Family · Hindi

लिबास

In Progress | Part 1 of 1 | 0 Likes

सुबह नहाने के बाद मैं अपने लिए एक अच्छी साड़ी ढूँढ रही हूँ। मुझे हल्के और मुलायम कपड़े ही पसंद आते हैं, इसलिए मेरी अलमारी में जितनी भी साड़ियाँ हैं, सब बेहद सुरुचिपूर्ण और आरामदायक फैब्रिक की ही हैं। आज मुझे किसी काम के सिलसिले में बाहर नहीं जाना है, क्योंकि आज मैं अपने घर आई हूँ—अपनी मम्मी, पापा और छोटी बहन के पास। आज न तो कोई मीटिंग है और न ही कोई बड़ा निर्णय लेने का दबाव।

मैं अपने कमरे में अलमारी खँगाल ही रही हूँ कि तभी अचानक ज़ोर से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आती है। मैं चौंककर तुरंत अपने टॉवल को कसकर पकड़ लेती हूँ और पीछे मुड़कर देखती हूँ—सामने मम्मी खड़ी हैं।

"ओह मम्मी! ज़रा दस्तक देकर (knock करके) आया करो न! मैं तो डर ही गई थी, मुझे लगा पापा हैं," मैंने अपने टॉवल को सँभालते हुए कहा।

मम्मी ने मुझे देखा और हंसते हुए बोलीं, "ओये हीरोइन! किससे डर रही है? मैं माँ हूँ तेरी... मेरे रहते कोई तुझे छू भी कैसे सकता है! और तेरे पापा भला इस वक्त कैसे आएँगे? वो तो सुबह की कसरत के लिए गए हैं, भूल गई क्या?"

मम्मी मुझे बहुत ध्यान से देख रही थीं, उनकी आँखों में बेशुमार प्यार और दुलार छलक रहा था। उन्होंने आगे बढ़कर मेरे बालों को सहलाया और बोलीं, "अब तेरे बाल बहुत अच्छे हो गए हैं—घने, लंबे और मज़बूत! देखो तो सही, कमर के भी नीचे तक जा रहे हैं।"

मैं वापस ड्रॉअर में साड़ी ढूँढने लगती हूँ।
"वैसे ढूँढ क्या रही है? कुछ चाहिए तो मुझे बता, पिछली बार मैंने ही सारे ड्रॉअर साफ़ किए थे।"
सच कहूँ तो मम्मी को घर में ज़्यादा नौकर-चाकर पसंद नहीं हैं। घर में बस तीन लोग मदद के लिए हैं, पर फिर भी वो अकेले पूरे घर को इतने बेहतरीन तरीके से कैसे सँभाल लेती हैं, यह आज तक मेरी समझ से बाहर है।
"अरे मम्मी, देखो न! मुझे एक अच्छी सी साड़ी निकालकर दो न... कब से चुन रही हूँ, समझ ही नहीं आ रहा।"
"ओह! तो यह बात है... पर मैं तो तेरे लिए कुछ और ही लेकर आई हूँ," मम्मी ने मुस्कराते हुए कहा।

उनके हाथ में एक बैग था, जिसमें शायद कपड़े थे। मम्मी मेरे पास बिस्तर पर बैठ गईं और बोलीं, "यह पार्सल सुबह ही आया था, तेरे नाम से था इसलिए तुझे देने चली आई। अब जल्दी से तैयार होकर नीचे आ जा, नाश्ते का वक्त हो गया है।"

मम्मी रसोई की तरफ चली गईं और मैं उत्सुकता से पार्सल खोलने लगी। यह वही कुर्ती और पलाज़ो सेट था जो मैंने खुद कस्टमाइज़ करके ऑर्डर किया था। मैं काफी दिनों से इसी का इंतज़ार कर रही थी, और यह बिल्कुल सही वक्त पर आया था!
पार्सल खोलते ही मेरा दिल खुशी से खिल उठा। इसमें स्काई ब्लू (आसमानी नीले) रंग की शॉर्ट, स्लीवलेस स्ट्रेट कुर्ती थी, जिसके निचले हिस्से (दामन) पर चिकनकारी स्टाइल का कटवर्क और आईलेट एम्ब्रॉयडरी का बेहद बारीक काम था। इसके साथ सफ़ेद बेस पर हरे रंग के वर्टिकल टाई-डाई (लहरिया) पैटर्न वाला फ्लेयर्ड पलाज़ो था। और इस पूरे लुक को पूरा कर रहा था कोरल रेड (मूंगा लाल) शेड का हल्का शिफॉन दुपट्टा, जो बहुत ही प्यारा कंट्रास्ट दे रहा था।
इस एथनिक सूट को पहनकर मैं आईने के सामने आ खड़ी होती हूँ। अपने बालों को एक ओर ढालकर, उन्हें कंधे पर ढीली लड़ी की तरह सँवारने लगती हूँ।
फिर अपने मेकअप ड्रॉअर से एक नन्हीं सी डायमंड बिंदी निकालकर माथे के ठीक बीचों-बीच सजाती हूँ और बहुत ही हल्का, निखरा हुआ मेकअप करती हूँ।
अब मैं आईने में खुद को ध्यान से देख रही हूँ... यह वही आईना है जिसने हर कठिन घड़ी में मुझे ताकत दी है। मुझे यहाँ तक पहुँचने में पूरे सात साल लग गए। मैं महज़ बीस साल की थी जब मुझे यह एहसास हुआ था कि मैं ऐसी ज़िंदगी नहीं जीना चाहती जैसी मुझे मिली है। मैं सबसे लड़ी... पर सबसे ज़्यादा मैं खुद से लड़ी हूँ। आज मुझे जो कुछ भी चाहिए था, वह सब मेरे पास है।

तैयार होकर मैं किचन में आती हूँ, जहाँ मम्मी गरमा-गरम डोसा बना रही थीं। तभी पीछे से किसी ने आकर झटके से मेरा दुपट्टा खींच लिया! मुड़कर देखा तो पोर्णिमा थी—मुझसे पाँच साल छोटी है, लेकिन लंबाई और कद-काठी के मामले में मुझसे काफी आगे निकल चुकी है।
मैं उस पर चिल्लाई, "पोरू! दुपट्टा वापस कर!"
पर मैं उसके पीछे कितना ही भाग पाती... आखिर कोई लड़की इतने घेरेदार पलाज़ो में कितना तेज़ भाग सकती है!
"अरे क्या यार सिलीन! चाहिए तो पकड़ ले और ले जा!" वह पूरे घर में बड़ी तेज़ी से भाग रही थी और हम दोनों की यह बचकानी मस्ती देखकर मम्मी हँसे जा रही थीं।
मैं थककर रुक गई और कहा, "देख पोरू! अगर दुपट्टा वापस नहीं किया न, तो अपनी उस घड़ी को भूल जा... फिर मत कहना कि मैं तेरे लिए कुछ नहीं लाई!"
यह सुनते ही वह एकदम से रुक गई और दुपट्टा वापस थमाते हुए आँखें फाड़कर बोली, "क्या सच में? तुम वही वॉच लाई हो जो मुझे चाहिए थी? पर वो तो आउट ऑफ स्टॉक हो गई थी न, तुम्हें कैसे मिली?"
"तुझे क्या पता तेरी बहन क्या-क्या कर सकती है! वैसे, तेरे बेडरूम में रख दी है, जाकर देख ले तब भरोसा होगा।"
पोर्णिमा ने खुशी से उछलकर मुझे ज़ोर से गले लगा लिया और बोली, "बहन हो तो तुम्हारे जैसी! मुझे वो कब से चाहिए थी... आज वही पहनकर ऑफिस जाऊँगी!"
मैं अपना दुपट्टा ठीक करते हुए मम्मी के सामने आकर खड़ी हो गई।
"हो गई तुम दोनों की शैतानियाँ? चलो अब चुपचाप नाश्ते के लिए बैठ जाओ," मम्मी ने प्यार से डांटते हुए मेरे सामने डोसा, इडली और सांभर परोस दिया। कितने ज़माने बाद मम्मी के हाथ का यह स्वाद नसीब हुआ था।
खाते-खाते मम्मी ने कहा, "दोपहर को मेरे साथ बाहर चलेगी? मुझे थोड़ा काम है।"
"हाँ मम्मी, बिल्कुल चलूँगी," मैंने तुरंत हाँ कर दी।
मम्मी का चेहरा देखकर लगा कि वो थोड़ी गंभीर हैं... पर मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है।

In Progress....

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