Hindi · Friends
yesterday
रविवार की शांत सुबह थी। बालकनी से छनकर आती गुनगुनी धूप में सागर आरामकुर्सी पर पसरा चाय की चुस्कियों के साथ इतमीनान से अख़बार के पन्ने पलट रहा था। तीन दिन की लंबी छुट्टी का पहला ही दिन था, और उसने मन ही मन नेटफ्लिक्स और लंबी नींद के कई मंसूबे बांध रखे थे। तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और स्वाति अंदर दाखिल हुई। उसके चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट और होंठों पर बहुत मीठी, मक्खन लगी मुस्कान थी—वह मुस्कान जिसे देखकर सागर का छठा सेंस तुरंत खतरे की घंटी बजा देता था। “ सागर … तुम मेरी थोड़ी सी हेल्प कर सकते हो?” स्वाति ने बेहद मासूमियत से अपनी पलकें झपकाईं। सागर ने अख़बार थोड़ा नीचे किया और मुस्कुराकर बोला, “हाँ, क्यों नहीं! तुम वाइफ हो मेरी, हुक्म करो। क्या लाना है बाज़ार से?” स्वाति आगे बढ़ी, उसके कंधे पर हाथ रखा और बड़े लाड़ से बोली, “ सागर , तुम कितने हैंडसम हो न… एकदम चॉकलेटी बॉय, शार्प जॉलाइन, क्लीन शेव। और सबसे बड़ी बात, मेरे इतने प्यारे हस्बैंड हो…” “स्वाति, भूमिका मत बांधो,” सागर सतर्क हो गया, “मुद्दे पर आओ। क्या कांड हुआ है?” “क्या तुम एक दिन के लिए… औरत का गेटअप ले सकते हो? प्लीज़!” सागर के हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा। उसने आँखें फाड़कर स्वाति को देखा, “क्या?! दिमाग तो ठीक है तुम्हारा? मैं और औरत? पागल हो गई हो क्या!” “अरे बाबा, सुनो तो सही! कॉलेज के फेस्ट में तुमने ‘मिसेज डिसूजा’ का रोल किया था न? बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला था तुम्हें! तुम्हारी आवाज़ भी पतली हो जाती है और दाढ़ी-मूँछ वैसे भी तुम साफ़ रखते हो…” “वो कॉलेज का ड्रामा था स्वाति! असली ज़िंदगी में कोई अपनी मर्जी से साड़ी पहनकर नहीं घूमता। माजरा क्या है, साफ़-साफ़ बताओ!” स्वाति ने एक गहरी सांस ली और दोनों हाथ जोड़कर बैठ गई। “मेरी कलीग और बेस्ट फ्रेंड रिया, जानती हो न उसे? उसने अपने रूढ़िवादी ससुराल वालों से झूठ बोल रखा है कि वह लखनऊ में एक संस्कारी ‘गर्ल्स पीजी’ में एक फीमेल रूम-पार्टनर के साथ रहती है। असल में उसकी रूममेट अचानक शादी में गाँव चली गई है और आज दोपहर उसकी सख्त, परंपरावादी सास अचानक बनारस से धमक रही हैं! रिया के ससुर बहुत पुराने ख्यालों के हैं। अगर सास को पता चला कि रिया अकेले फ्लैट में रहती है या कोई गड़बड़ है, तो वे उसका करियर छुड़वाकर गाँव वापस बुला लेंगे।” “तो इसमें मैं कहाँ से आ गया? तुम चली जाओ उसके साथ रहने!” सागर ने चिढ़कर कहा। “मेरा आज ऑफिस में इंटरनेशनल क्लाइंट्स के साथ ऑडिट है सागर ! मैं एक मिनट के लिए भी छुट्टी नहीं ले सकती। तुम तीन दिन की छुट्टी पर हो। बस आज शाम तक की बात है, कल सुबह सास वापस चली जाएंगी। प्लीज़ सागर , अपनी इस मासूम शक्ल का फ़ायदा उठाओ और मेरी सहेली का घर बचा लो!” सागर ने पहले तो साफ़ मना किया, हाथ-पैर पटके, लेकिन स्वाति के आंसुओं की नौटंकी और इमोशनल ब्लैकमेल के आगे आखिरकार उसे घुटने टेकने ही पड़े। अगले दो घंटे सागर के लिए किसी अजूबे से कम नहीं थे। स्वाति ने अपनी अलमारी से एक खूबसूरत नेवी ब्लू और पीच कलर की जॉर्जेट की साड़ी निकाली। “साड़ी? मुझसे सलवार-सूट नहीं पहना जा सकता था?” सागर ने शीशे के सामने खड़े होकर असहाय नज़रों से देखा। “साड़ी में लंबाई और ढाँचा अच्छे से छुप जाता है, बुद्धू,” स्वाति ने कहा और अपने मेकअप बॉक्स के साथ उस पर टूट पड़ी। फाउंडेशन, कंसीलर, हल्की सी आईलाइनर, न्यूड लिपस्टिक और माथे पर एक छोटी सी काली बिंदी। स्वाति ने अपने पुराने कॉलेज ड्रामे वाले लंबे, घने बालों की विग निकाली और सागर के सिर पर बड़े सलीके से सेट करके एक ढीली सी चोटी गूंथ दी। जब सागर ने आख़िरकार खुद को आईने में देखा, तो उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकली। आईने में कोई ‘ सागर ’ नहीं, बल्कि एक बेहद नज़ाकत भरी, लंबी और तीखे नैन-नक्श वाली खूबसूरत महिला खड़ी थी। “बाप रे… सागर , तुम तो मुझसे भी ज़्यादा सुंदर लग रही हो!” स्वाति ने तालियाँ बजाईं। “चुप रहो,” सागर ने अपनी भारी आवाज़ में कहा, फिर तुरंत खाँसकर गले को थोड़ा दबाते हुए एक पतली, मीठी टोन निकाली, “मेरा मतलब… सच में ठीक लग रहा हूँ क्या?” स्वाति हँसते-हँसते लोटपोट हो गई। “परफेक्ट! तुम्हारा नाम आज से ‘अमिता’ है। रिया की सीधी-सादी, टीचर रूममेट। बस पल्लू मत गिरने देना और जब भी बात करना, अपनी आवाज़ को उसी पिच पर रखना।” दोपहर के ठीक एक बजे सागर —यानी ‘अमिता’—रिया के फ्लैट पर पहुँच गया। रिया ने दरवाज़ा खोला और सामने खड़ी ‘लड़की’ को देखकर उसका मुँह खुला का खुला रह गया। “ सागर जी? हे भगवान… स्वाति ने मज़ाक नहीं किया था! आप तो बिल्कुल परी लग रहे हैं!” रिया ने राहत की सांस लेते हुए कहा। “परी-वरी छोड़ो रिया, यह पल्लू संभालना आफ़त है। और यह सैंडल… औरतें इस पर चलती कैसे हैं भाई?” सागर ने चलते हुए लड़खड़ाकर कहा। “आदत हो जाएगी। बस सास जी आने ही वाली होंगी, आप ड्रॉइंग रूम में बैठिए।” पाँच मिनट बाद ही दरवाज़े की घंटी बजी। रिया ने सहमते हुए दरवाज़ा खोला। सामने भारी-भरकम काया, आँखों पर चश्मा और चेहरे पर ठेठ सास वाला रौब लिए ‘शांति देवी’ खड़ी थीं। उनके हाथ में पूजा की टोकरी और गंगाजल की बोतल थी। “प्रणाम माँ जी!” रिया ने झुककर पैर छुए। “जीती रहो। बड़ी देर लगाई खोलने में,” शांति देवी अंदर दाखिल हुईं। उनकी तेज़, जासूस जैसी नज़रें सीधे सोफ़े पर बैठी ‘अमिता’ पर जाकर टिक गईं। सागर के दिल की धड़कनें 120 की स्पीड से भागने लगीं। उसने तुरंत पल्लू को सिर पर थोड़ा और आगे खींचा, शालीनता से उठकर हाथ जोड़े और बहुत ही धीमी, कोमल और सुरीली आवाज़ में बोला, “नमस्ते माँ जी। आइए, बैठिए। रिया बता रही थी कि आप आने वाली हैं।” शांति देवी ने ऊपर से नीचे तक विद्याको घूरा। सागर की साँसें अटक गईं कि कहीं उसकी चौड़ी कलाई या चाल-ढाल से भांडा न फूट जाए। लेकिन शांति देवी के चेहरे की कठोरता अचानक पिघलकर एक चौड़ी मुस्कान में बदल गई। “अरे वाह! रिया, तूने तो कहा नहीं था कि तेरी सहेली इतनी सुशील और संस्कारी है! आज के ज़माने में ऐसी लड़कियाँ कहाँ दिखती हैं जो घर में भी साड़ी पहनें और सिर पर पल्लू रखें। क्या नाम है तुम्हारा, बिटिया?” “जी… अमिता,” सागर ने पलकें झुकाकर, पूरे शर्मीले अंदाज़ में जवाब दिया। भीतर ही भीतर उसे अपने इस अभिनय पर ज़बरदस्त मज़ा आने लगा था। कॉलेज का पुराना एक्टर जाग चुका था। “बड़ी सुंदर हो बिटिया! बिल्कुल हमारी कुलदेवी जैसी मूरत है,” सास ने सोफ़े पर बैठते हुए कहा, “ज़रा हमारे लिए एक कप अदरक वाली कड़क चाय तो बना लाओगी?” “जी माँ जी, अभी लाई,” सागर ने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और मटकते हुए किचन की तरफ बढ़ गया। रिया किचन में उसके पीछे भागी। “ सागर जी, आप तो कमाल कर रहे हैं! माँ जी तो पहले ही शॉट में फिदा हो गईं!” सागर ने चाय की केतली चढ़ाते हुए एक अदा से अपनी लट पीछे की और फुसफुसाया, “रिया डार्लिंग, अब जब विद्याबन ही गए हैं, तो रोल को पूरे दिल से जिएंगे। तुम बस देखती जाओ!” चाय पीते-पीते शांति देवी ने विद्यासे उसके परिवार, गाँव और खान-पान के बारे में सवाल पूछने शुरू कर दिए। सागर ने ऐसी मीठी और घरेलू बातें गढ़ीं कि शांति देवी मंत्रमुग्ध होकर सुनती रहीं। बल्कि उन्होंने अपनी बहू रिया को ताना भी मार दिया, “रिया, कुछ सीख इनसे! देख कितनी नज़ाकत है बातों में, और तू है कि पूरे दिन जींस-टीशर्ट में भूतनी बनी घूमती है।” सागर ने मुँह पर पल्लू रखकर अपनी हँसी दबाई। उसे पहली बार समझ आ रहा था कि एक खूबसूरत औरत होने के क्या फ़ायदे होते हैं। घर के माहौल पर अब पूरी तरह विद्याका राज था। शाम के करीब छह बज रहे थे। सब कुछ प्लान के मुताबिक बेहतरीन चल रहा था। शांति देवी ने विद्याके हाथ के बने पकोड़ों की तारीफों के पुल बांध दिए थे। लेकिन असली ड्रामा तब शुरू हुआ, जब शांति देवी ने विद्याका हाथ अपने हाथ में ले लिया। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उन्होंने बड़े प्यार से विद्याके गाल को छुआ और बोलीं, “विद्याबिटिया… तुम्हारे घर में शादी की बात चल रही है क्या? सच कहूँ तो, मेरे मायके में मेरे छोटे भतीजे ‘राकेश’ के लिए मुझे ऐसी ही सुंदर, सुशील और संस्कारी बहू चाहिए थी। मैं अभी उसे वीडियो कॉल लगाती हूँ, तुम दोनों ज़रा बात कर लो!” सागर का सारा नखरा, सारी नज़ाकत और सारा मज़ा एक सेकंड में हवा हो गया। उसके माथे पर पसीना छूट गया और उसने फटी-फटी आँखों से कोने में खड़ी रिया की तरफ देखा। शांति देवी अपना फोन निकालकर नंबर डायल करने ही वाली थीं शांति देवी के हाथ में स्मार्टफोन चमक रहा था और स्क्रीन पर ‘राकेश भतीजा’ का नाम फ्लैश होने लगा।