नाटक का अगला दृश्य एक छोटे-से घर के अंदर का था। रमेश ने पति का किरदार निभाया था और मैं उसकी पत्नी बनी थी। सिद्धार्थ ने सास का किरदार निभाया था, जबकि राम मेरी छोटी बहन यानी साली के किरदार में था।
पर्दा खुलते ही रमेश मेरे पास आया और मुस्कुराकर बोला, “आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो।”
मैंने हँसते हुए जवाब दिया, “बस आज ही?”
रमेश ने तुरंत कहा, “नहीं, आज तो खास तौर पर।”
दर्शकों में हँसी और तालियाँ गूँज उठीं।
तभी सिद्धार्थ ने सास के अंदाज़ में प्रवेश किया। “अरे वाह! मेरी बेटी की इतनी तारीफ़ हो रही है। लगता है आज दामाद जी कुछ खास मनाने वाले हैं।”
रमेश थोड़ा झेंप गया। राम ने तुरंत साली की भूमिका में चुटकी ली, “माँ, मुझे तो लगता है जीजाजी आज बहन को बाहर घुमाने ले जाने वाले हैं।”
मैंने मुस्कुराकर रमेश की ओर देखा। उसने मेरा हाथ थामकर कहा, “क्यों नहीं? आज की शाम सिर्फ तुम्हारे नाम।”
सिद्धार्थ ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा, “ठीक है, लेकिन मेरी बेटी को समय पर घर वापस लाना!”
सभी कलाकार हँस पड़े और दर्शकों ने तालियाँ बजाईं।
दृश्य का अंत रमेश और मेरे किरदार के एक प्यारे, रोमांटिक संवाद से हुआ—दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामा और मंच की रोशनी धीरे-धीरे मंद पड़ गई।
अगला दृश्य घर के बैठक वाले कमरे से शुरू हुआ। रमेश और मैं पति-पत्नी की भूमिका में बैठे थे। राम, मेरी छोटी बहन यानी साली के किरदार में, दरवाज़े से ही दोनों को देखकर मुस्कुराने लगा।
राम ने शरारती अंदाज़ में कहा, “वाह जीजाजी! आज तो आप बड़ी सेवा कर रहे हैं। लगता है कोई खास वजह है।”
रमेश ने हँसकर कहा, “तुम्हें हर बात में मज़ाक ही सूझता है।”
राम ने आँख मारते हुए जवाब दिया, “साली हूँ जीजाजी, थोड़ा मज़ाक तो बनता है!”
तभी सिद्धार्थ, सास के रूप में, कमरे में आया। उसका चेहरा मुस्कुराता हुआ था, लेकिन आवाज़ में अपनापन था।
“तुम दोनों हमेशा हँसते-खेलते रहो,” उसने कहा, “घर में छोटी-छोटी खुशियाँ ही तो सबसे ज्यादा मायने रखती हैं।”
मैंने सास की ओर देखकर कहा, “आप हमेशा सबकी इतनी चिंता करती हैं।”
सिद्धार्थ ने धीरे से जवाब दिया, “परिवार में किसी एक की परेशानी हो तो वह सिर्फ उसकी नहीं रहती। सब मिलकर उसका भार हल्का करते हैं।”
कुछ पल के लिए माहौल शांत और भावुक हो गया।
राम ने तुरंत वातावरण हल्का करते हुए कहा, “ठीक है माँ, अब इतना भावुक मत होइए। वरना मैं भी रो दूँगा और फिर जीजाजी को मेरी चॉकलेट खरीदनी पड़ेगी!”
रमेश हँस पड़ा और बोला, “तुम्हारी शरारतें कभी खत्म नहीं होंगी।”
सिद्धार्थ भी मुस्कुराया। “और शायद यही शरारत इस घर को खुशहाल रखती है।”
मंच पर सभी किरदार एक साथ आ गए। नाटक का यह दृश्य हँसी, अपनापन और परिवार के बीच समझदारी का सुंदर मिश्रण बन गया।
नाटक के अगले दृश्य में घर का माहौल कुछ बदला हुआ था। राम, जो अब तक अपनी चुलबुली साली की भूमिका में सबको हँसाता आया था, उस दिन कुछ शांत बैठा था।
मैंने पूछा, “क्या हुआ? आज इतनी चुप्पी क्यों?”
राम ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “मेरे लिए एक रिश्ता आया है।”
रमेश ने तुरंत मज़ाक किया, “अच्छा! तो हमारी साली साहिबा अब हमें छोड़कर जाने वाली हैं?”
राम ने उसे घूरकर देखा, लेकिन चेहरे पर मुस्कान बनी रही।
तभी सिद्धार्थ, सास के किरदार में, पास आकर बैठ गया। इस बार उसके चेहरे पर मज़ाक नहीं, बल्कि गंभीरता और ममता थी।
“रिश्ता सिर्फ अच्छा परिवार देखकर तय नहीं होता,” उसने धीरे से कहा। “सबसे जरूरी है कि तुम्हें वहाँ सम्मान मिले, तुम्हारी बात सुनी जाए और तुम अपने मन से खुश रहो।”
राम ने उसकी ओर देखकर पूछा, “अगर मुझे डर लग रहा हो तो?”
सिद्धार्थ ने उसका हाथ थाम लिया। “डरना स्वाभाविक है। लेकिन फैसला तुम्हारी खुशी को ध्यान में रखकर ही होगा। हम तुम्हें किसी रिश्ते में सिर्फ इसलिए नहीं बाँधेंगे कि समाज क्या कहेगा।”
रमेश भी अब गंभीर हो गया। उसने कहा, “तुम जहाँ भी जाओगी, यह घर हमेशा तुम्हारा रहेगा।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “और साली का रिश्ता तो कभी खत्म नहीं होगा। शादी के बाद भी तुम्हारी शरारतें झेलनी पड़ेंगी।”
राम हँस पड़ा।
उस क्षण नाटक में कोई बड़ा रोमांटिक संवाद नहीं था, फिर भी रिश्तों की गर्माहट सबसे ज्यादा महसूस हो रही थी। सास की संवेदनशीलता, पति-पत्नी का अपनापन और साली के साथ परिवार का गहरा जुड़ाव—तीनों मिलकर कहानी को एक नए मोड़ पर ले जा रहे थे।
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