Friends · Hindi

दोस्त की पत्नी

दोस्त की पत्नी Cover Image
In Progress | Part 5 of 6 | 0 Likes

Part 5

Part 5 Image

उसने मन ही मन सोचा, “आज फिर से विवाह की रस्में होंगी। लेकिन मैं इस परिवार से जो सच छिपा रही हूँ, उसका क्या होगा?”
उसे सुमित्रा का स्नेह याद आया—कैसे उन्होंने पहली मुलाकात में ही उसे बेटी की तरह अपनाया था। फिर सोनिया का चेहरा आँखों के सामने आया, जो उसे अपनी भाभी मानकर हर बात उससे साझा करती थी।
विद्या की आँखें नम हो गईं।
तभी सोनिया कमरे में आई और बोली, “भाभी, आप तैयार हैं? सब मंदिर जाने के लिए इंतज़ार कर रहे हैं।”
विद्या ने जल्दी से अपनी आँखें पोंछीं और मुस्कुराने की कोशिश की। “हाँ सोनिया, मैं तैयार हूँ।”
मंदिर पहुँचने पर चारों ओर विवाह की तैयारियाँ दिखाई दे रही थीं। फूलों से मंडप सजाया गया था और पंडित जी ने पूजा की सामग्री तैयार कर रखी थी। परिवार के सभी लोग उत्साह में थे।
राज ने विद्या की ओर देखा। उसकी आँखों में भी चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
पंडित जी ने विवाह की रस्में शुरू कीं। मंत्रों की आवाज़ के बीच विद्या का मन बार-बार अपने सच की ओर लौट रहा था।
एक पल के लिए उसने सोचा कि अभी सबके सामने सच बता दे। शायद यही सही समय है। लेकिन अगले ही क्षण उसे सुमित्रा का चेहरा याद आया और उसके कदम रुक गए।
“अगर सच बताने से माँ जी का दिल टूट गया तो?”
उसने फिर सोनिया की ओर देखा, जो खुशी से मुस्कुरा रही थी।
“और अगर सोनिया को पता चला कि जिसे वह अपनी भाभी समझती रही, वह वास्तव में कुछ और है, तो क्या वह मुझे कभी माफ़ कर पाएगी?”
विद्या के हाथ काँपने लगे।
राज ने धीरे से उसकी ओर देखा और उसकी परेशानी समझ गया। उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “विद्या, अगर तुम ठीक नहीं हो तो हम अभी रुक सकते हैं।”
विद्या ने कुछ पल उसकी ओर देखा। फिर उसने मंदिर के सामने बैठे पूरे परिवार को देखा।
उसके सामने दो रास्ते थे—एक तरफ सच बताने का साहस और दूसरी तरफ उन लोगों की भावनाएँ, जिन्होंने बिना किसी सवाल के उसे अपने परिवार का हिस्सा बना लिया था।
पंडित जी ने अगली रस्म के लिए दोनों को बुलाया।
मंदिर का पूरा प्रांगण फूलों और दीपों से सजा हुआ था। सुबह की सुनहरी धूप मंदिर की सीढ़ियों पर पड़ रही थी और हवा में अगरबत्ती तथा फूलों की सुगंध फैली हुई थी। घंटियों की मधुर आवाज़ के बीच पंडित जी ने विवाह की अंतिम रस्में शुरू कर दीं।
राज और विद्या मंडप में आमने-सामने बैठे थे। चारों ओर सुमित्रा, रंजीत, सोनिया और रिश्तेदार मौजूद थे। सोनिया उत्साह से अपनी भाभी को देख रही थी, जबकि सुमित्रा की आँखों में खुशी और संतोष था।
पंडित जी ने मंत्रोच्चार शुरू किया। अग्नि प्रज्वलित हुई और उसकी लौ धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी। राज और विद्या ने अग्नि को साक्षी मानकर विवाह की रस्में पूरी करनी शुरू कीं।
जब दोनों ने फेरे लेना शुरू किया, तो विद्या के कदमों के साथ उसके मन की उलझन भी बढ़ती गई। हर फेरे के साथ उसे लगता जैसे वह अपने पुराने जीवन से और दूर होती जा रही है।
सातवाँ फेरा पूरा हुआ तो मंदिर की घंटियाँ एक साथ बज उठीं। परिवार के लोगों ने फूल बरसाए और सोनिया खुशी से ताली बजाने लगी।
पंडित जी ने मुस्कुराकर कहा, “विवाह की सभी रस्में पूर्ण हुईं। भगवान आप दोनों को सुखी रखें।”
सुमित्रा ने आगे बढ़कर विद्या को गले लगा लिया। “बेटी, आज से तुम इस परिवार का और भी अभिन्न हिस्सा हो।”
विद्या की आँखें नम हो गईं। उसने सुमित्रा को कसकर पकड़ लिया, लेकिन उसके मन में छिपा सच उसे भीतर से बेचैन कर रहा था।
मंदिर के बाहर शंख की आवाज़ गूँजी और परिवार खुशी-खुशी घर लौटने लगा। सबके लिए यह एक नए रिश्ते की शुरुआत थी,
मंदिर की घंटियाँ अब भी बज रही थीं। विवाह की रस्में पूरी हो चुकी थीं और परिवार के सभी लोग खुशी में एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे। लेकिन मंडप के एक कोने में बैठे राज और विद्या के मन में बिल्कुल अलग ही हलचल थी।
राज ने विद्या की ओर देखा। उसके मन में अपराधबोध था। उसने सोचा, “यह सब मैंने शुरू किया था। मैंने अपनी शादी से बचने के लिए विद्या से मदद माँगी थी। लेकिन अब माँ, पिताजी और सोनिया उसे सचमुच परिवार का हिस्सा मान चुके हैं। अगर सच सामने आया तो सबसे ज्यादा चोट इन्हीं लोगों को लगेगी।”
उधर विद्या भी शांत बैठी थी, लेकिन उसके भीतर भावनाओं का तूफान चल रहा था। उसने सोचा, “मैं यहाँ सिर्फ राज की मदद करने आई थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि यह परिवार मुझे इतना अपनाएगा। माँ जी का प्यार, सोनिया का विश्वास और पिताजी का सम्मान—इन सबने मेरे मन में इस घर के लिए एक अलग जगह बना दी है।”
राज ने धीमे से पूछा, “विद्या, तुम ठीक हो?”
विद्या ने उसकी ओर देखा और बोली, “पता नहीं, राज। मुझे खुशी भी हो रही है और डर भी लग रहा है।”
राज ने कहा, “मुझे भी। मुझे लगता है कि हमने जिस बात को एक छोटे से बहाने के रूप में शुरू किया था, वह अब बहुत बड़ी जिम्मेदारी बन चुकी है।”
विद्या ने मंदिर की ओर देखा। “अब हमें फैसला करना होगा। हम कब तक यह सच छिपाएँगे?”
राज के पास कोई जवाब नहीं था।
दोनों कुछ देर चुप रहे। सामने परिवार हँस रहा था, मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं और फूलों की खुशबू हवा में फैली हुई थी। बाहर सब कुछ खुशियों से भरा था,
मंदिर की रस्में पूरी होने के बाद राज के मामा जगमोहन भी वहाँ पहुँच गए। वे पेशे से वकील थे और परिवार में उनकी काफी समझदारी मानी जाती थी। उन्होंने राज और विद्या को अपने पास बुलाया।
जगमोहन ने कुछ कागज़ निकालते हुए कहा, “राज बेटा, शादी की रस्में तो पूरी हो गई हैं। अब विवाह प्रमाण-पत्र के लिए आवेदन भी कर देते हैं। तुम दोनों इस फॉर्म पर यहाँ हस्ताक्षर कर दो।”
राज और विद्या ने एक-दूसरे की ओर देखा। विद्या के चेहरे पर फिर से चिंता झलकने लगी। उसने काँपते हाथों से आवेदन-पत्र लिया और राज के साथ उस पर हस्ताक्षर कर दिए।
जगमोहन ने कागज़ संभालते हुए कहा, “ठीक है। मैं आवेदन जमा करवा दूँगा। लगभग दो दिन में विवाह प्रमाण-पत्र आ जाना चाहिए।”
यह सुनकर राज कुछ पल के लिए चुप रह गया। उसे एहसास हुआ कि अब उनका बनाया हुआ बहाना आधिकारिक दस्तावेज़ का रूप लेने जा रहा था।
दो दिन बाद मामा जगमोहन फिर घर आए। उनके हाथ में विवाह प्रमाण-पत्र था। उन्होंने राज और विद्या को अपने पास बुलाकर कागज़ उनके सामने रख दिया।
जगमोहन ने कहा, “राज बेटा, अब तुम्हारी शादी का पंजीकरण भी हो गया है। यह रहा तुम्हारा विवाह प्रमाण-पत्र।”
राज ने प्रमाण-पत्र हाथ में लिया और कुछ क्षण तक उसे देखता रहा। विद्या भी उसके पास खड़ी थी। दोनों के चेहरों पर एक साथ हैरानी और चिंता दिखाई दे रही थी।
जगमोहन ने मुस्कुराकर कहा, “अब कानूनी रिकॉर्ड में भी तुम दोनों पति-पत्नी के रूप में दर्ज हो चुके हो।”
यह सुनते ही राज और विद्या ने एक-दूसरे की ओर देखा। कुछ दिनों पहले शुरू हुआ उनका छोटा-सा नाटक अब कानूनी दस्तावेज़ का हिस्सा बन चुका था।

412 Views 0 Comments
Disclaimer

CD Stories is a multilingual open platform. Stories published are generated by writers. The platform has not reviewed, modified, or validated contents and holds no liability regarding content quality or copyright infringements.

Discussion (0)

No comments shared yet. Be the first to share your thoughts!
Want to comment? Please Login or Sign Up.
Reading preferences
100%
Home Discover 0 Alerts Writers Login