रात अभी बाकी थी। और उलझन और गहरी होती जा रही थी।
सुबह के साढ़े नौ बज रहे थे।
शांति देवी ने अमिता (सागर) को जल्दी उठाया, नए कपड़े पहनाए—इस बार हल्के गुलाबी रंग की साड़ी—और बालों की चोटी फिर से गूंथ दी। मेकअप भी हल्का कर दिया गया।
“आज तुम और भी सुंदर लग रही हो, बिटिया,” शांति देवी ने संतुष्ट होकर कहा। “राकेश आ ही गया होगा।”
दरवाज़े की घंटी बजी।
रिया ने दरवाज़ा खोला। सामने राकेश खड़ा था—सफेद शर्ट, नेवी ब्लू पैंट, हाथ में मीठे की डिब्बी और फूलों का छोटा सा गुलदस्ता। चेहरे पर हल्की घबराहट और उत्साह दोनों थे।
“नमस्ते बुआ जी… रिया भाभी…” उसने कहा, फिर उसकी निगाहें सीधे अमिता पर जाकर ठहर गईं।
एक पल के लिए राकेश की साँसें थम गईं।
अमिता साड़ी में, सिर पर पल्लू, माथे पर छोटी बिंदी, और शर्मीली निगाहें झुकाए खड़ी थी। राकेश को ऐसा लगा जैसे कोई पुरानी फिल्म की नायिका सामने खड़ी हो।
“नमस्ते…” सागर ने पतली आवाज़ में कहा और हल्के से मुस्कुरा दिया।
राकेश का चेहरा तुरंत लाल हो गया। उसने गुलदस्ता आगे बढ़ाया, “ये… ये आपके लिए।”
सागर ने फूल ले लिए। उंगलियाँ हल्की काँप रही थीं।
शांति देवी ने दोनों को ड्राइंग रूम में बिठाया। चाय-नाश्ता आया। राकेश अमिता की तरफ बार-बार देख रहा था। बातें सामान्य थीं—पढ़ाई, नौकरी, परिवार—लेकिन राकेश की आँखों में साफ दिख रहा था कि वो पूरी तरह प्रभावित हो चुका है।
आधे घंटे बाद शांति देवी ने रिया को किचन में भेज दिया और खुद भी बहाने से बाहर चली गईं।
कमरा सिर्फ राकेश और अमिता के लिए रह गया।
राकेश ने हिम्मत करके कहा, “अमिता जी… मैंने कल रात आपकी फोटो देखी थी। लेकिन असल में आप और भी… अच्छी लग रही हैं। बहुत शांत और सुशील। मुझे… मुझे आप बहुत पसंद आ गई हैं।”
सागर ने पल्लू से चेहरा ढक लिया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था—डर और अजीब सी घबराहट से।
राकेश आगे बढ़ा, “अगर आपको कोई आपत्ति न हो… तो क्या मैं अपने घर वालों से बात आगे बढ़ाऊँ? बुआ जी भी चाहती हैं कि रिश्ता जल्दी पक्का हो जाए।”
सागर चुप रहा। अंदर ही अंदर वो खुद से लड़ रहा था।
‘मना कर दो… अभी मना कर दो… वरना ये जाल और फँसेगा…’
लेकिन शांति देवी दरवाज़े के पीछे खड़ी सब सुन रही थीं। उन्होंने धीरे से खांसकर याद दिलाया कि वो वहाँ हैं।
सागर ने आँखें बंद कीं। फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोला, “…जी।”
राकेश की आँखें चमक उठीं। “सच? आप… आप हाँ कह रही हैं?”
सागर ने सिर हिला दिया। पल्लू के पीछे उसके दाँत भींचें हुए थे।
“हाँ… मुझे… आपको भी… ठीक लग रहे हैं।”
इतना कहते ही शांति देवी कमरे में घुस आईं। चेहरे पर बड़ी मुस्कान थी।
“बस! हो गया!” उन्होंने ताली बजाई। “राकेश, तू भाग्यशाली है। अमिता जैसी लड़की मिलना आसान नहीं। अब रिश्ता पक्का मान लो। मैं आज ही राकेश की माँ को फोन करके बता देती हूँ। और अमिता के घर वालों से भी बात करवाऊँगी।”
राकेश खुशी से पागल हो रहा था। उसने सागर की तरफ देखकर कहा, “धन्यवाद… अमिता जी। मैं आपको निराश नहीं करूँगा।”
सागर ने मुश्किल से मुस्कान निभाई। अंदर से वो चिल्ला रहा था—‘मैं मर्द हूँ यार! मर्द!’
रिया किचन से निकली तो शांति देवी ने उसे गले लगा लिया। “रिया, तेरी सहेली अब हमारी बहू बनने वाली है! जल्दी से मिठाई ला।”
राकेश ने सागर से एक और बात कही, “कल या परसों मैं आपको अपने घर ले चलूँगा। माँ आपसे मिलना चाहेंगी। और… अगर आप चाहें तो हम दोनों अकेले भी घूम सकते हैं।”
सागर ने सिर्फ सिर हिलाया।
शांति देवी ने फोन निकाला और राकेश की माँ को कॉल लगा दी।
“बहू मिल गई है हमें! अमिता नाम है। बहुत संस्कारी है। राकेश को भी पसंद आ गई। रिश्ता पक्का समझो। अब जल्द से जल्द रोका और सगाई करवा देते हैं।”
फोन पर दूसरी तरफ खुशी के स्वर गूँज रहे थे।
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