अध्याय: अपनी पहचान की ओर
शादी के कुछ दिन बाद घर की रौनक धीरे-धीरे कम होने लगी। रिश्तेदार अपने-अपने घर लौट गए और हम तीनों फिर अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लौट आए। बाहर से सब कुछ पहले जैसा था, लेकिन मेरे लिए बहुत कुछ बदल चुका था।
अब मैं इस घर की बहू थी। सुबह उठकर सासू माँ के साथ चाय बनाती, घर के कामों में हाथ बँटाती और शाम को अपनी पत्नी के साथ बैठकर बातें करती। कभी-कभी वह मेरी साड़ी की तारीफ़ करती, कभी मेरे बालों की, और कभी बस मुझे देखकर मुस्कुरा देती।
लेकिन एक दिन मैंने आईने के सामने खड़े होकर खुद से पूछा, “क्या मैं सचमुच खुश हूँ?”
सवाल सुनने में आसान था, लेकिन जवाब उतना आसान नहीं था।
मैं खुश थी कि मुझे एक परिवार मिला था। खुश थी कि सासू माँ ने मुझे अपनाया था। खुश थी कि मेरी पत्नी मुझे समझने की कोशिश कर रही थी। लेकिन मेरे मन में एक और सवाल था—मैं खुद अपने बारे में क्या चाहती हूँ?
मैंने यह बात सासू माँ से कहने का फैसला किया।
“सासू माँ, क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकती हूँ?”
“हाँ, पूछो।”
“अगर मैं कभी अपने पुराने कपड़े पहनना चाहूँ, या अपने तरीके से तैयार होना चाहूँ, तो क्या आपको बुरा लगेगा?”
उन्होंने मेरी ओर देखा और मुस्कुराईं। “बुरा क्यों लगेगा? तुम मेरी बहू हो, मेरी बेटी जैसी हो। तुम्हें जो अच्छा लगे, वह पहन सकती हो।”
मैंने राहत की साँस ली।
“लेकिन,” उन्होंने आगे कहा, “अगर तुम साड़ी पहनना चाहो, तो मैं तुम्हें और अच्छे से पहनना सिखाऊँगी।”
मैं हँस पड़ी। “यह तो मैं हमेशा सीखना चाहती हूँ।”
“तो फिर कल से दोबारा अभ्यास शुरू।”
अगले दिन उन्होंने मुझे अपनी अलमारी से एक पुरानी, हल्की-सी साड़ी निकालकर दी।
“यह मेरी पसंदीदा साड़ियों में से एक थी,” उन्होंने कहा। “अब तुम पहनकर देखो।”
मैंने साड़ी हाथ में ली। कपड़ा बहुत मुलायम था और उसका रंग मुझे बहुत पसंद आया।
“सासू माँ, यह बहुत सुंदर है।”
“तो पहन लो।”
मैंने साड़ी पहनी, लेकिन इस बार आईने में खुद को देखकर मुझे पहले जैसी बेचैनी नहीं हुई। मैं किसी और जैसी दिखने की कोशिश नहीं कर रही थी। मैं बस अपने तरीके से सुंदर लगना चाहती थी।
सासू माँ ने मेरे पल्लू को ठीक किया और कहा, “अब देखो।”
मैंने आईने में खुद को देखा और मुस्कुरा दी।
“क्या हुआ?” उन्होंने पूछा।
“कुछ नहीं... बस अच्छा लग रहा है।”
“तो फिर यही सबसे ज़रूरी है।”
उस शाम मेरी पत्नी काम से लौटकर आई तो उसने मुझे उसी साड़ी में देखा।
“वाह,” उसने कहा, “आज तो तुम बहुत अलग लग रही हो।”
मैंने मुस्कुराकर पूछा, “अच्छी या बुरी?”
“बहुत अच्छी।”
मैंने थोड़ा शरमाकर कहा, “मैंने खुद चुनी है।”
“तो फिर और भी अच्छी।”
हम दोनों हँस पड़े।
उसने मेरे पास बैठकर पूछा, “आज कुछ खास हुआ?”
मैंने कहा, “हाँ। आज मुझे लगा कि मैं अपनी पसंद से भी तैयार हो सकती हूँ।”
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। “तुम्हें हमेशा अपनी पसंद से तैयार होना चाहिए।”
मैंने उसकी ओर देखा। “और अगर मेरी पसंद बदलती रहे तो?”
“तो बदलने दो। ज़िंदगी में सब कुछ एक जैसा थोड़े ही रहता है।”
उसकी बात सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा।
कुछ दिनों बाद सासू माँ ने मुझसे कहा, “तुम्हें अब घर के कामों की अच्छी आदत हो गई है। लेकिन अगर तुम चाहो तो अपने लिए भी कुछ कर सकती हो।”
“अपने लिए?”
“हाँ। तुम यहाँ काम की तलाश में आई थीं, याद है? अब तुम्हें अपने सपनों के बारे में भी सोचना चाहिए।”
मैं कुछ पल चुप रही।
मुझे याद आया कि जब मैं पहली बार इस शहर में आई थी, तब मेरे पास बहुत कम पैसे थे और भविष्य को लेकर बहुत चिंता थी। आंटी ने मुझे कमरा दिया था, लेकिन अब मैं समझ रही थी कि मुझे अपनी ज़िंदगी में आगे भी बढ़ना है।
“मैं कुछ काम करना चाहती हूँ,” मैंने कहा।
सासू माँ ने तुरंत कहा, “तो करो। हम तुम्हारी मदद करेंगे।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “लेकिन मुझे नहीं पता कि कहाँ से शुरू करूँ।”
“जहाँ से तुमने पहले शुरू किया था,” उन्होंने कहा। “छोटे कदम से।”
उस रात मैंने अपनी पत्नी से भी बात की।
“मैं काम करना चाहती हूँ,” मैंने कहा।
उसने कहा, “तो हम मिलकर देखेंगे कि तुम्हें क्या अच्छा लगता है।”
“मुझे लोगों से बात करना अच्छा लगता है। और मुझे कपड़े, मेकअप और साड़ी पहनना भी पसंद है।”
वह मुस्कुराई। “तो शायद तुम्हें ब्यूटी या फैशन से जुड़ा कोई काम पसंद आए।”
मैंने कहा, “हाँ, शायद।”
“तुम चाहो तो कोई कोर्स भी कर सकती हो।”
मैंने पहली बार इस संभावना के बारे में गंभीरता से सोचा।
शायद मैं सिर्फ किसी और जैसी दिखना नहीं चाहती थी। शायद मैं खुद भी कुछ सीखना चाहती थी, कुछ बनना चाहती थी।
अगले हफ्ते सासू माँ मुझे एक ब्यूटी पार्लर ले गईं। वही पार्लर, जहाँ कभी उन्होंने मुझे तैयार करवाया था।
वहाँ की महिलाओं ने मुझे पहचान लिया।
“अरे, आप फिर आई हैं!”
मैं मुस्कुरा दी। “हाँ, लेकिन इस बार कुछ नया सीखने आई हूँ।”
उन्होंने पूछा, “क्या सीखना चाहती हैं?”
मैंने कहा, “मेकअप, साड़ी ड्रेपिंग और शायद कुछ और भी।”
सासू माँ ने मेरी ओर देखकर कहा, “इसे जो सीखना है, सिखाइए। यह बहुत मेहनती है।”
मैंने उनकी ओर देखा और मन ही मन सोचा—कभी मैं यहाँ सिर्फ किसी और जैसी दिखने आई थी। आज मैं खुद कुछ सीखने आई हूँ।
यह एहसास मेरे लिए बहुत खास था।
कुछ महीनों बाद मैंने एक छोटा-सा ब्यूटी और मेकअप कोर्स शुरू कर दिया। शुरुआत में मुझे बहुत झिझक होती थी। दूसरे लोग मुझसे सवाल पूछते, तो मैं थोड़ा घबरा जाती। लेकिन धीरे-धीरे मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा।
मैंने सीखा कि मेकअप सिर्फ चेहरा बदलने का तरीका नहीं है। यह किसी को अपने बारे में अच्छा महसूस कराने का एक तरीका भी हो सकता है।
मैंने साड़ी पहनना भी और अच्छे से सीखा। अब मैं अलग-अलग तरह से पल्लू ले सकती थी, अलग-अलग स्टाइल में साड़ी बाँध सकती थी और दूसरों को भी सिखा सकती थी।
एक दिन सासू माँ ने मुझे तैयार होते हुए देखा और कहा, “अब तो तुम मुझसे भी अच्छी साड़ी पहन लेती हो।”
मैंने हँसकर कहा, “यह सब आपकी वजह से है।”
उन्होंने कहा, “नहीं, अब यह तुम्हारी मेहनत की वजह से है।”
मैंने आईने में खुद को देखा और मुस्कुरा दी।
धीरे-धीरे मेरी ज़िंदगी में एक नया संतुलन आने लगा। मैं घर के काम करती, अपनी पत्नी के साथ समय बिताती और अपने कोर्स पर भी ध्यान देती। कभी-कभी मैं अपने पुराने दोस्तों से बात करती और उन्हें अपने बारे में बताती।
एक दिन मेरी पत्नी ने पूछा, “क्या तुम अब भी कभी-कभी अपने पुराने दिनों को याद करती हो?”
मैंने कहा, “हाँ, लेकिन अब उन दिनों को याद करके मुझे उतनी परेशानी नहीं होती।”
“क्यों?”
“क्योंकि अब मुझे लगता है कि मैं अपनी ज़िंदगी को खुद समझ रही हूँ। पहले मैं किसी और जैसी बनना चाहती थी। अब मैं अपनी तरह से जीना चाहती हूँ।”
वह मुस्कुराई। “यह सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई।”
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
एक शाम सासू माँ ने मुझे अपने पास बुलाया।
“तुम्हें पता है,” उन्होंने कहा, “जब तुम पहली बार हमारे घर आई थीं, तब तुम बहुत घबराई हुई थीं।”
मैंने कहा, “हाँ, मुझे याद है।”
“तब मुझे लगा था कि तुम्हें सिर्फ एक कमरे की ज़रूरत है। लेकिन अब लगता है कि तुम्हें उससे कहीं ज़्यादा चाहिए था।”
मैंने उनकी ओर देखा।
“तुम्हें अपने लिए एक जगह चाहिए थी,” उन्होंने कहा, “जहाँ तुम बिना डर के रह सको, सीख सको और अपनी ज़िंदगी के बारे में सोच सको।”
मेरी आँखें भर आईं।
“सासू माँ,” मैंने कहा, “आपने मुझे बहुत कुछ दिया है।”
उन्होंने मेरा हाथ दबाया। “और तुमने भी हमें बहुत कुछ दिया है। तुम इस घर की खुशी हो।”
मैंने उन्हें गले लगा लिया।
उस पल मुझे लगा कि मैं सचमुच इस परिवार का हिस्सा बन चुकी हूँ।
एक नया सपना
कुछ समय बाद मैंने अपना छोटा-सा ब्यूटी स्टूडियो खोलने का सपना देखना शुरू किया। शुरुआत में यह सिर्फ एक विचार था, लेकिन धीरे-धीरे मैंने उसके बारे में सोचना शुरू किया।
मैं चाहती थी कि वहाँ आने वाली हर महिला अपने बारे में अच्छा महसूस करे। चाहे वह साड़ी पहनना सीखना चाहती हो, मेकअप करना, या बस थोड़ी देर अपने लिए समय निकालना चाहती हो।
मैं चाहती थी कि वहाँ किसी को यह महसूस न हो कि उसे किसी और जैसा बनना ज़रूरी है।
एक दिन मैंने यह बात अपनी पत्नी और सासू माँ को बताई।
मेरी पत्नी ने कहा, “तो फिर शुरू करो।”
सासू माँ ने कहा, “हम तुम्हारे साथ हैं।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “लेकिन मुझे बहुत कुछ सीखना होगा।”
“सीखो,” सासू माँ ने कहा। “हम सब सीखते हैं।”
मैंने सिर हिलाया।
उस रात मैं देर तक जागती रही। मेरे सामने बहुत सारे सवाल थे—पैसे कहाँ से आएँगे, जगह कैसे मिलेगी, काम कैसे शुरू होगा। लेकिन इस बार मुझे डर नहीं लग रहा था।
क्योंकि अब मुझे पता था कि मैं अकेली नहीं हूँ।
और सबसे बड़ी बात—अब मैं अपनी ज़िंदगी के बारे में खुद भी फैसला कर रही थी।
अध्याय: पहला कदम
अगली सुबह मैंने अपनी पत्नी से कहा, “मैं अपने स्टूडियो के लिए एक नाम सोच रही हूँ।”
वह मुस्कुराई। “अच्छा? क्या नाम?”
मैंने कुछ देर सोचा। “अपनी पहचान।”
“बहुत सुंदर नाम है।”
“क्योंकि मैं चाहती हूँ कि यहाँ आने वाली हर महिला को लगे कि वह जैसी है, वैसी ही अच्छी है।”
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। “तो फिर यही नाम रखो।”
मैंने पहली बार अपने सपने को सचमुच अपना नाम दिया था।
कुछ दिनों बाद हम एक छोटी-सी जगह देखने गए। वह बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन उसमें एक खिड़की थी, जहाँ से धूप आती थी। दीवारें थोड़ी पुरानी थीं और फर्श पर कुछ काम करवाना पड़ता, लेकिन मुझे वह जगह पसंद आ गई।
मैंने खिड़की के पास खड़े होकर कहा, “यहाँ एक बड़ा आईना होगा।”
मेरी पत्नी ने पूछा, “और?”
“यहाँ मेकअप की टेबल। वहाँ साड़ी रखने की जगह। और एक छोटा-सा कोना, जहाँ लोग बैठकर चाय पी सकें।”
सासू माँ ने हँसकर कहा, “तुमने तो पूरा स्टूडियो अभी से बना लिया।”
मैंने कहा, “हाँ, मन में तो बन ही गया है।”
हम तीनों हँस पड़े।
शुरुआत आसान नहीं थी। जगह ठीक करवाने, सामान खरीदने और ग्राहकों तक पहुँचने में समय लगा। कई बार मुझे लगा कि शायद मैं बहुत बड़ा सपना देख रही हूँ।
एक दिन मैं थककर घर लौटी और बोली, “मुझे नहीं पता कि मैं यह कर पाऊँगी या नहीं।”
सासू माँ ने कहा, “तुम्हें हर दिन यह साबित करने की ज़रूरत नहीं कि तुम कर सकती हो। बस हर दिन थोड़ा-सा आगे बढ़ो।”
मेरी पत्नी ने भी कहा, “और अगर कभी मुश्किल हो, तो हम मिलकर रास्ता निकालेंगे।”
मैंने दोनों की ओर देखा और मुस्कुरा दी।
“ठीक है,” मैंने कहा। “कल फिर कोशिश करूँगी।”
आखिरकार वह दिन आ गया जब अपनी पहचान का छोटा-सा स्टूडियो खुला।
दरवाज़े पर नाम देखकर मेरी आँखें भर आईं। मुझे अपने पुराने दिनों की याद आ गई—वह छोटा कमरा, मेरी परेशानियाँ और वह दिन जब मैंने पहली बार आंटी से अपने मन की बात कही थी।
तब मैं सिर्फ किसी और जैसी दिखना चाहती थी।
आज मैं दूसरों को उनकी पसंद के मुताबिक तैयार होने में मदद करने के लिए खड़ी थी।
सासू माँ ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। “बहुत अच्छा किया।”
मेरी पत्नी ने कहा, “मुझे तुम पर गर्व है।”
मैंने दोनों को गले लगा लिया।
पहली ग्राहक एक युवा लड़की थी, जो अपनी शादी के लिए मेकअप करवाने आई थी। वह बहुत घबराई हुई थी।
“मुझे डर लग रहा है कि मैं अच्छी नहीं लगूँगी,” उसने कहा।
मैंने मुस्कुराकर पूछा, “आपको कैसा लुक पसंद है?”
उसने कहा, “बहुत हल्का। मैं खुद जैसी दिखना चाहती हूँ।”
मैंने कहा, “तो हम वैसा ही करेंगे।”
जब वह तैयार होकर आईने के सामने बैठी, तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“मुझे बहुत अच्छा लग रहा है,” उसने कहा।
मैंने कहा, “तो फिर यही सबसे ज़रूरी है।”
उसने मेरा धन्यवाद किया और चली गई।
मैं कुछ देर आईने के सामने खड़ी रही। मुझे लगा कि शायद यही वह काम था, जिसे मैं हमेशा से करना चाहती थी।
शाम को घर लौटकर मैंने सासू माँ से कहा, “आज एक लड़की आई थी। वह बहुत घबराई हुई थी, लेकिन तैयार होने के बाद बहुत खुश हो गई।”
उन्होंने कहा, “तुम्हें अच्छा लगा?”
“बहुत।”
“तो फिर तुम सही रास्ते पर हो।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “हाँ।”
मेरी पत्नी ने पूछा, “आज कितनी कमाई हुई?”
मैंने हँसकर कहा, “बहुत कम।”
वह बोली, “लेकिन खुशी कितनी हुई?”
मैंने कहा, “बहुत ज़्यादा।”
हम दोनों हँस पड़े।
रात को मैं अपने कमरे में बैठी थी। मैंने अपनी साड़ी उतारी, आरामदायक कपड़े पहने और आईने के सामने खड़ी हो गई।
पहले मैं आईने में खुद को देखकर परेशान हो जाती थी। मुझे लगता था कि मैं किसी और जैसी क्यों नहीं दिखती।
आज मैं आईने में खुद को देखकर मुस्कुरा रही थी।
मैंने धीरे से कहा, “मैं जैसी हूँ, वैसी ही ठीक हूँ।”
फिर मुझे अपनी पत्नी की आवाज़ सुनाई दी।
“क्या कर रही हो?”
मैंने कहा, “बस खुद को देख रही हूँ।”
वह मुस्कुराई। “अच्छी लग रही हो।”
मैंने कहा, “हाँ, आज मुझे भी ऐसा ही लग रहा है।”
कुछ समय बाद आंटी भी हमारे स्टूडियो आईं। उन्होंने दरवाज़े पर नाम देखा और मुस्कुराईं।
“अपनी पहचान,” उन्होंने पढ़ा। “बहुत अच्छा नाम रखा है।”
मैंने उन्हें गले लगा लिया।
“आंटी, अगर आपने उस दिन मेरी मदद नहीं की होती, तो शायद मैं आज यहाँ नहीं होती।”
उन्होंने कहा, “मैंने सिर्फ तुम्हारी मदद की थी। आगे बढ़ना तुमने खुद सीखा है।”
मैंने कहा, “लेकिन आपने मुझे यह भी सिखाया कि किसी को उसकी इच्छा के लिए शर्मिंदा नहीं करना चाहिए।”
वह कुछ पल चुप रहीं, फिर बोलीं, “और तुमने मुझे यह सिखाया कि हर इंसान की अपनी कहानी होती है।”
मैंने उनकी ओर देखा और मुस्कुरा दी।
उस शाम हम तीनों साथ बैठकर चाय पी रहे थे। मेरी पत्नी ने कहा, “अब तो तुम्हें अपने स्टूडियो के लिए एक अच्छा-सा उद्घाटन समारोह करना चाहिए।”
मैंने कहा, “हाँ, लेकिन बहुत बड़ा नहीं। बस कुछ करीबी लोग।”
सासू माँ ने कहा, “और मिठाई मैं बनाऊँगी।”
आंटी ने हँसकर कहा, “और मैं तुम्हारे लिए एक नई साड़ी लाऊँगी।”
मैंने कहा, “लेकिन इस बार मैं अपनी पसंद की चुनूँगी।”
सब हँस पड़े।
मैंने महसूस किया कि मेरी ज़िंदगी में बहुत कुछ बदल चुका था, लेकिन सबसे अच्छा बदलाव यह था कि अब मैं अपने फैसले खुद लेने लगी थी।
एक दिन की छोटी-सी खुशी
कुछ महीनों बाद स्टूडियो में काम बढ़ने लगा। मैं अब दूसरों को भी साड़ी पहनना सिखाती थी। कई महिलाएँ मुझसे कहतीं कि उन्हें पहले साड़ी पहनने में बहुत झिझक होती थी, लेकिन अब वे आत्मविश्वास से पहन पाती हैं।
एक दिन एक महिला ने मुझसे कहा, “आपने मुझे सिर्फ साड़ी पहनना नहीं सिखाया, आपने मुझे अपने बारे में अच्छा महसूस करना सिखाया है।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “आपने खुद सीखा है। मैंने बस मदद की है।”
उस दिन घर लौटते समय मुझे बहुत खुशी हो रही थी।
मैंने अपनी पत्नी से कहा, “मुझे लगता है कि मैं सचमुच कुछ अच्छा कर रही हूँ।”
उसने कहा, “तुम कर रही हो।”
मैंने कहा, “और मुझे लगता है कि मैं अब सिर्फ किसी और जैसी बनने की कोशिश नहीं कर रही।”
वह मुस्कुराई। “अब तुम अपनी पहचान बना रही हो।”
मैंने उसकी ओर देखा और कहा, “हाँ। अपनी पहचान।”
उस रात मैंने अपनी पुरानी तस्वीरें देखीं। उनमें मैं बहुत अलग दिखती थी। कुछ तस्वीरों में मैं बहुत घबराई हुई थी, कुछ में बहुत खुश, और कुछ में मुझे खुद समझ नहीं आता था कि मैं क्या महसूस कर रही हूँ।
मैंने तस्वीरें एक-एक करके देखीं।
फिर मैंने अपनी पत्नी को बुलाया।
“देखो,” मैंने कहा, “यह मेरी पहली तस्वीर है जब मैं यहाँ आई थी।”
उसने तस्वीर देखी और कहा, “तुम बहुत बदल गई हो।”
मैंने कहा, “हाँ। लेकिन मुझे लगता है कि मैं अब खुद को पहले से ज़्यादा समझती हूँ।”
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
मैंने कहा, “और मुझे खुशी है कि मैंने अपनी ज़िंदगी को एक मौका दिया।”
अंत नहीं, शुरुआत
समय बीतता गया। मेरा स्टूडियो धीरे-धीरे चलने लगा। घर में भी सब कुछ सामान्य हो गया। मैं अब भी साड़ी पहनती थी, कभी सलवार-कमीज़, कभी अपने पुराने कपड़े। कभी मेकअप करती, कभी बिना मेकअप के रहती। और अब मुझे किसी एक रूप में खुद को बाँधकर रखने की ज़रूरत महसूस नहीं होती थी।
मैं अपनी पत्नी के साथ खुश थी। सासू माँ के साथ मेरा रिश्ता और भी गहरा हो गया था। आंटी अब भी मेरी ज़िंदगी का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।
एक दिन मैंने आंटी से कहा, “आपने मुझे बहू बनाया, लेकिन उससे भी ज़्यादा आपने मुझे खुद को समझने का मौका दिया।”
उन्होंने कहा, “और तुमने उस मौके का अच्छा इस्तेमाल किया।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “अब मुझे लगता है कि मैं किसी और जैसी बनने की कोशिश नहीं कर रही। मैं बस अपनी तरह से जी रही हूँ।”
आंटी ने कहा, “यही तो सबसे बड़ी बात है।”
मैंने उनकी ओर देखा और मन ही मन धन्यवाद दिया।
क्योंकि मेरी कहानी सिर्फ एक नई ज़िंदगी की शुरुआत की कहानी नहीं थी।
यह अपनी पहचान खोजने की कहानी भी थी।
और अब मुझे पता था कि मेरी पहचान किसी एक कपड़े, किसी एक रूप या किसी एक भूमिका से नहीं बनती।
मैं जैसी हूँ, वैसी ही अपनी हूँ।
और यही मेरी सबसे बड़ी खुशी थी।
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