राज ने पुरानी तस्वीर फिर से स्क्रीन पर देखी।
“लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही,” उसने कहा। “अगर तस्वीर तीस साल पुरानी है, तो इसमें सागर कैसे हो सकता है?”
वृद्ध व्यक्ति ने शांत स्वर में जवाब दिया—
“क्योंकि तस्वीर में सागर नहीं है।”
सागर ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
“तो कौन है?”
वृद्ध व्यक्ति ने तस्वीर पर उंगली रखी।
“आर्या।”
सागर कुछ पल चुप रहा।
“आर्या कौन?”
वृद्ध व्यक्ति ने कहा—
“कोई दूसरी महिला नहीं। आर्या और तुम दो अलग लोग नहीं हो।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“इस थिएटर का रहस्य समय और पहचान से जुड़ा है। तीस साल पहले आर्या नाम की एक महिला यहाँ आई थी। उसने अन्धकार के प्रयोग का सामना किया था। प्रयोग ने उसके शरीर को नहीं, बल्कि उसकी पूरी पहचान को बदल दिया था।”
सागर ने धीरे से पूछा—
“तो आर्या अब कहाँ है?”
वृद्ध व्यक्ति ने सीधे उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारे सामने।”
सागर पीछे हट गया।
“नहीं... मैं सागर हूँ।”
“तुम सागर के रूप में जीते रहे हो,” वृद्ध व्यक्ति ने कहा, “लेकिन इस थिएटर के नियमों के अनुसार तुम्हारी मूल पहचान आर्या है।”
सागर को अचानक अपने बचपन की कुछ धुंधली यादें आने लगीं—एक पुराना सिनेमाघर, लाल पर्दा और किसी महिला की आवाज़ उसे पुकारती हुई।
“आर्या...”
उसने अपना सिर पकड़ लिया।
राज ने उसका हाथ थाम लिया।
“सागर, तुम ठीक हो?”
सागर ने आँखें खोलीं।
अब उसके सामने तस्वीर नहीं, बल्कि उसकी अपनी पुरानी याद खड़ी थी।
उसे समझ आने लगा कि तीस साल पुरानी तस्वीर में दिखाई देने वाली महिला उसकी हमउम्र कोई दूसरी व्यक्ति नहीं थी।
वह स्वयं थी।
अन्धकार ने उसे समय में पीछे भेजकर तीस साल पहले नहीं पहुँचा दिया था।
बल्कि थिएटर की शक्ति ने उसकी वर्तमान पहचान के पीछे छिपी आर्या की पहचान को फिर से सामने ला दिया था।
वृद्ध व्यक्ति ने आखिरी बात कही—
“इसलिए तुम्हारी उम्र नहीं बदली। समयरेखा भी नहीं बदली। आर्या कोई तीस साल पुरानी अलग महिला नहीं है। आर्या वही व्यक्ति है जिसे दुनिया आज सागर के नाम से जानती है।”
सागर ने स्क्रीन पर अपनी पुरानी तस्वीर देखी।
अब तस्वीर का रहस्य डरावना कम और व्यक्तिगत अधिक हो चुका था।
Part 7
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