अगर मैं लड़की होती तो…
Ek khwaab, ek zindagi, aur ankahe ehsaas…
अगर मैं लड़की होती तो…
सुबह पापा की चाय बनाती,
मम्मी के कामों में हाथ बँटाती,
घर का रखती पूरा ख़याल,
उनके साथ करती मीठे सवाल-जवाब।
सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना,
रात के डिनर तक रसोई में बिताना,
काम करते-करते मम्मी के साथ,
मीठी-मीठी बातें होतीं दिन और रात।
त्योहारों पर मम्मी के संग सजती-सँवरती,
उनके साथ अपनी खुशियाँ बाँटती,
नवरात्रि में चनिया-चोली पहनकर गरबा खेलती,
गणपति में नौवारी पहनकर नाचती,
दिवाली पर लक्ष्मी खेलती,
अपने घर की रौनक बनती।
काश, ये सारे पल मैं जी पाती,
अगर मैं लड़की होती…
सुबह सबको नाश्ता खिलाकर ऑफिस जाती,
हज़ारों नज़रों के बीच अपनी राह बनाती,
कौन क्या सोचेगा, इसकी परवाह से ज़्यादा,
खुद पर रखती भरोसा, खुद से करती वादा।
अपनी मेहनत से आगे बढ़ती,
हर मुश्किल से लड़कर तरक्की करती,
अपनी पहचान अपने दम पर बनाती,
हर दिन कुछ नया हासिल कर पाती।
अगर मैं लड़की होती…
माँ मेरे माथे पर बिंदी लगाती,
बालों को सँवारकर जूड़ा बनाती,
गहनों से मेरा शृंगार करती,
लाल चुनरी से मेरा सिर ढकती।
फिर बड़े प्यार से मुझे मंडप तक ले जाती,
मेरी नई ज़िंदगी की दुआएँ मन में सजाती,
और मेरा हाथ किसी अनजान लड़के के हाथ में रख देती,
मेरे बचपन की दुनिया से नई दुनिया जोड़ देती।
अगर मैं लड़की होती…
उस अनजान के साथ पूरा जीवन बिताती,
नई उम्मीदों के साथ अपना घर बसाती,
उसके माँ-बाप की सेवा करती,
उनकी जिम्मेदारियाँ भी अपने कंधों पर धरती।
जैसे मायके में अपने कर्तव्य निभाती आई,
वैसे ही ससुराल में भी अपनी जिम्मेदारी निभाती,
माँ-बाप की इज़्ज़त का ख़याल मन में रहता,
हर रिश्ते को निभाने का फ़र्ज़ साथ चलता।
क्योंकि अगर मैं लड़की होती,
तो मेरा कर्तव्य बढ़ जाता,
मेरी जिम्मेदारियों का दायरा और बड़ा हो जाता।
अगर मैं लड़की होती…
सास-ससुर, जेठ-देवर की जिम्मेदारी उठाती,
कभी ननद के साथ दो पल की खुशियाँ मनाती,
तो कभी उसी के दो पल के ताने भी सुनती,
कभी हँसती, कभी चुप रहकर सब कुछ सहती।
सर पर पल्लू, माथे पर बिंदी-सिंदूर,
गले में मंगलसूत्र, हाथों में चूड़ियाँ भरपूर,
पैरों में पायल की छन-छन बजती,
मेरे शृंगार से मेरी दुनिया सजती।
ये सब तो शृंगार के प्यारे निशान हैं,
किसी के प्रेम की पहचान, किसी के अरमान हैं,
लेकिन कभी-कभी शादी के बाद यही शृंगार,
बन जाता जिम्मेदारियों की बेड़ियों का भार।
अगर मैं लड़की होती…
पति के साथ दो पल की मिठास का इंतज़ार करती,
उसके प्यार भरे लम्हों की आस रखती,
कभी उसकी मुस्कान से दिन सँवर जाता,
कभी उसका रूखापन दिल को उदास कर जाता।
अगर मैं लड़की होती…
मन को कुछ अच्छा न लगता,
और उसी पति की डाँट भी सुननी पड़ती,
उसे चाय समय पर न मिले तो मेरी गलती,
उसके दिन की हर परेशानी भी मेरी गलती।
ऑफिस में देर हो जाए, बॉस उसे डाँट लगाए,
या कोई चीज़ खो जाए, उसका गुस्सा घर तक आए,
किसी और की परेशानी का बोझ भी मुझ पर आ जाता,
और न जाने क्यों, हर बार मुझे ही दोषी ठहराया जाता।
अगर मैं लड़की होती…
अपना करियर पीछे छोड़ने का दबाव भी आता,
बच्चे करने का सवाल बार-बार उठाया जाता,
मेरे सपनों और मेरी जिम्मेदारियों के बीच,
मुझे चुनना पड़ता कोई एक राह कभी-कभी।
लेकिन फिर एक एहसास ऐसा भी आता,
जो शायद हर दर्द को कुछ पल भुलाता,
नौ महीने अपनी कोख में बच्चे को रखना,
उसके आने तक हर पल एक उम्मीद में जीना।
उस दर्द को महसूस कर पाती,
उस मीठे एहसास को जी पाती,
जब मेरा बच्चा दुनिया में आता,
मेरा मन अनकही खुशी से भर जाता।
अगर मैं लड़की होती…
बच्चों को खेलते देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता,
उनकी हँसी से मेरा हर दिन खिल जाता,
उनकी छोटी-छोटी बातों पर मुस्कुराती,
उनके सपनों में अपने सपने सजाती।
और उसी बच्चे को जब कोई चोट लगती,
मेरी दुनिया जैसे एक पल को थमती,
उसकी तकलीफ़ में मेरी जान निकल जाती,
उसकी एक मुस्कान फिर मेरी दुनिया लौटाती।
अगर मैं लड़की होती…
फिर बच्चे धीरे-धीरे बड़े हो जाते,
अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो जाते,
जिस माँ की उँगली पकड़कर चलना सीखा था,
उसी माँ के साथ बैठने का वक़्त कम हो जाता।
मुझे भी शायद ये एहसास मिलता,
कि माँ की अहमियत अब पहले-सी नहीं रही,
जिनके लिए अपनी दुनिया सजाई थी,
उनकी दुनिया में मेरी जगह अब पहले-सी नहीं रही।
सब अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त रहते,
अपने सपनों की राह पर आगे बढ़ते,
और मैं अपने ही परिवार के बीच रहकर,
कभी-कभी खुद को अकेला पाती।
कितने रिश्ते होते, कितनी जिम्मेदारियाँ होतीं,
कितनी खुशियाँ और कितनी उदासियाँ होतीं,
कितने अपने होते मेरे आसपास,
फिर भी शायद खुद से ही होती मेरी कुछ बातें ख़ास।
अगर मैं लड़की होती…
तो शायद ये सारे रंग देख पाती,
कभी हँसती, कभी रोती, कभी मुस्कुराती,
कभी शृंगार में अपनी खुशी तलाशती,
कभी जिम्मेदारियों में खुद को भूल जाती।
कभी बेटी बनकर माँ का हाथ बँटाती,
कभी पत्नी बनकर नया घर सजाती,
कभी माँ बनकर बच्चों पर प्यार लुटाती,
कभी अकेले बैठकर अपनी कहानी दोहराती।
न जाने कितने ख्वाब हैं इस एक ख़याल में,
कितने अनकहे सवाल हैं मेरे इस सवाल में,
खुशियों से लेकर जिम्मेदारियों के हर पड़ाव तक,
मैं जीना चाहता हूँ उस कल्पना को, उसके हर प्रभाव तक।
और जब कोई पूछे कि दिल में क्या अरमान है,
क्यों इस ख़याल से इतना गहरा लगाव है,
तो शायद मेरे पास बस इतना-सा जवाब हो—
मैं सिर्फ़ लड़की के कपड़े पहनने की बात नहीं करता,
मैं उस ज़िंदगी के हर रंग को महसूस करना चाहता हूँ।
उसकी खुशियाँ, उसकी जिम्मेदारियाँ, उसके सपने, उसकी तन्हाई—
मैं अपने इस ख़याल में उन सबको जीना चाहता हूँ।
अगर मैं लड़की होती…
तो शायद मेरी कहानी कुछ और होती।
खुशियों के कुछ नए पल होते,
कुछ नई जिम्मेदारियाँ होतीं,
कुछ नए सपने होते, कुछ नई परेशानियाँ होतीं…
और इन सबके बीच,
एक ज़िंदगी होती—
जिसे मैं अपने अंदाज़ में जीना चाहता।
अगर मैं लड़की होती…
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