अँधेरे में वह नाम फिर सुनाई दिया।
"एलिस..."
मैं जम गई।
मेरी साँस जैसे रुक गई थी।
"एलिस..."
इस बार आवाज़ मेरे बिल्कुल पास से आई।
मैंने एलेना का हाथ कसकर पकड़ लिया।
"तुमने भी सुना?"
उसने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"यह नाम..."
मैंने वाक्य पूरा नहीं किया।
एलेना ने मेरी आँखों में देखा।
"तुम्हारा नाम है।"
"लेकिन मेरा नाम तो—"
मैं रुक गई।
मेरा पुराना नाम मेरे मन में आया।
वह नाम जो जन्म के समय मेरे माता-पिता ने रखा था।
वह नाम जिससे कॉलेज में मेरे दोस्त मुझे बुलाते थे।
लेकिन अचानक वह नाम किसी पुराने दस्तावेज़ की तरह लगने लगा—सही, परिचित, मगर मेरे वर्तमान अस्तित्व से दूर।
"एलिस," मैंने बहुत धीरे से खुद कहा।
शब्द मेरे मुँह से निकलते ही मेरे भीतर वही गर्म शक्ति दौड़ गई।
पत्थर के चबूतरे पर बना चिन्ह चमक उठा।
कमरे में बैठे सभी लोग एक साथ खड़े हो गए।
पादरी ने आँखें बंद कर लीं।
"अब इसे समझना शुरू करना होगा," उन्होंने कहा।
मैंने गुस्से में पूछा, "क्या समझना होगा?"
उन्होंने मेरी ओर देखा।
"कि तुम्हारे साथ जो हुआ वह कोई अचानक हुआ चमत्कार नहीं था।"
"तो क्या था?"
"एक अधूरा परिवर्तन।"
मेरे माथे पर बल पड़ गए।
"अधूरा?"
"तुम्हारा शरीर बदल गया। तुम्हारी स्मृतियाँ नहीं।"
एलेना ने धीरे से कहा, "इसीलिए उसे सब कुछ याद है।"
पादरी ने सिर हिलाया।
"और यही कारण है कि वह दूसरों से अलग है।"
"दूसरों से?"
मैंने कमरे में बैठे लोगों की तरफ देखा।
तभी मेरी नज़र एक बुज़ुर्ग महिला पर पड़ी।
वह मुझे देखकर रो रही थी।
"तुम्हारी माँ भी ऐसी ही थी," उसने कहा।
मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
"मेरी माँ?"
महिला ने सिर झुका लिया।
"वह पहली बार यहाँ लड़की बनकर नहीं आई थी।"
मेरी साँस अटक गई।
"तो वह...?"
"वह भी बदली थी।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
मुझे लगा जैसे मेरी पूरी ज़िंदगी अचानक किसी और ने लिखी हुई कहानी बन गई हो।
मैंने पादरी की ओर देखा।
"मेरी माँ कौन थी?"
उन्होंने उत्तर देने से पहले काफी देर तक मुझे देखा।
"तुम्हारी माँ इस चर्च की सदस्य बनने से पहले तुम्हारी तरह ही थी।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"वह भी अपने परिवार की बेटी थी। वह भी एक दिन यहाँ आई थी। लेकिन उसने परिवर्तन के बाद चर्च छोड़ दिया।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसे लगा कि उसे अपनी ज़िंदगी खुद चुननी चाहिए।"
मैंने राहत की साँस ली।
कम-से-कम मेरी माँ ने कभी विद्रोह किया था।
लेकिन पादरी की अगली बात ने वह राहत भी छीन ली।
"फिर वह वापस आई।"
"क्यों?"
"तुम्हारे लिए।"
मेरी आँखें फैल गईं।
"मेरे लिए?"
"जब तुम्हारा जन्म हुआ, उसे डर था कि तुम्हारे भीतर भी वही शक्ति होगी।"
मैंने काँपती आवाज़ में पूछा—
"तो उसने मुझे आपसे क्यों नहीं बचाया?"
पादरी ने पहली बार नज़रें झुका लीं।
"शायद वह तुम्हें बचाना चाहती थी।"
"शायद?"
"क्योंकि उसने आखिरी क्षण में अपना निर्णय बदल दिया।"
मैंने तुरंत समझ लिया।
मेरे परिवार का मेरे बदलाव को इतनी आसानी से स्वीकार करना।
माँ का मेरी नई ज़िंदगी को लेकर बिल्कुल न घबराना।
पापा का पहले से तैयार होना।
ये सब अचानक बहुत स्पष्ट लगने लगा।
"माँ जानती थी," मैंने कहा।
पादरी ने उत्तर नहीं दिया।
मुझे किसी उत्तर की ज़रूरत भी नहीं थी।
मुझे पता था।
उस रात मैं घर लौटी तो माँ रसोई में थीं।
उन्होंने मुझे देखते ही मुस्कुराया।
"तुम कहाँ गई थीं?"
मैंने कोई उत्तर नहीं दिया।
बस पूछा—
"माँ, एलिस कौन है?"
उनके हाथ से प्लेट गिर गई।
काँच फर्श पर टूट गया।
माँ ने मेरी ओर देखा।
उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था।
कुछ सेकंड तक हम दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर उन्होंने बहुत धीरे से कहा—
"तुम वहाँ गई थीं।"
मैंने सिर हिलाया।
"हाँ।"
माँ कुर्सी पर बैठ गईं।
उनकी आँखों में आँसू आ गए।
"मुझे उम्मीद थी कि तुम्हें कभी पता नहीं चलेगा।"
मैं उनके सामने बैठ गई।
"आप मुझे सब बताएँगी।"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"एलिस मेरी बहन थी।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तुम्हारे जन्म से पहले वह इस चर्च में आई थी। उसे भी वही अनुभव हुआ था। लेकिन उसने पादरी की बात मानने से इनकार कर दिया।"
"फिर?"
"वह गायब हो गई।"
"गायब?"
माँ ने सिर हिलाया।
"चर्च ने कहा कि वह अपनी इच्छा से चली गई। लेकिन मैं जानती थी कि यह सच नहीं था।"
मेरे शरीर में ठंड उतर गई।
"फिर आपने मुझे यहाँ क्यों लाया?"
माँ ने मेरी ओर देखा।
उनके चेहरे पर अपराधबोध साफ़ था।
"क्योंकि जब तुम्हारा जन्म हुआ, तुम्हारे कमरे में वही चिन्ह अपने आप दिखाई दिया था।"
मैंने साँस रोक ली।
"कहाँ?"
माँ ने मेरे हाथ की ओर देखा।
"तुम्हारी हथेली पर।"
मैंने तुरंत अपना हाथ देखा।
पहले मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया।
फिर मेरी त्वचा के नीचे हल्की-सी रोशनी चमकी।
एक छोटा-सा वृत्त।
उसके भीतर दो जुड़ी हुई आकृतियाँ।
बिल्कुल वही चिन्ह।
माँ ने फुसफुसाकर कहा—
"अब वे तुम्हें कभी जाने नहीं देंगे।"
उसी क्षण घर के बाहर चर्च की घंटी बजी।
एक बार।
फिर दूसरी बार।
फिर तीसरी बार।
माँ ने खिड़की की ओर देखा।
और उनके चेहरे पर ऐसा डर आया जो मैंने उनमें कभी नहीं देखा था।
"वे आ गए।"
मैंने पूछा—
"कौन?"
उन्होंने उत्तर नहीं दिया।
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
तीन बार।
धीरे।
समान अंतराल पर।
मैंने माँ का हाथ पकड़ लिया।
दस्तक फिर हुई।
इस बार बाहर से पादरी की आवाज़ आई—
"एलिस, अब तुम्हें अपना निर्णय करना होगा।"
मैंने दरवाज़े की ओर देखा।
और पहली बार मुझे समझ आया कि मेरे सामने सिर्फ अपने पुराने जीवन और नए जीवन में से किसी एक को चुनने का सवाल नहीं था।
मुझे यह तय करना था कि मेरी ज़िंदगी का फैसला आखिर करेगा कौन—मैं, मेरा परिवार, या वह चर्च।
दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई।
इस बार माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"दरवाज़ा मत खोलना।"
बाहर कुछ क्षण शांति रही।
फिर पादरी की आवाज़ आई।
"हमें पता है कि तुम अंदर हो।"
मैंने माँ की तरफ देखा।
"वे मुझे लेने आए हैं?"
माँ ने धीरे से सिर हिलाया।
"शायद।"
"शायद?"
माँ ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा, "क्योंकि मुझे नहीं पता कि अब वे तुम्हारे साथ क्या करेंगे।"
मैंने पहली बार उनकी आवाज़ में डर के साथ-साथ पछतावा भी सुना।
बाहर से पादरी ने कहा—
"तुम्हारी माँ ने तुम्हें बहुत कुछ नहीं बताया है।"
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
मैंने पूछा, "क्या यह सच है?"
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
"माँ?"
"हाँ।"
उनकी आवाज़ टूट गई।
"बहुत कुछ है जो मैंने तुमसे छिपाया।"
मैंने दरवाज़े से कुछ कदम पीछे हटते हुए कहा—
"तो अब सब बताइए।"
माँ ने गहरी साँस ली।
"एलिस मेरी जुड़वाँ बहन थी।"
मैं चौंक गई।
"आपने कहा था वह आपकी बहन थी। आपने कभी नहीं बताया कि वह आपकी जुड़वाँ बहन थी।"
"क्योंकि उसके बाद जो हुआ, उसके बारे में बात करना मेरे लिए बहुत मुश्किल था।"
माँ खिड़की के पास चली गईं।
"हम दोनों कॉलेज में थीं जब पहली बार उस पुराने चर्च के बारे में सुना। वहाँ के लोग कहते थे कि इंसान के भीतर उसकी एक 'दूसरी पहचान' छिपी होती है। मुझे यह सब बकवास लगा। लेकिन एलिस को दिलचस्पी थी।"
उन्होंने थोड़ी देर रुककर कहा—
"एक रात वह वहाँ गई।"
"और वापस?"
"वापस आई। लेकिन बदल चुकी थी।"
मैंने धीरे से पूछा—
"मेरी तरह?"
"हाँ।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
"लेकिन उसने उस बदलाव को स्वीकार नहीं किया। उसने कहा कि उसके शरीर के साथ कुछ ऐसा हुआ था जिसकी उसने अनुमति नहीं दी थी। वह चर्च से दूर चली गई।"
"फिर वह कहाँ गई?"
माँ की आँखों में आँसू आ गए।
"मुझे नहीं पता।"
"लेकिन आपने कहा था कि चर्च ने उसे गायब किया।"
"मैंने कहा था कि मुझे ऐसा लगता है। मेरे पास कोई प्रमाण नहीं था।"
मैंने धीरे से पूछा—
"और फिर मैं पैदा हुई?"
माँ ने सिर हिलाया।
"तुम्हारे जन्म के कुछ महीने पहले एलिस ने मुझे एक पत्र भेजा था।"
उन्होंने अलमारी से एक पुराना लिफाफा निकाला।
कागज़ पीला पड़ चुका था।
उन्होंने उसे मेरे हाथ में दे दिया।
पत्र में केवल कुछ पंक्तियाँ थीं।
"अगर कभी मेरे जैसी कोई बच्ची तुम्हारे परिवार में जन्म ले, तो उसे चर्च से दूर रखना। वे कहेंगे कि वे उसे उसका असली रूप दे रहे हैं। उन पर विश्वास मत करना।"
मेरे हाथ काँपने लगे।
"तो आपने मुझे यहाँ से दूर क्यों नहीं रखा?"
माँ ने सिर झुका लिया।
"मैंने कोशिश की थी।"
"लेकिन?"
"जब तुम छोटी थीं, तुम्हारे हाथ पर वह चिन्ह फिर दिखाई दिया।"
मैंने अपनी हथेली देखी।
"और तब चर्च को पता चल गया?"
"हाँ।"
माँ ने फुसफुसाकर कहा—
"उस दिन से वे तुम्हारा इंतज़ार कर रहे थे।"
दरवाज़े पर दस्तक फिर हुई।
इस बार आवाज़ नहीं आई।
मैंने धीरे से पूछा—
"क्या मैं बाहर जाऊँ?"
माँ ने तुरंत कहा—
"नहीं।"
फिर कुछ सोचकर बोलीं—
"अगर तुम जाना चाहती हो, तो मेरी वजह से मत रुको। लेकिन एक बात याद रखना।"
उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया।
"तुम्हें लड़की होने के लिए किसी पादरी की अनुमति की ज़रूरत नहीं है।"
मैं कुछ बोल नहीं पाई।
मेरी आँखों में आँसू आ गए।
माँ ने मुझे गले लगा लिया।
"अगर तुम खुद को इसी रूप में पाती हो, तो वह तुम्हारा निर्णय है। लेकिन वह चर्च तुम्हारे शरीर और तुम्हारी ज़िंदगी पर अधिकार चाहता है। दोनों अलग बातें हैं।"
मैंने पहली बार समझा कि शायद चर्च ने मेरे भीतर कोई पहचान पैदा नहीं की थी।
शायद उसने केवल उस परिवर्तन को तेज़ किया था जिसे मैं खुद समझने की कोशिश कर रही थी।
और यह फैसला कि मैं कौन हूँ—
वह मेरा था।
अचानक बाहर से पादरी की आवाज़ आई।
"तुम्हारे पास दस मिनट हैं। उसके बाद हम अंदर आएँगे।"
मैंने माँ की ओर देखा।
"हम क्या करेंगे?"
उन्होंने मेरी हथेली पर बने चिन्ह को देखा।
फिर पहली बार उनके चेहरे पर डर की जगह दृढ़ता दिखाई दी।
"हम भागेंगे।"
"कहाँ?"
उन्होंने उत्तर दिया—
"जहाँ यह चर्च हमें न ढूँढ़ सके।"
लेकिन जैसे ही हम पीछे के दरवाज़े की ओर बढ़े, मेरी हथेली का चिन्ह अचानक चमक उठा।
माँ रुक गईं।
"क्या हुआ?"
मैंने हाथ देखा।
चिन्ह से एक पतली रोशनी निकल रही थी।
वह फर्श पर बनी एक सीधी रेखा की तरह आगे बढ़ी।
और फिर...
सीधे मेरे पुराने कमरे की दीवार तक पहुँच गई।
दीवार के पीछे से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।
मैंने धीरे से दीवार पर हाथ रखा।
अंदर कोई खोखली जगह थी।
माँ ने मुझे रोकना चाहा।
"नहीं।"
लेकिन इस बार मैं रुकने वाली नहीं थी।
मैंने दीवार को धक्का दिया।
लकड़ी का एक छिपा हुआ पैनल खुल गया।
अंदर एक छोटा-सा कमरा था।
और उसके भीतर एक पुरानी तस्वीर।
तस्वीर में मेरी माँ थीं।
उनके साथ उनकी जुड़वाँ बहन एलिस थी।
और उनके बीच खड़ा था—
वही पादरी।
लेकिन तस्वीर के नीचे लिखी तारीख देखकर मेरे हाथ सुन्न पड़ गए।
तारीख मेरे जन्म से पच्चीस साल पहले की थी।
माँ ने तस्वीर देखते ही फुसफुसाया—
"वह तब भी जवान था।"
मैंने पादरी की तस्वीर की ओर देखा।
और पहली बार मेरे मन में एक नया सवाल उठा।
आखिर वह पादरी वास्तव में था कौन?
अगले छह महीने मेरी ज़िंदगी के सबसे अजीब और सबसे शांत महीने रहे।
उस रात के बाद चर्च का रहस्य पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था, लेकिन पादरी ने मुझे दोबारा अपने कमरे में नहीं बुलाया। माँ ने मुझे धीरे-धीरे चर्च के पुराने इतिहास के बारे में बताया और यह भी समझाया कि मेरे साथ जो हुआ था, उसका अर्थ मैं खुद तय कर सकती हूँ।
और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि पहली बार मेरे परिवार ने मुझसे यह नहीं कहा कि मुझे क्या बनना चाहिए।
उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं क्या चाहती हूँ।
मेरा जवाब उन्हें पहले से मालूम था।
मैं अपनी नई ज़िंदगी को स्वीकार करना चाहती थी।
मैं एलिस के रूप में रहना चाहती थी।
और मैं शादी करना चाहती थी।
कुछ ही समय बाद चर्च के एक परिवार से मेरी मुलाकात डेनियल से हुई।
वह शांत स्वभाव का था, दूसरों की बात ध्यान से सुनता था और अपने परिवार की जिम्मेदारियों को गंभीरता से लेता था। हमारी पहली मुलाकात में उसने मुझसे चर्च, घर या पत्नी के कर्तव्यों के बारे में कोई सवाल नहीं किया।
उसने बस पूछा—"तुम अपने भविष्य में कैसी ज़िंदगी चाहती हो?"
मैंने थोड़ी झिझक के बाद कहा—"एक शांत घर। ऐसा घर जहाँ हम दोनों एक-दूसरे का साथ दें।"
उसने मुस्कुराकर कहा—"मुझे भी यही चाहिए।"उसके बाद हमारी मुलाकातें बढ़ती गईं।
मुझे खाना बनाना माँ से सीखना था, घर सँभालना चर्च की महिलाओं से, और शादी की तैयारियाँ तो जैसे पूरे परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी बन गई थीं। कभी-कभी मुझे अपनी पुरानी ज़िंदगी याद आती।
पुराना नाम। पुराना शरीर।कॉलेज की यादें।
लेकिन उन यादों से अब मुझे डर नहीं लगता था।
वे मेरी कहानी का हिस्सा थीं। मेरी पूरी कहानी नहीं।
शादी के दिन सुबह मैं आईने के सामने बैठी थी।माँ मेरे बाल ठीक कर रही थीं।
कुछ देर तक हम दोनों चुप रहे।फिर उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।"तुम खुश हो?"
मैंने आईने में खुद को देखा।सफेद पोशाक, हल्की मुस्कान और आँखों में थोड़ी घबराहट।
"हाँ।"
माँ मुस्कुराईं।
"सच?"
मैंने सिर हिलाया।
"इस बार यह मेरा फैसला है।"उनकी आँखों में आँसू आ गए।उन्होंने मुझे गले लगा लिया।
"फिर मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"कुछ देर बाद मैं चर्च के सामने खड़ी थी।
दरवाज़े खुले।सामने डेनियल खड़ा था।मैं धीरे-धीरे उसके पास पहुँची।उसने मेरा हाथ थामा।
"तैयार?"
मैंने मुस्कुराकर कहा—
"हाँ।"
समारोह शुरू हुआ। पादरी ने कुछ पुराने शब्द बोले, लेकिन इस बार मैं उनकी आवाज़ में छिपे अर्थ को समझने की कोशिश नहीं कर रही थी।
मैं किसी चमत्कार का इंतज़ार नहीं कर रही थी।मैं किसी शक्ति के आदेश का इंतज़ार नहीं कर रही थी।
मैं बस अपने सामने खड़े व्यक्ति को देख रही थी।फिर वह क्षण आया।
"क्या तुम, एलिस..."पादरी ने मेरा नाम लिया।
मैंने बिना झिझके कहा—
"हाँ।"
डेनियल ने भी अपना उत्तर दिया।और जब हमने एक-दूसरे का हाथ थामा, तो मेरी हथेली पर बना पुराना चिन्ह हल्का-सा चमका।मैंने उसे देखा।फिर मुस्कुराई।इस बार मैंने उसे छिपाने की कोशिश नहीं की।
समारोह समाप्त हुआ।
लोग तालियाँ बजा रहे थे। माँ रो रही थीं।
पापा मुस्कुरा रहे थे। और डेनियल मेरा हाथ पकड़े मेरे साथ चर्च से बाहर निकल रहा था।
दरवाज़े से बाहर कदम रखते हुए मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा।
वही पुराना चर्च। वही घंटी।वही जगह जहाँ मेरी ज़िंदगी ने एक असंभव मोड़ लिया था।
लेकिन अब मैं डर नहीं रही थी।क्योंकि उस दिन पादरी ने चाहे मुझे किसी भी नाम से पुकारा हो, चाहे चर्च ने मेरे बारे में कोई भी भविष्यवाणी की हो—
आज मैं वहाँ से अपनी इच्छा से निकल रही थी।
मैं एलिस थी। मैं दुल्हन थी।और पहली बार मुझे यकीन था कि मेरी ज़िंदगी का अगला अध्याय किसी और ने नहीं लिखा था।वह मैंने खुद चुना था।
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