कुछ महीनों बाद कॉलेज शुरू हो गया। नई जगह, नए दोस्त और नई जिम्मेदारियाँ—सब कुछ मेरे लिए बिल्कुल नया था।
एक दिन मुझे रोहिणी आंटी का फोन आया।
रोहिणी: तो विनीत, कॉलेज कैसा चल रहा है?
मैं: बहुत अच्छा, आंटी। और आपको एक बात बतानी है।
रोहिणी: क्या?
मैं: मैंने कॉलेज की पहली परीक्षा में टॉप किया है!
रोहिणी आंटी कुछ पल चुप रहीं, फिर खुशी से बोलीं—
रोहिणी: मुझे तुम पर बहुत गर्व है!
मैं मुस्कुरा दिया।
मैं: और इस बार मैंने किसी से कोई शर्त भी नहीं लगाई।
दोनों हँस पड़े।
फिर उन्होंने कहा—
रोहिणी: याद है, हमारी दो साल पुरानी शर्त?
मैं: कैसे भूल सकता हूँ!
रोहिणी: उस दिन तुमने सोचा था कि तुम हार गए हो। लेकिन असल में तुम जीते थे—क्योंकि तुमने अपनी गलती स्वीकार की और उससे सीखा।
मैं कुछ देर खामोश रहा।
मैं: आंटी, उस दिन अगर आपने मुझे सच नहीं बताया होता, तो शायद मैं आज भी वही सोच रखता।
रोहिणी: इसलिए जिंदगी में हार और जीत से ज्यादा जरूरी है कि हम हर अनुभव से क्या सीखते हैं।
फोन रखने के बाद मैंने अपनी मेज पर रखी वही घड़ी देखी, जो उन्होंने शादी वाले दिन मुझे दी थी।
उसके पीछे लिखा संदेश फिर याद आया—
“अपनी मेहनत पर भरोसा रखना।”
मैं मुस्कुराया और किताब खोलकर पढ़ने लगा।
उस दिन मुझे एहसास हुआ कि वह पुरानी शर्त मेरे जीवन की सबसे अजीब याद जरूर थी, लेकिन उससे मिली सीख सबसे खूबसूरत थी।
मैंने तय किया कि आगे चाहे कितनी भी चुनौतियाँ आएँ, मैं अपनी मेहनत, अपनी काबिलियत और अपने फैसलों पर भरोसा रखूँगा।
और रोहिणी आंटी?
वह आज भी परिवार की सबसे निडर और एडवेंचरस इंसान हैं—बस अब जब भी मुझे चुनौती देती हैं, मैं पहले नियम ध्यान से पढ़ता हूँ!
समाप्त।
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