जब मैं उसकी पत्नी के कपड़ों में उसके सामने खड़ा था और मैंने कुछ कहा, तो श्याम एकदम चुप हो गया। मेरी आवाज़ सुनकर उसकी आँखों में फिर वही पुरानी यादें उतर आईं।
उसने धीमे से कहा,
“तुम्हारी आवाज़ भी बिल्कुल उसी जैसी लगती है…”
मैंने कुछ नहीं कहा।
वह मुझे ध्यान से देखता रहा। मेरे कद-काठी से लेकर चेहरे के भाव तक, उसे अपनी पत्नी की कई बातें याद आ रही थीं। शायद इसी वजह से उसके लिए मेरे सामने खड़ा होना आसान भी था और मुश्किल भी।
आसान इसलिए कि उसे अपने बीते हुए जीवन की कुछ खुशियाँ फिर से महसूस हो रही थीं, और मुश्किल इसलिए कि हर समानता उसे उस दर्दनाक हादसे की याद भी दिला रही थी जिसमें उसने अपनी पत्नी और बच्चों को खो दिया था।
श्याम की माँ ने उसकी ओर देखा और समझ गईं कि वह मेरे अंदर अपनी बहू की याद खोज रहा है।
उन्होंने शांत स्वर में कहा,
“बेटा, शक्ल और आवाज़ मिल सकती है, लेकिन हर इंसान की अपनी पहचान होती है। सागर को सागर ही रहने दो।”
श्याम ने धीरे से सिर हिला दिया।
उस रात मेरे लिए भी बहुत कुछ बदल गया था। मुझे पहली बार महसूस हुआ कि मेरे रूप में किसी और की याद बस गई है—और श्याम उस याद से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था।
मेरी लंबाई लगभग 5 फुट 3 इंच थी। रंग गोरा था और चेहरे के नैन-नक्श भी काफी कोमल थे। सबसे अलग मेरी आवाज़ थी—वह इतनी महीन और मधुर थी कि उसमें पुरुषों जैसी भारीपन की कोई झलक नहीं थी। पहली बार सुनने वाला मुझे आसानी से लड़की समझ सकता था।
उस रात जब मैं श्याम की पत्नी के कपड़े पहनकर उसके सामने खड़ा था और मैंने उससे कुछ कहा, तो वह एकदम चुप हो गया।
उसकी आँखें मेरे चेहरे पर टिक गईं।
शायद मेरी आवाज़ ने उसके मन में उसकी पत्नी की पुरानी यादों को और गहरा कर दिया था। मेरे कद, गोरे रंग, चेहरे की कोमलता और लड़की जैसी आवाज़ में उसे अपनी पत्नी की कई समानताएँ दिखाई दे रही थीं।
श्याम ने धीमे से कहा,
“सागर… तुम्हारी आवाज़ भी बिल्कुल उसकी जैसी है।”
मैंने झिझकते हुए उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में कोई गलत भावना नहीं थी। वहाँ सिर्फ अपनी खोई हुई पत्नी की याद और वर्षों से दबा हुआ दर्द था। वह मेरे अंदर अपनी पत्नी को नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी का वह हिस्सा खोज रहा था जो उस हादसे के बाद उससे हमेशा के लिए दूर हो गया था।
उस रात बारिश बाहर बरस रही थी, लेकिन श्याम के भीतर पुरानी यादों की बारिश शुरू हो चुकी थी।
मैंने श्याम की आँखों में अपनी पत्नी की याद का दर्द देखा तो मेरा मन भी भर आया। कुछ पल तक मैं चुप रहा, फिर भावुक होकर धीरे से बोला,
“श्याम जी… अगर आपको मेरा यह रूप अच्छा लगता है और इससे आपको अपनी पत्नी की यादों के बीच थोड़ा सुकून मिलता है, तो मुझे भी कोई ऐतराज़ नहीं है। अगर मैं आपके दुख को थोड़ा-सा भी बाँट सकूँ, तो मैं खुद को भाग्यशाली समझूँगा।”
मेरी बात सुनकर श्याम कुछ पल तक मुझे देखता रहा। उसकी आँखें नम हो गईं।
उसने धीमी आवाज़ में कहा,
“सागर, तुम मेरे दर्द को समझने की कोशिश कर रहे हो, इसके लिए मैं तुम्हारा आभारी हूँ। लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरी पुरानी यादों का बोझ तुम्हारी अपनी पहचान पर पड़े।”
मैंने सिर झुका लिया।
उस रात हमारे बीच कोई बड़ा वादा नहीं हुआ था। बस एक इंसान दूसरे इंसान के दर्द को समझने की कोशिश कर रहा था। बाहर बारिश लगातार बरस रही थी और भीतर कई वर्षों से बंद भावनाएँ धीरे-धीरे शब्दों में बदल रही थीं।
श्याम की माँ कलावती ने मेरी ओर स्नेह से देखा। उनकी आँखों में मेरे लिए अपनापन था। उन्होंने धीरे से कहा,
“बेटा सागर, अगर तुम चाहो तो जब मन करे यहाँ आ सकते हो। और अगर तुम्हें ठीक लगे तो कभी-कभी विद्या के कपड़े भी पहन सकते हो। मुझे उससे अपनी बहू की याद आती है। लेकिन बेटा, मैं तुम्हें किसी की जगह लेने के लिए नहीं कह रही हूँ। तुम जैसे हो, वैसे ही हमारे लिए अपने हो।”
मैं उनकी बात सुनकर चुप रहा।
कलावती माँ ने आगे कहा,
“और हो सके तो इस बूढ़ी माँ के घर के कामों में भी थोड़ा हाथ बँटा दिया करना। उम्र हो गई है, अब अकेले सब कुछ करना मुश्किल लगता है।”
उनकी बात में कोई दबाव नहीं था, सिर्फ एक माँ का स्नेह और अकेलेपन की पुकार थी।
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