धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि मैंने उस घर में सिर्फ श्याम की माँ का स्नेह नहीं पाया था—मुझे एक ऐसी माँ मिल गई थी, जिसकी ममता ने मेरे भीतर का अकेलापन भी कम कर दिया था।
और कलावती माँ के लिए मैं अब सिर्फ सागर नहीं रहा था।
मैं उनका अपना था—एक ऐसा बेटा, जिसे वह बेटी की तरह प्यार करती थीं।
जब भी मैं कलावती माँ के घर जाता, वह मुझे प्यार से विद्या के कपड़े दे देतीं। मैं वे कपड़े पहनकर घर में ही रहता और उनकी रोज़मर्रा के कामों में मदद करता।
धीरे-धीरे यह मेरे लिए केवल कपड़े पहनने की बात नहीं रह गई थी। कलावती माँ मुझे अपनी बहू विद्या की तरह स्नेह देने लगी थीं, और मैं भी उनके साथ एक बहू की तरह घर के कामों में हाथ बँटाने लगा था।
सुबह उठकर मैं उनके लिए चाय बना देता, घर की सफाई कर देता और रसोई में उनकी मदद करता। अगर उन्हें किसी चीज़ की जरूरत होती तो मैं तुरंत उनके पास पहुँच जाता।
कलावती माँ कभी-कभी मुझे देखकर भावुक हो जातीं। वह कहतीं,
“बेटा सागर, जब तू इन कपड़ों में मेरे घर में घूमता है तो मुझे लगता है जैसे मेरी बहू कुछ देर के लिए मेरे पास लौट आई हो।”
मैं मुस्कुराकर कहता,
“माँ, मैं आपकी बहू की जगह नहीं ले सकता, लेकिन अगर मेरे होने से आपका अकेलापन थोड़ा कम होता है तो मुझे खुशी है।”
कलावती माँ मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहतीं,
“तू मेरे लिए बहुत अनमोल है।”
इस तरह धीरे-धीरे मेरे और कलावती माँ के बीच एक अनोखा पारिवारिक रिश्ता बन गया। मैं उनके लिए बेटी जैसा बेटा था, और वह मेरे लिए माँ जैसी थीं।कलावती माँ को अपनापन देना और उनके अकेलेपन को कम करना था।
उधर श्याम के मन में भी धीरे-धीरे एक बदलाव आने लगा था।जब भी वह मुझे विद्या के कपड़ों में अपनी माँ की सेवा करते देखता, तो उसके भीतर पुरानी यादें जाग उठतीं। मेरी आवाज़, मेरा कद, मेरा चेहरा और मेरे हाव-भाव उसे अपनी पत्नी की याद दिलाते थे।कभी-कभी वह दूर खड़ा होकर मुझे देखता रहता और उसे कुछ पलों के लिए ऐसा लगता जैसे उसकी पत्नी विद्या सचमुच उसके घर में लौट आई हो।
लेकिन उसके मन में एक उलझन भी थी। वह जानता था कि मैं सागर हूँ। फिर भी उसकी भावनाएँ उसे बार-बार उसी पुराने रिश्ते की ओर खींच ले जाती थीं।धीरे-धीरे श्याम के मन में सागर और विद्या की छवि एक-दूसरे में मिलती चली गई। उसके लिए मैं केवल वह पड़ोसी सागर नहीं रह गया था, जो कभी-कभी उसके घर आता था। मेरी मौजूदगी उसके लिए उसकी खोई हुई पत्नी की यादों का सहारा बन गई थी।
एक रात श्याम ने खुद से कहा,“मैं जानता हूँ कि यह सागर है… लेकिन जब यह मेरे सामने विद्या के रूप में होता है, तो मेरा दिल उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेता है।”फिर वह कुछ देर चुप रहा।
उसे एहसास था कि यह भावना आसान नहीं थी। वह जानता था कि सागर की अपनी पहचान है और उसकी पत्नी विद्या अब इस दुनिया में नहीं थी। फिर भी उसकी यादों और भावनाओं के बीच सागर की मौजूदगी ने एक ऐसा स्थान बना लिया था, जिसे वह खुद भी पूरी तरह समझ नहीं पा रहा था।
उस रात श्याम के सामने मैं काफी देर तक चुप बैठा रहा। उसके मन की उलझन मैं समझ सकता था। उसकी आँखों में अपनी पत्नी विद्या की याद साफ दिखाई दे रही थी।
आखिर मैंने हिम्मत करके अपने मन की बात कह दी।“श्याम जी… मैं जानता हूँ कि मैं आपके घर आता हूँ, माँ के साथ रहता हूँ और विद्या के कपड़े पहनता हूँ, तो मुझे भी लगता है कि मैं सिर्फ सागर बनकर नहीं रह गया हूँ।”श्याम मेरी ओर देखने लगा।मैंने भावुक होकर आगे कहा,
“आपकी आँखों में जब मैं अपनी जगह नहीं, बल्कि विद्या की याद देखता हूँ, तो मेरे मन में भी एक भावना पैदा होती है। अगर इससे आपका दुख थोड़ा कम होता है, तो मैं आपके सामने विद्या बनकर हमेशा रहने को तैयार हूँ।”कुछ पल के लिए कमरे में पूरी खामोशी छा गई। फिर मैंने धीमे स्वर में कहा,
“श्याम… अगर तुम्हारे दिल को इससे सुकून मिलता है, तो आज से जब मैं इस घर में आऊँ, तुम मुझे सागर मत समझना। मुझे अपनी विद्या समझ लेना। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना—मैं तुम्हारी खोई हुई पत्नी की जगह लेने नहीं आया हूँ। मैं सिर्फ तुम्हारे दर्द को समझने और तुम्हारा साथ देने आया हूँ।”
श्याम की आँखों से आँसू निकल पड़े।उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस मेरी ओर देखता रहा।उस पल मुझे लगा कि हमारे बीच का रिश्ता किसी नाम का मोहताज नहीं था। वह दो अकेले इंसानों के दर्द, अपनापन और एक-दूसरे को समझने की कोशिश से बना था।
समय बीतने के साथ मेरे भीतर भी बहुत कुछ बदलने लगा। शुरुआत में मैं इस घर में सागर बनकर आता था और विद्या के कपड़े पहनकर कलावती माँ की सेवा करता था। लेकिन धीरे-धीरे यह रूप मेरे लिए केवल कपड़ों तक सीमित नहीं रहा।कलावती माँ मुझे अपनी बहू विद्या के नाम से पुकारने लगीं। श्याम भी मुझे उसी नजर से देखने लगा। घर के छोटे-छोटे काम, रिश्तों की बातें और रोज़मर्रा की जिंदगी में मेरा स्थान धीरे-धीरे वैसा ही हो गया, जैसा कभी विद्या का था।
एक दिन आईने के सामने खड़ा होकर मैंने खुद को देखा। मुझे अचानक एहसास हुआ कि मैं कब से अपने पुराने रूप और नाम से दूर होता जा रहा हूँ।
लेकिन अगले ही पल कलावती माँ की आवाज़ आई,“विद्या बेटा, जरा इधर आना।”मैं बिना सोचे उनकी ओर चल पड़ा। तभी मुझे महसूस हुआ कि इस घर में मुझे अब सागर नहीं, विद्या समझा जाता था। मैंने भी उस भूमिका को पूरी तरह स्वीकार कर लिया था। श्याम के लिए मैं उसकी पत्नी की याद भर नहीं रहा था;
Part 3
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