एक घर में शादी की तैयारियाँ जोरों पर हैं। मोहन और सावित्री अपनी बेटी रूपा की शादी को लेकर खुश हैं। रिश्तेदार आ चुके हैं, घर सज चुका है और दूल्हे राकेश का परिवार बारात लेकर आने वाला है।
लेकिन शादी के दिन एक ऐसी घटना होती है जो पूरे परिवार की खुशियाँ बदल देती है। रूपा अपने प्रेमी विनय के साथ घर से भाग जाती है।
परिवार के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाता है। शादी टूटने, समाज में बदनामी होने और दोनों परिवारों के रिश्ते बिगड़ने का डर पैदा हो जाता है।
इसी परिस्थिति में 22 साल का सागर अपनी बहन की जगह दुल्हन बनने का फैसला करता है। लड़की के रूप में उसकी नई पहचान विद्या होती है। परिवार की इज्जत बचाने के लिए वह दूसरे घर की बहू बनने और राकेश से शादी करने के लिए तैयार होता है।
लेकिन यह फैसला उसके लिए एक बड़ी परीक्षा बन जाता है। उसे दुल्हन की तरह तैयार होना है, नए परिवार के सामने अपनी पहचान छिपानी है और शादी की रस्मों से गुजरना है।
रूपा के भाग जाने के बाद शादी टूटने का खतरा है। सागर को उसकी जगह दुल्हन बनना है और दूसरे परिवार को इस बात का पता नहीं चलना चाहिए।सागर अपने माता-पिता की मदद करना चाहता है, लेकिन उसे अपनी जिंदगी का इतना बड़ा फैसला करना पड़ रहा है।
दरवाजे पर गेंदे के फूलों की मालाएँ हैं। आँगन में कुर्सियाँ लगी हैं। कुछ महिलाएँ मिठाइयों की प्लेटें सजा रही हैं।
आवाज़: दूर से शहनाई सुनाई देती है। बर्तनों की हल्की आवाज़ और रिश्तेदारों की बातचीत सुनाई देती है।
कहते हैं, बेटी की शादी हर माँ-बाप का सबसे बड़ा सपना होती है। उस दिन मेरे घर में भी सबके चेहरे पर खुशी थी। किसी को नहीं पता था कि कुछ ही घंटों में सब कुछ बदलने वाला है।"
सावित्री कमरे में बैठकर रूपा के गहने और लाल दुपट्टा ठीक कर रही हैं। उनके चेहरे पर खुशी है, लेकिन शादी की तैयारियों की थकान भी दिखाई देती है।
सावित्री:
"अरे, वो लाल वाला दुपट्टा ज़रा संभालकर रखना। आज मेरी बेटी दुल्हन बनेगी। कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।"
पास खड़ा सागर हल्की मुस्कान के साथ माँ को देखता है।
सागर:
"माँ, तुम सुबह से काम में लगी हो। थोड़ा आराम कर लो। सब हो जाएगा।"
सावित्री:
"बेटा, माँ की बेटी की शादी हो और वो आराम करे? आज तो मेरे पैर भी नहीं रुकेंगे।"
सागर मुस्कुराता है। वह माँ की खुशी देखकर कुछ पल चुप रहता है।
मोहन आँगन में रिश्तेदारों का स्वागत कर रहे हैं। एक रिश्तेदार उनके कंधे पर हाथ रखता है।
रिश्तेदार:
"मोहन भाई, आखिर आपकी बेटी की शादी का दिन आ ही गया। बहुत बधाई!"
मोहन:
"बहुत-बहुत धन्यवाद। बस भगवान सब अच्छा करे और दोनों बच्चों का जीवन खुशियों से भर जाए।"
रिश्तेदार आगे चला जाता है। मोहन एक पल के लिए शादी के इंतजाम देखते हैं और गहरी साँस लेते हैं।
सागर आँगन से गुजर रहा है। रूपा तैयार होने के लिए अपने कमरे की ओर जा रही है। वह सागर को देखकर रुकती है।
रूपा:
"सागर, सुन ना! मेरे कमरे में जाकर देख, मेरा फोन वहीं रह गया क्या?"
सागर:
"तुम्हारा फोन तुम्हें मुझसे ज़्यादा प्यारा है। शादी तुम्हारी है, और चिंता फोन की है!"
रूपा हल्का हँस देती है।
रूपा:
"बहुत मजाक उड़ाता है मेरा। जा, देख तो सही।"
सागर सिर हिलाकर उसके कमरे की ओर चला जाता है।
सागर कमरे के दरवाजे के पास रुकता है। बाहर से रिश्तेदारों की हँसी और शादी की तैयारियों की आवाज़ें आ रही हैं।
वह अपने पिता को मेहमानों से मिलते हुए और माँ को गहने संभालते हुए देखता है।
सागर, वॉइसओवर:
"उस वक्त मुझे लगता था कि बस आज का दिन अच्छे से निकल जाए, फिर सब ठीक हो जाएगा। मुझे क्या पता था कि आज मुझे अपनी ही जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला लेना पड़ेगा।"
उसकी आँखों में कोई खास डर नहीं, बस परिवार के लिए प्यार और दिन की हलचल दिखाई देती है।
एक रिश्तेदार आवाज़ लगाता है:
रिश्तेदार:
"अरे भाई, जल्दी करो! बारात के आने का समय होने वाला है!"
घर में हलचल बढ़ जाती है।
सावित्री रूपा को आवाज़ देती हैं:
सावित्री:
"रूपा बेटा, जल्दी तैयार हो जा! आज तेरा सबसे बड़ा दिन है!"
कैमरा रूपा के बंद कमरे के दरवाजे पर रुकता है।
संगीत: शहनाई धीरे-धीरे कम होती है।
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