीछे देखा और बोला—
“मेरे पीछे तो मेरा बैग है।”
साध्वी ने कहा, “नहीं। उससे भी पीछे।”
अचानक तेज हवा चली।
साध्वी ने अपनी मुट्ठी खोली।
उसके हाथ में एक पुराना, काला पत्थर था, जिस पर अजीब-सा निशान बना था।
“यह पत्थर मुझे वर्षों पहले इस गुफा में मिला था। जिस रात इसे कोई अपने साथ ले जाने की कोशिश करता है, पहाड़ों में एक रहस्यमयी आवाज़ सुनाई देती है।”
राज ने काँपते हुए पूछा, “क्या वही आवाज़… जो हमारा नाम लेकर बुला रही थी?”
साध्वी ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
मोनू ने डरते हुए पूछा, “तो अब क्या होगा?”
साध्वी ने कहा—
“अब यह पत्थर तुम्हें चुन चुका है।”
मोनू ने तुरंत कहा—
“मैडम, मुझे नहीं चाहिए। आप राज को दे दीजिए।”
राज चिल्लाया, “अबे!”
साध्वी हँस पड़ी।
“डरो मत। पत्थर किसी इंसान को नुकसान नहीं पहुँचाता।”
मोनू ने राहत की साँस ली।
“तो फिर ठीक है।”
साध्वी ने आगे कहा—
“लेकिन जो इसके पीछे का रहस्य जान लेता है…”
वह रुक गई।
राज ने पूछा, “फिर?”
साध्वी ने गंभीर आवाज़ में कहा—
“उसे हमेशा के लिए पहाड़ों की सच्चाई पता चल जाती है।”
मोनू ने तुरंत पूछा—
“मतलब?”
साध्वी ने मुस्कुराकर कहा—
“गोमुख में रात को जो डरावनी आवाज़ें सुनाई देती हैं… उनमें से आधी भूतों की नहीं हैं।”
राज और मोनू ने एक-दूसरे को देखा।
मोनू बोला, “तो आधी किसकी हैं?”
साध्वी ने पीछे पहाड़ की ओर इशारा किया।
“परसों से वहाँ एक फिल्म की शूटिंग चल रही है। हॉरर फिल्म।”
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
राज ने आँखें बंद कर लीं।
मोनू ने सिर पकड़ लिया।
“मतलब हम दो रात से फिल्म के कलाकारों से डर रहे थे?”
साध्वी हँसते हुए बोली—
“हाँ। लेकिन जो आवाज़ तुम्हारा नाम लेकर बुला रही थी… वह फिल्म वालों की नहीं थी।”
मोनू की हँसी तुरंत गायब हो गई।
“तो… वो किसकी थी?”
साध्वी ने धीरे से पहाड़ की तरफ देखा।
“यह रहस्य अभी बाकी है।”
और उसी क्षण दूर बर्फीली घाटी से फिर आवाज़ आई—
“मोनू…”
मोनू ने राज का हाथ पकड़ लिया।
“भाई, मैं वापस जा रहा हूँ।”
राज ने पूछा, “अकेला?”
मोनू बोला—
“नहीं। साध्वी जी को भी साथ ले जा रहा हूँ। अब ये ही हमारी बॉडीगार्ड हैं।”
साध्वी मुस्कुराई।
लेकिन उसकी आँखें अब भी उसी अँधेरी घाटी की तरफ थीं…
क्योंकि वह जानती थी—
असल रहस्य अभी शुरू हुआ था।
साध्वी ने काले पत्थर को अपनी हथेली पर रखा। पत्थर सामान्य दिख रहा था, लेकिन उसके चारों ओर हवा जैसे काँप रही थी।
राज ने घबराकर पूछा, “माता जी… आखिर इस पत्थर में ऐसा क्या है?”
साध्वी ने गंभीर स्वर में कहा, “यह कोई साधारण पत्थर नहीं है। यह वर्तमान और अतीत के बीच आने-जाने का द्वार है।”
मोनू ने तुरंत पूछा, “मतलब… टाइम मशीन?”
साध्वी ने सिर हिलाया।
मोनू की आँखें चमक उठीं।
“तो इसमें पेट्रोल कितना लगता है?”
राज ने उसके सिर पर हल्की चपत लगाई।
“अबे! टाइम मशीन है, स्कूटर नहीं।”
साध्वी मुस्कुराई, लेकिन अगले ही पल उनका चेहरा गंभीर हो गया।
“मजाक मत समझो। इस पत्थर के भीतर समय की एक दरार है। जब यह सक्रिय होता है, तो अतीत और वर्तमान एक-दूसरे को छू सकते हैं।”
राज ने धीरे से पूछा, “और जो आवाज़ हमें सुनाई दे रही है?”
साध्वी कुछ पल चुप रहीं।
फिर बोलीं—
“वह आवाज़… समय के पार से आ रही है।”
मोनू ने तुरंत दोनों कान बंद कर लिए।
“माता जी, आवाज़ को बोलिए पहले अपॉइंटमेंट लेकर आए। मैं अचानक आने वाली आवाज़ों से बहुत परेशान हूँ।”
राज ने उसे घूरा।
“चुप रह!”
साध्वी ने कहा, “तुम्हें जो आवाज़ सुनाई दे रही है, वह किसी भूत की नहीं है। संभव है कि वह अतीत में मौजूद किसी व्यक्ति की आवाज़ हो… जो वर्तमान में तुम्हें पुकार रही है।”
राज के चेहरे का रंग उड़ गया।
“लेकिन कोई इंसान अतीत से हमें कैसे बुला सकता है?”
साध्वी ने काले पत्थर पर बने निशान की ओर इशारा किया।
“क्योंकि समय हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलता। कुछ स्थान ऐसे होते हैं जहाँ समय की परतें एक-दूसरे के करीब आ जाती हैं। यह पत्थर उन्हीं स्थानों में से एक है।”
मोनू ने हाथ उठाया।
“एक सवाल है।”
साध्वी ने कहा, “पूछो।”
“अगर हम अतीत में चले गए तो वापस कैसे आएँगे?”
साध्वी ने कहा, “जिस रास्ते से जाओगे, उसी रास्ते से लौटना होगा।”
मोनू ने राहत की साँस ली।
“ओह! तो रास्ता भूलने का खतरा नहीं है।”
राज बोला, “तू टाइम ट्रैवल में भी रास्ता भूलने की सोच रहा है?”
मोनू ने गंभीरता से कहा, “भाई, मेरी सबसे बड़ी समस्या यही है।”
तभी काला पत्थर अचानक गर्म होने लगा।
धक… धक… धक…
जैसे उसके भीतर कोई दिल धड़क रहा हो।
हवा तेज हो गई।
बर्फ के छोटे-छोटे कण हवा में उठकर गोल घूमने लगे।
और फिर…
दूर घाटी से वही आवाज़ आई—
“मोनू…”
मोनू का चेहरा सफेद पड़ गया।
“माता जी… इस बार आवाज़ बहुत पास से आई है।”
साध्वी ने आँखें बंद कर लीं।
“नहीं… यह पास से नहीं आई।”
राज ने पूछा, “तो?”
साध्वी ने धीरे से कहा—
“यह बहुत दूर से आई है। इतना दूर… जितना तुम सोच भी नहीं सकते।”
मोनू ने डरते हुए पूछा, “कितना दूर?”
साध्वी ने उसकी तरफ देखा।
“समय के उस पार।”
अचानक काले पत्थर के सामने हवा में एक धुँधला-सा दृश्य बनने लगा।
उसमें वही पहाड़ दिखाई दे रहे थे…
लेकिन पहाड़ों पर बर्फ नहीं थी।
और वहाँ कुछ लोग खड़े थे।
उनमें से एक आदमी ने अचानक सिर उठाया।
सीधे उनकी तरफ देखा।
राज फुसफुसाया—
“ये लोग हमें देख सकते हैं!”
मोनू पीछे हटते हुए बोला—
“भाई… अगर ये अतीत है, तो वहाँ नेटवर्क कैसे आ रहा है?”
राज ने कहा, “नेटवर्क नहीं है!”
मोनू बोला, “फिर मेरी शक्ल इन्हें कैसे दिख रही है?”
साध्वी ने गंभीर आवाज़ में कहा—
“क्योंकि अब अतीत तुम्हें देख रहा है।”
तीनों चुप हो गए।
दृश्य में खड़ा आदमी धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ा।
और फिर उसकी आवाज़ सुनाई दी—
“मोनू… हमें बचाओ…”
मोनू ने काँपते हुए राज की तरफ देखा।
“भाई…”
“क्या?”
“मुझे लगता है टाइम मशीन बंद कर देनी चाहिए।”
राज ने पूछा, “क्यों?”
मोनू बोला—
“क्योंकि मुझे इतिहास पढ़ने में भी दिक्कत होती थी… अब इतिहास मुझे बुला रहा है!”
साध्वी ने पहली बार जोर से हँसते हुए कहा—
“डरो मत, मोनू। असली रहस्य अभी बाकी है।”
काला पत्थर फिर चमका।
और इस बार उसके भीतर से एक नई आवाज़ आई—
“राज… तुम्हें अपने अतीत में लौटना होगा।”
राज का चेहरा गंभीर हो गया।
क्योंकि उसने महसूस किया…
यह आवाज़ उसे उसके जन्म से भी पहले की किसी घटना की ओर बुला रही थी।
काले पत्थर से आई आवाज़ के बाद राज कुछ देर तक चुप खड़ा रहा। उसके सामने समय की धुंधली दरार काँप रही थी। दूसरी तरफ वही पहाड़ दिखाई दे रहे थे, लेकिन सब कुछ अलग था—न बर्फ, न आधुनिक रास्ते, न ट्रेकर्स।
राज ने धीरे से कहा, “मुझे अतीत में जाना होगा। मुझे पता लगाना है कि वह आवाज़ मुझे क्यों बुला रही है।”
मोनू ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
“और मैं भी साथ चलूँगा।”
राज ने हैरानी से पूछा, “तू? तू तो पाँच मिनट पहले टाइम मशीन बंद करने को बोल रहा था!”
मोनू ने सीना चौड़ा किया।
“डरता तो मैं अभी भी हूँ… लेकिन दोस्ती में डर को साइड में रखना पड़ता है।”
राज मुस्कुराया।
“सच?”
मोनू बोला, “हाँ। और अगर वहाँ खाने का इंतजाम हुआ तो मैं बिल्कुल नहीं डरूँगा।”
साध्वी ने दोनों को काले पत्थर के सामने खड़ा किया।
“ध्यान रखना। समय के उस पार जाकर अतीत को बदलने की कोशिश मत करना।”
मोनू ने पूछा, “अगर वहाँ मुझे कोई पैसे दे दे तो?”
साध्वी ने उसे घूरा।
“नहीं।”
“अगर बहुत सारे दे?”
“नहीं।”
“अगर मैं वापस आते समय—”
“मोनू!”
“ठीक है माता जी, इतिहास को हाथ नहीं लगाऊँगा।”
साध्वी ने पत्थर पर हाथ रखा।
अचानक जमीन काँपने लगी।
धड़… धड़… धड़…
काले पत्थर से नीली रोशनी निकलने लगी। हवा गोल-गोल घूमने लगी और सामने एक विशाल दरवाजा बनने लगा।
उस दरवाजे के भीतर हजारों चमकती तस्वीरें दिखाई दे रही थीं—पुराने पहाड़, नदियाँ, लोग, युद्ध, यात्राएँ…
मोनू की आँखें फैल गईं।
“भाई, इसमें तो पूरा इतिहास चल रहा है!”
राज बोला, “हाँ।”
“वीडियो बंद नहीं हो सकता?”
“नहीं।”
“तो कम से कम विज्ञापन तो नहीं आएँगे?”
राज ने उसे घूरा।
“चल!”
दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और समय की दरार में कदम रख दिया।
अगले ही पल—
धड़ाम!
दोनों बर्फ पर जा गिरे।
राज उठकर चारों तरफ देखने लगा।
“हम… अतीत में आ गए।”
मोनू ने अपनी पीठ सहलाते हुए कहा, “हाँ, लेकिन टाइम मशीन में सीट बेल्ट की सुविधा होनी चाहिए थी।”
चारों तरफ विशाल पहाड़ थे। हवा में अजीब-सी शांति थी। जहाँ वर्तमान में गोमुख के आसपास बर्फ फैली थी, वहाँ अब चट्टानों और हरे मैदानों का विस्तार था।
राज ने दूर देखा।
कुछ लोग पहाड़ की तरफ बढ़ रहे थे।
उनके कपड़े पुराने थे।
मोनू ने फुसफुसाकर कहा, “भाई… ये लोग हमें देखकर डरेंगे क्या?”
राज बोला, “शायद।”
मोनू ने अपना मोबाइल निकाल लिया।
“तो एक सेल्फी ले लेते हैं। ‘मैं और मेरे प्राचीन दोस्त।’”
राज ने उसका मोबाइल नीचे कर दिया।
“मोबाइल बंद रख! अगर किसी ने देख लिया तो पूरा इतिहास बदल जाएगा।”
मोनू ने मोबाइल जेब में रख लिया।
“ठीक है। लेकिन अगर कोई वाई-फाई पूछे तो मैं क्या बोलूँ?”
राज कुछ कह पाता, उससे पहले पहाड़ों के पीछे से एक भयानक गर्जना सुनाई दी।
गूँऽऽऽऽऽज!
दोनों जम गए।
मोनू ने धीरे से पूछा, “ये क्या था?”
राज ने कहा, “पता नहीं।”
फिर वही गर्जना हुई।
इस बार जमीन तक काँप गई।
मोनू ने तुरंत एक पेड़ के पीछे छिपते हुए कहा—
“मैंने फैसला किया है।”
“क्या?”
“अतीत बहुत खराब जगह है। वापस चलते हैं।”
राज ने कहा, “अभी नहीं। हमें उस आवाज़ का रहस्य पता करना है।”
तभी सामने खड़े लोगों में से एक ने अचानक उनकी तरफ देखा।
उसकी आँखें फैल गईं।
वह घबराकर चिल्लाया—
“ये लोग यहाँ कैसे आए?”
बाकी लोग भी उनकी तरफ देखने लगे।
राज और मोनू एक-दूसरे को देखने लगे।
मोनू ने धीरे से कहा—
“भाई…”
“क्या?”
“लगता है हमारा स्वागत समारोह शुरू हो गया है।”
लेकिन तभी उन लोगों के बीच से एक बूढ़ा व्यक्ति आगे आया।
उसने राज को देखते ही कहा—
“तुम आखिर आ ही गए।”
राज के कदम रुक गए।
“आप… मुझे जानते हैं?”
बूढ़ा मुस्कुराया।
“तुम्हें नहीं…”
उसने काले पत्थर की ओर देखा।
“…लेकिन मैं तुम्हारे आने का इंतजार कई वर्षों से कर रहा हूँ।”
राज के चेहरे पर चिंता उभर आई।
मोनू ने धीरे से कहा—
“भाई, मुझे लगता है हमारी टाइम ट्रिप अब घूमने की यात्रा नहीं रही।”
राज ने पूछा, “क्यों?”
मोनू बोला—
“क्योंकि इतिहास हमें पहले से जानता है।”
और उसी क्षण पहाड़ों के पीछे से फिर वही रहस्यमयी आवाज़ गूँजी—
“राज…”
इस बार आवाज़ इतनी करीब थी कि दोनों ने पीछे मुड़कर देखा।
लेकिन वहाँ…
कोई नहीं था।
बस बर्फ पर बने दो नए पैरों के निशान थे—
जो धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रहे थे।
अतीत की उस रहस्यमयी धरती पर राज और मोनू अभी भी अपने नए रूप को समझने की कोशिश कर ही रहे थे कि अचानक दूर से घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनाई दी।
ठक… ठक… ठक…
राज ने घबराकर कहा, “मोनू, कोई आ रहा है।”
मोनू ने अपनी चोटी ठीक करते हुए कहा, “हाँ, और उम्मीद है इस बार कोई हमें भूत नहीं समझेगा।”
तभी सामने से कुछ सैनिकों के साथ एक युवा राजकुमार घोड़े पर सवार दिखाई दिया। उसके साथ राजसी वस्त्रों में कई लोग थे।
घोड़ा उनके सामने आकर रुका।
राजकुमार घोड़े से उतरा और दोनों को देखकर कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने हाथ जोड़कर कहा—
“क्षमा कीजिए, राजकुमारी विद्या।”
राज चौंक गया।
“जी?”
राजकुमार ने मोनू की ओर देखा।
“और आपको भी, राजकुमारी संध्या।”
मोनू की आँखें फैल गईं।
उसने धीरे से राज से कहा—
“भाई… अब तो नाम भी बदल गया!”
राज ने फुसफुसाकर कहा—
“चुप रह। हमें यही पहचान बनाए रखनी होगी।”
राजकुमार ने झुककर कहा—
“मैं राजकुमार आदित्य हूँ। राजकंधा से आपके आगमन का समाचार मिलते ही मैं स्वयं आपसे मिलने आया हूँ।”
मोनू ने धीरे से पूछा—
“राजकंधा कहाँ है?”
राज ने जवाब दिया—
“पता नहीं।”
मोनू बोला—
“अच्छा है। अगर पता होता तो शायद वापस जाने की टिकट भी माँग लेते।”
राज ने उसे कोहनी मारी।
राजकुमार आदित्य ने उनकी बात सुन ली, लेकिन कुछ समझ नहीं पाया।
उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा—
“आप दोनों साधुओं के क्षेत्र में बिना अनुमति पहुँच गईं। इसके लिए मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ।”
राज ने हैरानी से कहा—
“आप हमसे माफी क्यों माँग रहे हैं?”
राजकुमार ने गंभीरता से उत्तर दिया—
“क्योंकि मेरे सैनिकों ने आपके आने की सूचना समय पर नहीं दी। आपको रास्ते में कोई असुविधा हुई हो तो मैं दोषी हूँ।”
मोनू ने तुरंत कहा—
“असुविधा तो हुई थी।”
राज ने उसे घूरा।
“क्या?”
मोनू ने गिनाना शुरू किया—
“पहले टाइम मशीन ने हमें अतीत में फेंका, फिर हमें महिला बना दिया, फिर नाम बदल दिया, फिर रास्ते में खाना नहीं मिला…”
राज ने उसका मुँह बंद कर दिया।
“बस!”
राजकुमार आदित्य ने पूछा—
“टाइम… मशीन?”
मोनू मुस्कुराया।
“मैंने कहा था… तपी हुई चटनी।”
राजकुमार कुछ समझ नहीं पाया।
उसने साधुओं की ओर मुड़कर कहा—
“इन दोनों अतिथियों को उचित सम्मान दिया जाए। और यदि इनसे हमारी ओर से कोई भूल हुई हो तो क्षमा माँगी जाए।”
एक साधु आगे आया और हाथ जोड़कर बोला—
“राजकुमार, साधुओं की ओर से भी हम दोनों राजकुमारियों से क्षमा चाहते हैं।”
मोनू ने तुरंत हाथ जोड़ लिए।
“क्षमा स्वीकार है।”
राज ने उसे घूरा।
मोनू ने धीरे से कहा—
“भाई, इतनी जल्दी मना मत कर। शायद इसके साथ खाना भी मिले।”
राजकुमार आदित्य मुस्कुराया।
“राजकुमारी संध्या, आप बहुत हँसमुख हैं।”
मोनू ने सिर झुकाकर कहा—
“जी… परिस्थिति चाहे जैसी हो, हँसते रहना चाहिए।”
राज ने धीरे से कहा—
“तू हँस नहीं रहा, अपनी जान बचा रहा है।”
मोनू बोला—
“दोनों एक ही बात है।”
राजकुमार आदित्य ने राज की ओर देखा।
“राजकुमारी विद्या, आपको देखकर लगता है कि आप किसी गहरे रहस्य से जुड़ी हैं।”
राज का चेहरा गंभीर हो गया।
“आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”
आदित्य ने काले पत्थर की ओर देखा, जो राज के वस्त्रों के भीतर हल्का-हल्का चमक रहा था।
“क्योंकि इस पत्थर को देखकर मेरे पिता ने वर्षों पहले कहा था—जब यह फिर चमकेगा, तब समय की सीमा टूट जाएगी।”
राज और मोनू एक-दूसरे को देखने लगे।
मोनू ने धीरे से कहा—
“भाई… लगता है हमारा मेकओवर बेकार नहीं गया।”
राज ने पूछा—
“क्यों?”
मोनू मुस्कुराया।
“हम सीधे राजकुमार के सामने पहुँच गए। अब बस महल में कमरा मिल जाए।”
राज ने सिर पकड़ लिया।
उधर राजकुमार आदित्य ने दोनों को महल चलने का निमंत्रण दिया।
लेकिन जैसे ही वे आगे बढ़े, पहाड़ों के पीछे से वही रहस्यमयी आवाज़ फिर सुनाई दी—
“विद्या… संध्या… महल मत जाना…”
तीनों रुक गए।
आदित्य ने तलवार निकाल ली।
राज ने काले पत्थर को कसकर पकड़ लिया।
और मोनू ने धीरे से कहा—
“अब अगर महल में खाना भी फँसा हो, तो मैं नहीं जा रहा।”
राज ने उसे देखा।
“तू सच में नहीं सुधरेगा।”
मोनू बोला—
“अतीत में आ गया हूँ, चरित्र तो वर्तमान वाला ही रहेगा ना!”