मैंने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ाया।
पहली सीढ़ी पर पैर रखते ही मेरे शरीर में एक हल्की-सी गर्म लहर दौड़ गई।
दूसरी सीढ़ी पर वह गर्मी और तेज़ हो गई।
एलेना मेरे पीछे थी।
"डरो मत," उसने फुसफुसाकर कहा।
मैंने उसकी ओर देखा।
"तुम खुद डरी हुई हो।"
वह कुछ क्षण चुप रही।
"हाँ। लेकिन अब डरने से कुछ बदलने वाला नहीं।"
हम नीचे उतरते गए।
लगभग बीस सीढ़ियों के बाद एक लंबा पत्थर का गलियारा सामने आया। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। कुछ चित्र इतने पुराने थे कि चेहरों को पहचानना मुश्किल था।
लेकिन एक चीज़ ने मुझे तुरंत रोक दिया।
हर चित्र में एक पुरुष और एक महिला साथ खड़े थे।
और हर महिला के चेहरे पर वही शांत, लगभग खाली-सी मुस्कान थी।
"ये कौन हैं?" मैंने पूछा।
"पुराने सदस्य," एलेना ने कहा। "या कम-से-कम चर्च यही कहता है।"
गलियारे के अंत में एक बड़ा कमरा था।
वहाँ लगभग तीस लोग बैठे थे।
कुछ पुरुष।
कुछ महिलाएँ।
और उनके बीच कई ऐसे चेहरे थे जिन्हें देखकर मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
वे लोग मुझे घूर रहे थे।
ऐसे नहीं जैसे किसी अजनबी को देखा जाता है।
बल्कि जैसे वे मुझे पहचानते हों।
कमरे के बीच एक पत्थर का चबूतरा था।
उस पर वही चिन्ह बना था जो मैंने पादरी के कार्यालय में उसकी किताब पर देखा था।
एक वृत्त।
उसके भीतर दो आपस में जुड़ी हुई आकृतियाँ।
और नीचे एक अजीब भाषा में कुछ शब्द।
"तुम्हें देखकर इन्हें खुशी हो रही है," एलेना ने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि तुम पहली हो।"
मैंने उसकी तरफ देखा।
"पहली क्या?"
तभी पीछे से एक आवाज़ आई।
"पहली जो बिना किसी प्रतिरोध के बदली।"
मैं पलटी।
पादरी दरवाज़े पर खड़े थे।
उनके चेहरे पर वही शांत मुस्कान थी।
लेकिन पहली बार मुझे वह मुस्कान डरावनी लगी।
"आप यहाँ कैसे—?"
"यह मेरा चर्च है," उन्होंने कहा। "मुझे यहाँ होने के लिए किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं।"
एलेना मेरे आगे आकर खड़ी हो गई।
"उसे छोड़ दीजिए।"
पादरी ने उसकी तरफ देखा।
"तुम्हें अब भी लगता है कि तुम उसे बचा सकती हो?"
एलेना चुप हो गई।
पादरी मेरी ओर मुड़े।
"तुम्हें बहुत सारे सवालों के जवाब चाहिए।"
मैंने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"तो पूछो।"
मैंने अपने भीतर हिम्मत जुटाई।
"आपने मुझे क्यों बदला?"
उन्होंने तुरंत जवाब नहीं दिया।
फिर बोले—
"क्योंकि तुम्हारा शरीर उस रूप को स्वीकार करने के लिए तैयार था।"
"और मेरा परिवार?"
"वे पहले से जानते थे कि यह संभव है।"
मेरे भीतर जैसे कुछ टूट गया।
"मेरे माता-पिता जानते थे?"
"हाँ।"
"और उन्होंने मुझे आपके पास भेजा?"
"उन्होंने तुम्हें मेरे पास नहीं भेजा।"
उन्होंने धीरे से कहा—
"उन्होंने तुम्हें वापस घर भेजा।"
मैं कुछ समझ नहीं पाई।
पादरी ने पत्थर के चबूतरे की तरफ इशारा किया।
"तुम्हारे जन्म से पहले तुम्हारे परिवार का इस चर्च से संबंध था।"
मैंने एलेना की तरफ देखा।
वह भी उतनी ही हैरान दिखाई दे रही थी।
"यह सच नहीं हो सकता।"
पादरी ने कहा, "तुम्हारी माँ ने तुम्हें कभी नहीं बताया कि वह यहाँ पहले भी आती थीं।"
मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा।
"कब?"
"तुम्हारे जन्म से बहुत पहले।"
फिर उन्होंने मेरी ओर देखकर एक ऐसा वाक्य कहा जिसे सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
"तुम्हें बदला नहीं गया है।"
मैंने उनकी ओर देखा।
"तो फिर?"
उन्होंने उत्तर दिया—
"तुम्हें याद दिलाया गया है।"
अचानक कमरे की सारी आवाज़ें बंद हो गईं।
मेरे सिर में तेज़ दर्द उठा।
फिर मेरे सामने एक दृश्य चमका।
मैंने खुद को एक छोटे बच्चे के रूप में देखा।
लेकिन वह मैं नहीं था।
वह एक छोटी लड़की थी।
वह अपनी माँ का हाथ पकड़े उसी चर्च के पुराने रूप में खड़ी थी।
फिर दृश्य बदल गया।
एक कमरा।
एक महिला रो रही थी।
एक नवजात बच्चा।
और मेरी माँ की आवाज़—
"अगर यह बच्चा कभी अपने असली रूप को याद करे, तो इसे उसके पास ले आना।"
मैंने चीखते हुए आँखें खोल दीं।
मैं वापस उसी कमरे में थी।
मेरे सामने पादरी खड़े थे।
एलेना मेरा हाथ पकड़े हुए थी।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
मैं जवाब नहीं दे सकी।
मेरे सिर में केवल एक वाक्य गूँज रहा था—
अगर यह बच्चा कभी अपने असली रूप को याद करे...
मैंने पादरी की तरफ देखा।
"मैं कौन हूँ?"
पहली बार उनके चेहरे की मुस्कान गायब हुई।
उन्होंने धीरे से कहा—
"यही वह सवाल है जिससे हम सब डरते हैं।"
और उसी क्षण कमरे की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
अँधेरे में दर्जनों आवाज़ें एक साथ सुनाई दीं।
लेकिन इस बार वे प्रार्थना नहीं कर रही थीं।
वे मेरा नाम पुकार रही थीं।
एक ऐसा नाम जिसे मैंने कभी सुना तक नहीं था।
और फिर भी...
उसे सुनते ही मुझे लगा जैसे मैं उसे जन्म से जानती हूँ।
Part 3
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