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Part 2

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अगले कुछ हफ्ते मेरी ज़िंदगी इतनी तेज़ी से बदलने लगी कि कभी-कभी मुझे लगता था कि शायद वह पुरानी ज़िंदगी मेरी ही नहीं थी।
माँ ने मेरी अलमारी पूरी तरह बदल दी। मेरी पुरानी जीन्स, टी-शर्ट और हुडी एक बड़े डिब्बे में चली गईं। उनकी जगह साधारण स्कर्ट, ब्लाउज़, लंबे कपड़े और चर्च के लिए विशेष पोशाकें आ गईं।
पहले-पहल मुझे यह सब अजीब लगा।
फिर मैंने आईने में खुद को देखा।
और अजीब बात यह थी कि मुझे अजीब नहीं लगा।
मैंने अपने लंबे बालों को पीछे किया और आईने में दिखाई दे रही लड़की को कुछ देर तक देखती रही। उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जो मुझे पहले कभी अपने चेहरे पर दिखाई नहीं दी थी।
"तुम्हें आदत हो जाएगी," माँ ने पीछे से कहा।
मैंने उनकी तरफ देखा और मुस्कुरा दी।
"शायद हो गई है।"
माँ की आँखों में गर्व दिखाई दिया।
उस दिन से मेरी नई ज़िंदगी सचमुच शुरू हो गई।
हर मंगलवार और गुरुवार को चर्च की महिलाएँ हमारे घर आतीं। वे मुझे खाना बनाना, सिलाई, घर व्यवस्थित रखना और तरह-तरह के घरेलू काम सिखातीं। वे मुझे यह भी बतातीं कि चर्च में एक "अच्छी पत्नी" से क्या उम्मीद की जाती है।
मैं ध्यान से सुनती।
अजीब बात यह थी कि मुझे इनमें से ज़्यादातर बातें बोझ नहीं लगती थीं।
बल्कि मुझे लगता था कि मैं किसी ऐसी चीज़ की तैयारी कर रही हूँ जिसका इंतज़ार मुझे हमेशा से था।
लेकिन एक चीज़ मुझे परेशान करती थी।
चर्च की कोई भी महिला कभी उस रात के बारे में बात नहीं करती थी।
उस रात जब मैं पादरी के कमरे से निकली थी।
उस रात जब मैं एक अलग शरीर में वापस आई थी।
जब भी मैं इसके बारे में पूछने की कोशिश करती, जवाब हमेशा एक जैसा मिलता।
"तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखना है। सही समय आने पर तुम्हें सब समझाया जाएगा।"
एक शाम मैंने आखिरकार माँ से सीधे पूछ लिया।
"माँ... पादरी ने मेरे साथ ऐसा कैसे किया?"
माँ कुछ क्षण चुप रहीं।
फिर उन्होंने मेरे बालों में कंघी करते हुए कहा, "उन्होंने तुम्हारे साथ कुछ किया नहीं। उन्होंने तुम्हारे अंदर जो पहले से था, उसे बाहर आने दिया।"
मैंने आईने में उनकी ओर देखा।
"तो क्या मैं हमेशा से..."
माँ ने धीरे से सिर हिलाया।
"हाँ।"
उस एक शब्द ने मेरे भीतर कुछ हिला दिया।
लेकिन उससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात उनकी अगली बात थी।
"और तुम अकेली नहीं हो।"
मैंने तुरंत उनकी ओर देखा।
"क्या मतलब?"
माँ ने जवाब नहीं दिया।
उस रात मैं देर तक सो नहीं पाई।
अगले रविवार को चर्च पहुँचने पर मैंने पहली बार ध्यान से आसपास के लोगों को देखना शुरू किया।
अब तक मैं वहाँ आने वाले लोगों को बस "चर्च के लोग" समझती थी।
लेकिन उस दिन मैंने कुछ अलग देखा।
कुछ लड़कियाँ मेरी ही तरह बदली हुई लग रही थीं।
एक लड़की को देखकर मेरे कदम रुक गए।
वह शायद मुझसे दो-तीन साल बड़ी होगी। उसके बाल कंधों तक थे और वह बाकी महिलाओं की तरह शांत बैठी थी।
हमारी नज़रें मिलीं।
उसने मुझे देखा।
और बहुत हल्की-सी मुस्कान दी।
फिर उसने अपनी उँगली होंठों पर रखकर मुझे चुप रहने का संकेत किया।
मेरे शरीर में अचानक सिहरन दौड़ गई।
सभा खत्म होने के बाद मैंने उसे ढूँढ़ने की कोशिश की।
लेकिन वह गायब हो चुकी थी।
उस शाम घर लौटने के बाद मुझे अपने कमरे के दरवाज़े के नीचे एक छोटा-सा कागज़ मिला।
उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
"अगर तुम जानना चाहती हो कि पादरी ने तुम्हारे साथ वास्तव में क्या किया, तो शुक्रवार रात अकेले पुराने प्रार्थना-कक्ष में आना।"
मैंने कागज़ कई बार पढ़ा।
फिर उसे छिपाकर अपनी किताब के अंदर रख दिया।
मुझे पता था कि मुझे वहाँ नहीं जाना चाहिए।
पापा ने साफ़ कहा था कि चर्च के नियमों पर सवाल उठाना सही नहीं था।
माँ ने भी बार-बार समझाया था कि पादरी पर पूरा भरोसा करना चाहिए।
और फिर भी...
शुक्रवार की रात मैं चुपचाप घर से निकल गई।
पुराना प्रार्थना-कक्ष चर्च की मुख्य इमारत से काफी दूर था। वहाँ अब कोई सभा नहीं होती थी। दरवाज़ा आधा खुला हुआ था।
मैंने अंदर कदम रखा।
कमरे में वही लड़की मेरा इंतज़ार कर रही थी।
"तुम आ गई," उसने फुसफुसाकर कहा।
"तुम कौन हो?"
उसने कुछ पल मुझे देखा।
फिर बोली—
"मेरा नाम एलेना है। और तीन साल पहले मैं भी तुम्हारी तरह यहाँ आई थी।"
मेरी साँस रुक गई।
"तुम भी..."
"हाँ।"
उसने सिर झुका लिया।
"मैं भी उस कमरे में गई थी। पादरी ने मेरे सिर पर हाथ रखा था। और जब मैं बाहर आई... मैं वह नहीं थी जो अंदर गई थी।"
मैंने धीरे से पूछा, "फिर तुमने अपने परिवार को क्यों नहीं बताया?"
एलेना की आँखों में पहली बार डर दिखाई दिया।
"बताया था।"
"और?"
"उन्होंने मुझसे कहा कि यही मेरी असली ज़िंदगी है।"
कमरे में कुछ क्षण सन्नाटा रहा।
फिर उसने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।
तस्वीर में एक लड़का खड़ा था।
मेरी तरह उम्र में लगभग बीस साल का।
मैंने तस्वीर को देखा।
फिर एलेना को।
"यह कौन है?"
उसने उत्तर देने में कुछ पल लगाए।
"मैं।"
मेरे हाथ से तस्वीर लगभग गिर गई।
एलेना ने धीमी आवाज़ में कहा—
"लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है।"
"तो फिर क्या है?"
उसने चर्च की दिशा में देखा।
"पादरी लोगों को बदल नहीं रहे।"
मैंने घबराकर पूछा, "तो फिर?"
उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा—
"वह लोगों को तैयार कर रहे हैं।"
"किस लिए?"
एलेना ने जवाब देने के बजाय कमरे की पिछली दीवार की ओर इशारा किया।
वहाँ लकड़ी के पुराने पैनल के पीछे एक छिपा हुआ दरवाज़ा था।
उसने चाबी निकाली।
दरवाज़ा खुला।
अंदर अँधेरी सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।
और नीचे से धीमी आवाज़ें आ रही थीं।
प्रार्थना की आवाज़ें।
लेकिन वे आवाज़ें पुरुषों और महिलाओं की नहीं थीं।
वे दर्जनों लोगों की थीं।
और उन सबकी आवाज़ एक जैसी थी।
एलेना ने फुसफुसाकर कहा—
"तुम्हें अब फैसला करना होगा। वापस घर जाओ और वह बन जाओ जिसके लिए तुम्हारा परिवार तुम्हें तैयार कर रहा है..."
उसने सीढ़ियों की ओर देखा।
"...या नीचे आकर पता करो कि तुम्हें चुना क्यों गया।"
मैंने अँधेरे में नीचे देखा।
फिर अपने हाथों को।
और पहली बार उस रात मुझे महसूस हुआ कि मेरे भीतर वह अजीब शक्ति फिर से जाग रही थी।
ठीक वैसी ही, जैसी उस दिन पादरी ने मेरे सिर पर हाथ रखा था।
लेकिन इस बार...
वह शक्ति पादरी की नहीं थी।
वह मेरी थी।

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