दरवाज़ा बंद होते ही कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
विवेक और समर्थ ने एक-दूसरे की ओर देखा। दोनों को अब समझ आ चुका था कि तनिमा का पूरा मेकओवर सिर्फ़ एक दिखावा था। जिस “ब्राइडल कॉन्ट्रैक्ट” की वह बात कर रही थी, उसके पीछे एक बड़ा आपराधिक गिरोह था।
करीब आधे घंटे बाद बाहर से कुछ लोगों की आवाज़ें सुनाई दीं।
दरवाज़ा खुला।
तनिमा के साथ दो अजनबी आदमी अंदर आए। उन्होंने दोनों को देखा और आपस में धीमी आवाज़ में कुछ चर्चा की। फिर उनमें से एक ने कहा, “पहला खरीदार वीडियो कॉल पर है।”
तनिमा मुस्कुराई। “आज दोनों की अलग-अलग बोली लगेगी।”
विवेक का दिल तेजी से धड़कने लगा।
कुछ ही देर में कमरे की एक बड़ी स्क्रीन पर कई चेहरे दिखाई देने लगे। अलग-अलग देशों से लोग उस निजी नीलामी में शामिल थे। तनिमा ने दोनों की तस्वीरें और नकली पहचान से जुड़े दस्तावेज़ स्क्रीन पर दिखाए।
“पहला उम्मीदवार—विवेक,” उसने कहा। “शुरुआती बोली पाँच लाख।”
एक व्यक्ति ने बोली बढ़ाई।
“छह लाख।”
दूसरी आवाज़ आई।
“सात लाख।”
फिर तीसरी।
“दस लाख।”
आठ घंटे बाद दरवाज़ा खुला। तनिमा के साथ एक अनजान बंगाली आदमी अंदर आया। उसकी उम्र लगभग चालीस साल थी और उसने सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहन रखा था। उसने विवेक को कुछ देर तक ध्यान से देखा और फिर तनिमा से धीमी आवाज़ में बंगाली में बात की।
विवेक का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसे अब समझ आ गया था कि वह आदमी उसी के लिए आया था।
तनिमा ने विवेक की ओर इशारा करते हुए कहा, “यही है तुम्हारी होने वाली दुल्हन।”
आदमी ने विवेक को गौर से देखा और बोला, “नाम क्या है?” तनिमा मुस्कुराई। विद्या
विवेक जवाब देना चाहता था, लेकिन उसके मुँह पर लगा गैग अभी भी मौजूद था। उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
कुछ देर बाद उसे आज़ाद किया गया। वह तुरंत बोल पड़ा, “मुझे जाने दीजिए! मैंने किसी से शादी करने के लिए हाँ नहीं कही है!”
आदमी कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसने कहा, “मेरा नाम अरिंदम है। मैंने तुम्हें खरीदा है क्योंकि मुझे तुम्हें गुलाम बनाना है। मुझे भी तनिमा की असली करतूत का पूरा पता नहीं था।”
आधिकारिक तौर पर सभी विवेक के दस्तावेज अब विद्या के नाम के बन चुके थे
विवेक अब विद्या बन चुका था
विद्या ने अविश्वास से उसकी ओर देखा।
अरिंदम ने अपना फोन निकाला और कुछ तस्वीरें दिखाईं। उनमें कई ऐसे लोग थे जिन्हें तनिमा ने पहले “मेकओवर” किया था ।
विद्या को अचानक एहसास हुआ कि मामला जितना दिखाई दे रहा था, उससे कहीं बड़ा था।
“और मैं?” उसने पूछा।
तुम अब विद्या हो मेरी पत्नी , उसी समय बाहर से कदमों की आवाज़ सुनाई दी।
विवेक और अरिंदम दोनों चुप हो गए।
दरवाज़े के दूसरी तरफ तनिमा खड़ी थी।
उधर सम्राट के लिए भी एक खरीदार आया था—पैंतालीस साल का एक बंगाली व्यक्ति, जिसका नाम सौरव था। तनिमा ने उसे सम्राट से मिलवाते हुए कहा, “यही है वह दुल्हन जिसके बारे में मैंने बताया था।”
सम्राट के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। वह समझ चुका था कि विवेक की तरह उसे भी धोखे से इस स्थिति में पहुँचाया गया था।
सौरव ने कुछ देर सम्राट को देखा और फिर तनिमा से कहा, “मैं इसे अपने साथ ले जाऊँगा।”
लेकिन बाहर निकलते समय सौरव ने धीरे से सम्राट से कहा, “डरो मत। मैं तुम्हें नुकसान पहुँचाने नहीं आया हूँ।”
सम्राट चौंक गया।
मैंने तुम्हें अपने भाई के लिए खरीदा है जो करेगा वो मेरा भाई करेगा आख़िर तुम मेरे भाई की पत्नी हो।
तुम्हारे सारे दस्तावेज़ अब संध्या के नाम के बन गए हैं। आज कहो तुम संध्या हो और मेरे भाई संजय की पत्नी हो।
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