आख़िरी शाम का कार्यक्रम शुरू होते ही पूरा मैदान रोशनी और संगीत से भर गया। मैं लाल साड़ी में थी और राम मेरे पास खड़ा था। इस बार वह भी बाकी लड़कों की तरह पारंपरिक महिला-वेश में तैयार था। उसके पीछे रमेश और सिद्धार्थ खड़े थे, जिन्होंने हाफ-साड़ी पहनी थी। दूसरे कॉलेजों के लड़के भी अलग-अलग पारंपरिक परिधानों में तैयार होकर फोटो-शूट के लिए लाइन में लग चुके थे।
रमेश ने राम को देखकर मज़ाक किया, “देख भाई, अब हम सब बराबर हैं।”
सिद्धार्थ हँसते हुए बोला, “पिछले साल हमें देखकर सबसे ज्यादा हँस कौन रहा था, याद है?”
राम ने आँखें घुमाईं। “ठीक है, ठीक है। आज बदला पूरा कर लेना।”
मैंने राम के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “चलो, अब सब साथ में फोटो लेते हैं।”
फोटोग्राफर ने सभी को पास आने के लिए कहा। मैं और राम बीच में खड़े हुए, रमेश और सिद्धार्थ हमारे पीछे, और बाकी कॉलेजों के लड़के दोनों तरफ। कैमरा उठते ही सबने अपनी-अपनी मज़ेदार पोज़ बना लीं।
पहली तस्वीर के बाद लड़कियों का एक समूह हमारे पास आया। उन्होंने मेरी लाल साड़ी की तारीफ़ की और कहा कि मैं पिछले साल की तरह इस बार भी बहुत आत्मविश्वास से तैयार हुई थी। फिर उनकी नज़र राम और बाकी लड़कों पर गई।
“आप लोग तो आज पूरी तरह तैयार हैं!” उनमें से एक ने हँसते हुए कहा।
राम ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “नियमों ने मजबूर किया है।”
मैंने तुरंत कहा, “नहीं, अब तो आप लोग खुद ही पोज़ देने लगे हैं।”
इस पर रमेश और सिद्धार्थ जोर से हँस पड़े।
धीरे-धीरे झिझक खत्म हो गई और सभी लड़के कार्यक्रम में शामिल होने लगे। किसी ने पारंपरिक नृत्य में हिस्सा लिया, किसी ने फोटो-बूथ पर मज़ेदार तस्वीरें खिंचवाईं और किसी ने चैरिटी के लिए घोषणा करते हुए मंच संभाला।
राम, जो शुरुआत में सबसे ज्यादा शर्मिंदा था, आखिर में खुद ही मेरे पास आकर बोला, “मानना पड़ेगा, आज का दिन उम्मीद से ज्यादा मज़ेदार निकला।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “अब समझे कि हम पिछले साल इतना क्यों हँस रहे थे?”
राम ने सिर हिलाया। “हाँ। लेकिन अगली बार अगर मैं जीत गया, तो ये कपड़े पहनने की जिम्मेदारी तुम लोगों की होगी।”
हम सब एक साथ हँस पड़े।
उस रात प्रतियोगिता से ज्यादा यादगार चीज़ यही थी कि अलग-अलग कॉलेजों से आए हम सबने अपनी झिझक छोड़कर एक साथ मस्ती की और चैरिटी के लिए अच्छी-खासी रकम जुटाने में योगदान दिया।
फोटोशूट के अगले चरण में आयोजकों ने घोषणा की कि इस बार सभी प्रतिभागियों को अलग-अलग पारंपरिक महिला-पात्रों के रूप में तैयार होकर समूह-फोटो देनी होगी।
राम और रमेश को युवा लड़कियों का पारंपरिक रूप दिया गया। दोनों ने साड़ी के साथ चूड़ियाँ, बिंदी और फूलों से सजे बाल रखे। राम शुरुआत में काफी संकोच कर रहा था, जबकि रमेश बार-बार आईने में अपना रूप देखकर हँस रहा था।
सिद्धार्थ को आयोजकों ने एक परिपक्व, गरिमामयी महिला का रूप दिया। उसके लिए साड़ी को अधिक सलीके से पहना गया, बालों का पारंपरिक जूड़ा बनाया गया और साधारण-से गहनों के साथ एक गंभीर, आत्मविश्वासी रूप दिया गया।
जब तीनों मेरे सामने आए तो मैं उन्हें देखकर मुस्कुराए बिना नहीं रह सका।
“राम, तुम तो बिल्कुल चुप हो गए हो!”
राम ने धीरे से कहा, “मैं बस फोटो जल्दी खत्म होने का इंतज़ार कर रहा हूँ।”
रमेश तुरंत बोला, “इसकी बात मत सुनो। पाँच मिनट पहले यही आईने के सामने पोज़ की प्रैक्टिस कर रहा था।”
सिद्धार्थ ने गंभीर महिला की भूमिका निभाते हुए दोनों को टोका, “बस करो तुम दोनों। फोटो में ठीक से खड़े हो।”
उसकी आवाज़ सुनकर हम सब हँस पड़े।
फोटोग्राफर ने तीनों को मेरे साथ खड़ा किया। राम और रमेश दोनों एक तरफ खड़े हुए और सिद्धार्थ बीच में बेहद आत्मविश्वास के साथ खड़ा रहा। कैमरा क्लिक हुआ तो पहली तस्वीर में सब गंभीर बने रहे, लेकिन दूसरी तस्वीर आते-आते राम खुद हँस पड़ा और रमेश भी अपनी हँसी नहीं रोक सका।
आखिर में सिद्धार्थ ने भी मुस्कुराते हुए कहा, “अब यह तस्वीर जरूर याद रखी जाएगी।”
और सचमुच, उस शाम की सबसे लोकप्रिय तस्वीर वही बनी—तीन दोस्तों के बिल्कुल अलग-अलग महिला-पात्रों में, एक ही फ्रेम में, पूरे आत्मविश्वास और मस्ती के साथ।
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