पर्दा फिर से खुला। मंच पर वही घर था, लेकिन इस बार वातावरण बिल्कुल अलग था। आँगन में विदाई की तैयारी थी। राम, जो पूरे नाटक में चुलबुली साली का किरदार निभाता रहा था, अब दुल्हन के रूप में विदाई के लिए तैयार खड़ा था।
रमेश उसके पास आया। उसकी आँखों में भी नमी थी।
“तुमने इस घर को हमेशा अपनी हँसी से भर दिया,” उसने धीमे से कहा। “आज तुम्हें विदा करते हुए घर सचमुच खाली-खाली लग रहा है।”
राम मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोला, “इतनी आसानी से पीछा नहीं छूटेगा जीजाजी। मैं मिलने आती रहूँगी।”
सब हल्का-सा हँस पड़े, लेकिन अगले ही पल माहौल फिर भावुक हो गया।
सिद्धार्थ आगे बढ़ा और राम को गले लगा लिया। उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“बेटी, घर बदलता है, रिश्ता नहीं। जहाँ भी जाओ, अपने मन की खुशी और अपना आत्मविश्वास साथ लेकर जाना।”
राम ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “मैं आपको बहुत याद करूँगी।”
मैं भी आगे बढ़ा और राम का हाथ थाम लिया।
“आज हमारी साली जा रही है,” मैंने कहा, “लेकिन परिवार से कोई कभी दूर नहीं होता।”
राम की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने सबको गले लगाया।
बाहर विदाई का संगीत बजने लगा। राम धीरे-धीरे मंच के अंतिम छोर की ओर बढ़ा और फिर एक बार पीछे मुड़कर अपने परिवार को देखा।
सिद्धार्थ ने हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। रमेश मुस्कुराते हुए आँसू पोंछ रहा था।
राम ने आखिरी बार मुस्कुराकर हाथ हिलाया।
पर्दा धीरे-धीरे गिर गया।
दर्शक कुछ क्षण बिल्कुल शांत रहे, फिर पूरे सभागार में जोरदार तालियाँ गूँज उठीं। नाटक समाप्त हो चुका था, लेकिन दोस्ती, परिवार और बदलते रिश्तों की वह कहानी सबके मन में रह गई।
पर्दा खुला तो मंच पर पूरे नाटक के सभी प्रमुख पात्र एक साथ दिखाई दिए। शादी और विदाई की रस्में पूरी होने वाली थीं। राम, जो साली के किरदार में था, विदाई के लिए तैयार खड़ा था। रमेश उसके जीजा और परिवार के सदस्य के रूप में पास खड़ा था। मैं भी उसके सामने था, जबकि सिद्धार्थ सास के रूप में पूरे परिवार को भावुक नज़रों से देख रहा था।
कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर राम ने मुस्कुराकर कहा, “पूरे नाटक में मैंने सबको हँसाया... लेकिन आज खुद रोने की बारी आ गई।”
रमेश ने उसका कंधा थपथपाया। “साली हो या बेटी, इस घर में तुम्हारी जगह हमेशा रहेगी।”
मैंने कहा, “और यह मत समझना कि विदाई के साथ तुम्हारी शरारतें खत्म हो जाएँगी।”
राम हँस पड़ा और बोला, “आप सबको मेरी आदत पड़ चुकी है।”
सिद्धार्थ आगे बढ़ा और राम को गले लगा लिया।
“रिश्ते नामों से नहीं, अपनापन से बनते हैं,” उसने कहा। “आज तुम एक नए घर जा रही हो, लेकिन तुम्हारा अपना परिवार यहीं रहेगा।”
राम की आँखों में आँसू आ गए। उसने पहले सिद्धार्थ को गले लगाया, फिर रमेश से विदा ली और अंत में मेरी ओर देखकर मुस्कुराया।
“हम सबकी कहानी यहीं खत्म नहीं होती,” उसने कहा।
तभी मंच पर बाकी कलाकार भी आ गए। सभी ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। पीछे धीमा संगीत बजने लगा और रोशनी धीरे-धीरे पूरे मंच पर फैल गई।
फोटोग्राफर ने उसी क्षण अंतिम तस्वीर खींची—सभी पात्र एक साथ, मुस्कुराते हुए और भावुक।
पर्दा गिरने से पहले उद्घोषक की आवाज़ सुनाई दी:
“यह कहानी सिर्फ एक नाटक की नहीं, बल्कि दोस्ती, परिवार, अपनापन और उन रिश्तों की है जो अलग-अलग नामों के बावजूद दिलों को जोड़ते हैं।”
तालियों की गूँज के साथ पर्दा गिर गया।
नाटक समाप्त हुआ, लेकिन उन किरदारों की दोस्ती और उस शाम की याद सबके साथ रह गई।
पर्दा गिरने के कुछ ही मिनट बाद सभी कलाकार मंच के पीछे परिणाम की घोषणा का इंतज़ार कर रहे थे। राम, रमेश, सिद्धार्थ और मैं एक साथ खड़े थे। पूरे नाटक की मेहनत के बाद अब फैसला निर्णायकों के हाथ में था।
घोषक मंच पर आया और माइक संभालते हुए बोला, “आज की सभी प्रस्तुतियाँ शानदार थीं। लेकिन चैरिटी फेस्टिवल की सर्वश्रेष्ठ नाट्य प्रस्तुति का पुरस्कार जाता है...”
कुछ पल के लिए पूरा मैदान शांत हो गया।
“प्रथम स्थान — हमारी इस टीम को!”
तालियों और खुशी की आवाज़ से पूरा मैदान गूँज उठा।
राम खुशी से उछल पड़ा। रमेश ने उसे गले लगा लिया और सिद्धार्थ ने मुस्कुराते हुए दोनों को आशीर्वाद दिया। मैं भी उनके साथ शामिल हो गया।
घोषक ने आगे कहा, “इस टीम ने केवल अभिनय ही नहीं किया, बल्कि दोस्ती, परिवार और आपसी अपनापन बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया। साथ ही इस प्रस्तुति से चैरिटी के लिए भी शानदार योगदान मिला।”
पुरस्कार लेने के लिए हम चारों मंच पर पहुँचे। ट्रॉफी राम और रमेश ने साथ पकड़ी, जबकि सिद्धार्थ और मैंने उनके साथ खड़े होकर तस्वीर खिंचवाई।
राम ने हँसते हुए कहा, “लगता है हमारी सारी मेहनत सफल हो गई!”
रमेश ने जवाब दिया, “और हमारी साली की विदाई ने तो सबका दिल जीत लिया।”
सिद्धार्थ मुस्कुराया, “क्योंकि अंत में सबसे जरूरी चीज़ यही थी—हम सब एक साथ थे।”
कैमरे की फ्लैश चमकी और चारों ने ट्रॉफी के साथ अंतिम तस्वीर खिंचवाई।
उस रात हमारा नाटक प्रथम स्थान पर रहा—और उससे भी बड़ी जीत यह थी कि अलग-अलग किरदार निभाते हुए हम चारों के बीच की दोस्ती और मजबूत हो गई थी।
पर्दा गिरा, तालियाँ बजीं और कहानी एक यादगार जीत के साथ समाप्त हुई।
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