सुबह कलावती माँ मेरे कमरे में आईं। मुझे देखकर उनके चेहरे पर ममता भरी मुस्कान थी। उन्होंने प्यार से कहा,
“विद्या बेटी, अब तू इस घर की बहू ही नहीं, एक सुहागन भी है। सजना-सँवरना और सोलह श्रृंगार हमारे यहाँ सिर्फ सुंदर दिखने के लिए नहीं होते। इनके पीछे भावनाएँ, परंपराएँ और अपने वैवाहिक जीवन के प्रति सम्मान जुड़ा होता है।”
मैं ध्यान से उनकी बातें सुनती रही।
कलावती माँ ने मुझे समझाते हुए कहा कि सोलह श्रृंगार में सामान्यतः बिंदी, सिंदूर, काजल, मेहंदी, चूड़ियाँ, मंगलसूत्र, नथ, झुमके, हार, पायल और अन्य आभूषण तथा साज-सज्जा के विभिन्न रूप शामिल माने जाते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसकी सूची और परंपरा थोड़ी अलग हो सकती है।
उन्होंने मेरे बाल सँवारते हुए कहा,
“बेटी, श्रृंगार तभी सुंदर लगता है जब उसे अपने मन से किया जाए। यह किसी मजबूरी का नाम नहीं है। तू चाहे तो सजे, अपने पति के लिए नहीं, बल्कि अपने मन की खुशी के लिए भी।”
मैं मुस्कुराई और माँ के हाथ पकड़कर बोली,
“माँ, आप मुझे इतना प्यार से समझाती हैं, तो मुझे भी यह सब सीखने में खुशी होगी।”
कलावती माँ ने मेरे माथे पर बिंदी लगाई और कहा,
“बस बेटी, हमेशा याद रखना—सबसे बड़ा श्रृंगार आत्मविश्वास और अपने रिश्तों में सच्चाई है।”
उनकी बात मेरे मन में गहराई तक उतर गई। उस दिन मुझे लगा कि मैं केवल एक नई दुल्हन की तरह सजना नहीं सीख रही थी, बल्कि कलावती माँ से उनके परिवार की परंपराएँ और एक नए जीवन की जिम्मेदारियाँ भी सीख रही थी।
कलावती माँ ने धीरे-धीरे घर की बहू की जिम्मेदारियाँ मुझे सौंपनी शुरू कर दीं। यह केवल घर के काम सीखने की बात नहीं थी; उनके लिए यह ऐसा था जैसे एक पीढ़ी अपनी परंपराएँ और जिम्मेदारियाँ अगली पीढ़ी को सौंप रही हो।
वह मुझे घर की हर छोटी-बड़ी बात समझातीं—कौन-सा सामान कहाँ रखा जाता है, घर के खर्च का हिसाब कैसे रखा जाता है, रिश्तेदारों का सम्मान कैसे किया जाता है और परिवार के सुख-दुख में किस तरह सबके साथ खड़ा रहा जाता है।
कभी वह रसोई में मेरे साथ बैठकर पुराने पारिवारिक व्यंजन सिखातीं, तो कभी पूजा-पाठ और त्योहारों की परंपराओं के बारे में बतातीं।
मैं भी उनकी हर बात ध्यान से सीखती।
एक दिन कलावती माँ ने कहा,
“विद्या बेटी, मैंने इतने साल इस घर को संभाला है। अब धीरे-धीरे इसकी जिम्मेदारी तुझे सौंप रही हूँ। घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता, उसे रिश्ते और अपनापन घर बनाते हैं।”
मैंने उनके पैर छूकर कहा,
“माँ, आपने जिस विश्वास से मुझे यह जिम्मेदारी दी है, मैं उसे पूरी ईमानदारी से निभाऊँगी।”
कलावती माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा।
“बस यही चाहती हूँ बेटी। जो मैंने अपनी सास से सीखा था, वह मैंने तुझे दे दिया। अब एक दिन तू भी इसे आगे बढ़ाना।”
उस क्षण मुझे सचमुच लगा कि जैसे परिवार की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक केवल जिम्मेदारियाँ नहीं, बल्कि संस्कार, अनुभव और प्रेम भी हस्तांतरित हो रहे थे।
और मैं उस विरासत को पूरे सम्मान के साथ स्वीकार कर रही थी।
उस दिन मैं सुबह से ही बहुत खुश थी। मेरे मन में एक ऐसी खबर थी, जिसे सुनाने के लिए मैं सबसे पहले कलावती माँ के पास जाना चाहती थी।
मैं उनके पास जाकर चुपचाप बैठ गई।
कलावती माँ ने मेरे चेहरे की खुशी देखकर पूछा,
“क्या बात है विद्या बेटी? आज तू इतनी खुश क्यों है?”
मैंने उनका हाथ अपने हाथों में लिया और भावुक होकर कहा,
“माँ… मैं आपको एक बहुत बड़ी खुशखबरी देने आई हूँ।”
वह उत्सुक होकर मेरी ओर देखने लगीं।
मैंने मुस्कुराते हुए कहा,
“माँ, अब हमारे घर में एक नन्हा मेहमान आने वाला है। मैं चाहती हूँ कि आप उसकी दादी बनें।”
मेरी बात सुनते ही कलावती माँ की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने मुझे तुरंत अपने गले से लगा लिया।
“सच बेटी? तूने आज मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी मुझे दी है।”
मैं भी उनकी बाँहों में सिर रखकर रोने लगी।
कुछ देर बाद कलावती माँ ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“अब मैं उस बच्चे की दादी बनने की तैयारी करूँगी। और तू मेरी बेटी है—मैं तेरे साथ हर कदम पर रहूँगी।”
उस दिन हमारे घर में जैसे एक नई उम्मीद ने जन्म लिया। श्याम को जब यह खबर मिली तो उसकी खुशी का भी ठिकाना नहीं रहा।
हम तीनों ने मिलकर आने वाले नन्हे मेहमान के लिए सपने देखना शुरू कर दिया।
समय धीरे-धीरे बीतता गया। जिस दिन का हम सभी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे, वह दिन आखिर आ ही गया।
घर में नन्हे बच्चे की किलकारी गूँज उठी। हमारे घर एक बेटे का जन्म हुआ।
जब श्याम ने पहली बार अपने बेटे को गोद में लिया, तो उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। वह कुछ पल तक उसे निहारता रहा, जैसे उसे विश्वास ही न हो रहा हो कि उसके जीवन में फिर से इतनी बड़ी खुशी लौट सकती है।
कलावती माँ ने जब अपने पोते को देखा तो उनकी आँखें भी भर आईं। उन्होंने बच्चे को प्यार से अपनी गोद में लिया और कहा,
“मेरे घर का आँगन फिर से आबाद हो गया।”
मैंने श्याम की ओर देखा। उसके चेहरे पर वर्षों बाद वह सुकून था, जिसकी मुझे हमेशा तलाश रहती थी।
श्याम मेरे पास आया और मेरा हाथ पकड़कर बोला,
“विद्या, तुमने मेरे जीवन को फिर से पूरा कर दिया।”
मैंने मुस्कुराकर बच्चे को देखा।
उस छोटे-से बच्चे के आने के साथ हमारे घर की पुरानी उदासी जैसे कहीं पीछे छूट गई थी। कलावती माँ के लिए वह उनका पोता था, श्याम के लिए उनका बेटा और मेरे लिए मेरे जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी और खुशी।
उस दिन मुझे लगा कि हमारे परिवार की कहानी ने एक नया अध्याय शुरू कर दिया है—एक ऐसी नई पीढ़ी, जो पुराने दुखों के बाद हमारे घर में नई उम्मीद बनकर आई थी।
समय किसी के लिए नहीं रुकता। हमारा बेटा धीरे-धीरे बड़ा होने लगा, लेकिन कलावती माँ की उम्र भी अब ढल चुकी थी।
एक दिन उनकी तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई। हम उन्हें अस्पताल ले गए, लेकिन डॉक्टरों की कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
जब यह खबर मुझे मिली, तो मेरे पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई।
“माँ…” मेरे मुँह से बस इतना ही निकल पाया।
घर लौटकर जब मैंने उन्हें अंतिम बार देखा, तो मेरी आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। मुझे बार-बार वह बरसात की रात याद आ रही थी, जब उन्होंने पहली बार मुझे अपनी बहू के कपड़े पहनाए थे।
उन्होंने ही मुझे अपनापन दिया था। उन्होंने मुझे घर की जिम्मेदारियाँ सौंपी थीं, मुझे बेटी की तरह प्यार किया था और बाद में अपनी बहू के रूप में स्वीकार किया था।
अंतिम विदाई के समय मैं उनके पास बैठकर रोते हुए बोली,
“माँ, आपने मुझे जो प्यार और सम्मान दिया, उसे मैं जिंदगी भर नहीं भूलूँगी। आपने मुझे सिर्फ इस घर की बहू नहीं बनाया, बल्कि मुझे अपना बच्चा समझकर संभाला था।”
श्याम भी अपनी माँ के पास बैठा रो रहा था। उसके लिए वह सिर्फ उसकी माँ नहीं थीं, बल्कि उसके जीवन की सबसे बड़ी ताकत थीं।
हमने नम आँखों से उन्हें अंतिम विदाई दी।
जब उनकी अर्थी घर से बाहर निकली, तो मुझे लगा जैसे इस घर की एक पूरी पीढ़ी हमसे विदा हो रही है।
लेकिन उनकी दी हुई सीख हमारे साथ थी।
मैंने अपने बेटे को सीने से लगाकर मन ही मन कहा,
“माँ, आपने जो संस्कार मुझे दिए हैं, मैं उन्हें आगे इसी बच्चे तक पहुँचाऊँगी। आपकी विरासत यहीं खत्म नहीं होगी।”
कलावती माँ चली गईं, लेकिन उनकी ममता, उनकी बातें और उनका आशीर्वाद हमेशा हमारे परिवार का हिस्सा बना रहा।
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