Family · Hindi

बरसात की वह रात

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Part 1

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श्याम फौज से रिटायर होकर अपने घर वापस आया था। उसके घर में उसकी माँ और वह खुद ही थे। एक हादसे में श्याम की बीवी और बच्चे मर चुके थे। उस हादसे के बाद श्याम बिल्कुल अकेला हो गया था।
बरसात की वह रात मुझे आज भी याद है।श्याम मेरे पड़ोस में रहता था। मेरा नाम सागर था। आज मेरा नाम श्रीमती विद्या श्याम धनौआ है। यह मेरी कहानी है।
उस रात तेज़ आँधी के साथ मूसलाधार बारिश हो रही थी। मैं बारिश में पूरी तरह भीग गया था। श्याम अपने घर के बाहर खड़ा होकर बारिश का आनंद ले रहा था। उसने मुझे देखा तो तुरंत अपने घर की ओर बुलाया।उसने कहा,“तुम बहुत भीग गए हो। अंदर आ जाओ। मेरे कपड़े पहन लो।”
मेरे सारे कपड़े, जिन्हें मैंने सूखने के लिए बाहर रखा था, बारिश में भीग चुके थे। इसलिए मैं उसके घर के अंदर चला गया।श्याम ने अपनी माँ से कहा कि मेरे लिए उसके कपड़े निकाल दें। उसकी माँ ने मुझे श्याम की अलमारी से कपड़े लेने को कहा, लेकिन अलमारी की चाबी कहीं नहीं मिली।
तब उसकी माँ ने कुछ देर सोचकर कहा,“बेटा, रहने दो। अब एक ही रास्ता है। अगर तुम्हें सही लगे तो तुम मेरी बहू के कपड़े पहन लो।”मैं एक पल के लिए चुप हो गया। मेरे मन में झिझक थी। लेकिन बाहर बारिश और ठंड लगातार बढ़ रही थी। अगर मैंने कपड़े नहीं बदले तो मुझे सर्दी लग सकती थी।आखिर मैंने हामी भर दी।
श्याम की माँ ने मुझे अपनी बहू के कपड़ों में से एक अच्छा-सा सूट और सलवार निकालकर दिया। मैंने वह कपड़े पहन लिए।जब मैंने आईने में खुद को देखा तो मैं खुद ही हैरान रह गया। मेरे कंधों तक आते बाल, चेहरे की कोमलता और वह सूट—सब मिलकर मुझे बिल्कुल एक लड़की जैसा रूप दे रहे थे। श्याम की माँ मुझे कुछ देर तक देखती रही।उनकी आँखों में न जाने कितनी यादें तैरने लगीं। शायद उन्हें अपनी बहू की याद आ गई थी।उन्होंने धीरे से कहा,“बेटा… आज तो तू बिल्कुल मेरी बहू जैसी लग रही है।”
मैं कुछ नहीं बोल पाया।उस रात मुझे पहली बार एहसास हुआ कि कपड़े सिर्फ शरीर नहीं ढकते, वे कभी-कभी अपने साथ किसी की यादें भी लेकर आते हैं।श्याम दरवाज़े के पास खड़ा था। उसकी नजर मुझ पर पड़ी तो वह भी कुछ पल के लिए चुप रह गया।बाहर बारिश अब भी लगातार हो रही थी। लेकिन उस रात मेरे जीवन में भी कुछ ऐसा बदल रहा था, जिसका मुझे उस समय बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था।
श्याम की नज़र मुझ पर पड़ी तो उसके चेहरे पर अचानक एक अजीब-सी उदासी उतर आई। शायद उसे अपनी पत्नी की याद आ गई थी।
उसे अपनी पत्नी की सुंदरता याद आने लगी—उसकी बड़ी-बड़ी आँखें, लंबे काले बाल, चेहरे पर हमेशा रहने वाली हल्की मुस्कान और सादगी से भरा हुआ चेहरा। वह जब साड़ी या सलवार-सूट पहनती थी तो श्याम की नजर कुछ पल के लिए उस पर ठहर जाती थी।
श्याम को याद था कि उसकी पत्नी बारिश के मौसम को बहुत पसंद करती थी। पहली बारिश होते ही वह खिड़की के पास खड़ी होकर बारिश देखा करती थी। उसके बाल बारिश की हवा से चेहरे पर आ जाते और वह मुस्कुराते हुए उन्हें कान के पीछे कर लिया करती थी।
उन यादों ने श्याम की आँखें नम कर दीं।
उसने मेरी तरफ देखा। शायद मेरे कपड़ों और रूप में उसे अपनी पत्नी की कोई झलक दिखाई दे रही थी। लेकिन मैं उसकी पत्नी नहीं था—मैं सागर था। उस समय मुझे सिर्फ इतना समझ आ रहा था कि श्याम के दिल में अपनी पत्नी की याद आज भी उतनी ही गहरी थी।
श्याम की माँ ने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा,
“बेटा, पुरानी यादों को दिल में रखो, लेकिन खुद को उनमें मत खो देना।”
श्याम ने कोई जवाब नहीं दिया।
बाहर बारिश बरसती रही और अंदर बीते हुए वर्षों की यादें दोनों के बीच खामोशी बनकर खड़ी रहीं।
श्याम की आँखें मुझ पर ठहर गईं। शायद वह मेरे भीतर अपनी पत्नी की कोई झलक खोज रहा था। मेरे पहने हुए कपड़े, कंधों तक आते बाल और मेरा बदला हुआ रूप उसे बीते दिनों की याद दिला रहे थे।
वह कुछ पल तक चुप रहा, फिर धीमे स्वर में बोला,
“सागर… आज तुम्हें देखकर मुझे उसकी याद आ गई।”
मैंने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ कह नहीं पाया।
श्याम की आँखों में अपनी पत्नी के साथ बिताए हुए वर्षों की यादें थीं। वह शायद मेरे चेहरे में उसकी मुस्कान, मेरे हाव-भाव में उसकी सादगी और मेरे पहनावे में उसकी मौजूदगी तलाश रहा था। वह जानता था कि मैं उसकी पत्नी नहीं हूँ, फिर भी उस बरसाती रात में मेरे रूप ने उसके भीतर दबे हुए पुराने दर्द को जगा दिया था।
उसकी माँ ने यह सब देखा तो बोलीं,
“श्याम, यह सागर है… इसे किसी और की जगह मत समझना।”
श्याम ने सिर झुका लिया।
“माँ, मैं जानता हूँ,” उसने धीरे से कहा, “लेकिन आज बहुत दिनों बाद ऐसा लगा जैसे मेरी जिंदगी का कोई खोया हुआ हिस्सा मेरे सामने आकर खड़ा हो गया हो।”
श्याम के लिए यह बात और भी विचित्र थी, क्योंकि मेरा कद, रूप-रंग और आवाज़—सब कुछ उसकी पत्नी से काफी मिलता-जुलता था। मुझे खुद भी इसका एहसास उस रात पहली बार हुआ।

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