सागर स्क्रीन पर जमी तीस साल पुरानी तस्वीर को देखता रह गया।
तस्वीर में वही चेहरा था।
वही लंबे बाल।
वही स्त्रैण चेहरा।
और तस्वीर के नीचे साफ लिखा था—
“सागर।”
राज ने काँपती आवाज़ में पूछा, “लेकिन ये असंभव है। तुम तो तीस साल पहले पैदा भी नहीं हुए थे।”
अचानक स्क्रीन पर तस्वीर के नीचे छिपा हुआ दूसरा हिस्सा दिखाई देने लगा।
“सागर — वास्तविक नाम: आर्या।”
सागर के चेहरे पर हैरानी छा गई।
“आर्या?”
तभी थिएटर के अँधेरे से एक वृद्ध व्यक्ति सामने आया। उसके हाथ में पुरानी फाइल थी।
उसने कहा, “अब तुम्हें सच जानने का समय आ गया है।”
उसने फाइल राज को दे दी।
पहले पन्ने पर लिखा था—
अन्धकार थिएटर — परिवर्तन प्रयोग, 1996
राज ने पन्ना पलटा।
उसमें लिखा था कि तीस साल पहले इस थिएटर में एक विशेष प्रयोग किया गया था। प्रयोग का उद्देश्य किसी व्यक्ति की बाहरी पहचान को पूरी तरह बदलना था। लेकिन प्रयोग के बाद उसमें शामिल एक लड़की, आर्या, अचानक गायब हो गई।
वृद्ध व्यक्ति ने सागर की ओर देखा।
“आर्या गायब नहीं हुई थी।”
सागर ने धीमे से पूछा, “तो फिर?”
“उसने अपनी पहचान बदलकर नई जिंदगी शुरू की।”
सागर की आँखें फैल गईं।
“लेकिन मेरा इससे क्या संबंध है?”
वृद्ध व्यक्ति ने फाइल का आखिरी पन्ना खोला।
उसमें एक पुराना दस्तावेज़ था—और उस पर सागर के परिवार का नाम लिखा था।
“तुम आर्या के परिवार से जुड़े हो। इस थिएटर ने तुम्हें इसलिए चुना क्योंकि तुम्हारे परिवार की कहानी यहीं से शुरू हुई थी।”
सागर ने स्क्रीन की ओर देखा।
पुरानी तस्वीर फिर दिखाई दी।
इस बार तस्वीर में आर्या अकेली नहीं थी।
उसके साथ एक छोटा लड़का खड़ा था।
राज ने तस्वीर को ध्यान से देखा।
फिर उसका चेहरा अचानक बदल गया।
“सागर... इस लड़के को देख।”
सागर ने तस्वीर पर नज़र डाली।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
वह लड़का राज के बचपन के चेहरे जैसा दिखाई दे रहा था।
तभी स्क्रीन पर आखिरी संदेश उभरा—
“अब कहानी सिर्फ सागर की नहीं है।”
थिएटर का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल गया।
लेकिन उसके बाहर थिएटर की लॉबी नहीं थी।
वहाँ एक बिल्कुल वैसा ही पुराना सिनेमाघर था—
तीस साल पहले का “अन्धकार”।
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