Festival · Hindi

Kabir ki crossdressing

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बनारस की पुरानी गलियों में रहने वाला कबीर एक सीधा-साधा लड़का था, जो शहर के एक छोटे से थिएटर में बैकस्टेज का काम संभालता था। नाटकों के पात्रों के लिए सुंदर परिधान तैयार करना उसका पसंदीदा काम था, लेकिन वह हमेशा पर्दे के पीछे ही रहता।
एक शाम, थिएटर के पुराने तहखाने की सफाई करते वक्त उसकी नज़र धूल से ढके शीशम के बक्से पर पड़ी। बक्से के भीतर मलमल में लिपटी एक रेशमी, गहरे नीले रंग की पारंपरिक अनारकली पोशाक रखी थी, जिस पर चांदी के तारों से अनोखे नक्षत्र काढ़े गए थे। जैसे ही कबीर ने उस परिधान को छुआ, उसके हाथों में हल्की सी सिहरन दौड़ गई। कमरे में गुलाब और चंदन की भीनी महक फैल गई।
कौतूहल में आकर कबीर ने वह पोशाक पहन ली। कमरबंद बांधते ही परिधान के धागे नीली रोशनी से जगमगाने लगे। हवा में तैरते हुए जादुई कण उसके पूरे शरीर पर बिखर गए। कबीर ने जब सामने लगे शीशे में देखा, तो वह दंग रह गया। उसका चेहरा पूरी तरह बदल चुका था—तीखे नैन-नक्श, चमकदार घने काले बाल जो कमर तक लहरा रहे थे, और आंखों में एक चुंबकीय कशिश। कबीर अब एक बेहद सम्मोहक स्त्री ‘मीरा’ में तब्दील हो चुका था।
ठीक उसी पल मुख्य अभिनेत्री के अचानक बीमार पड़ने की खबर आई। शो रद्द होने की कगार पर था, क्योंकि रानी के किरदार के बिना नाटक असंभव था। कबीर यानी मीरा ने हिम्मत जुटाई और मंच पर कदम रख दिया। जैसे ही वह मंच पर आई, हॉल में सन्नाटा छा गया। जादू सिर्फ रूप में नहीं, बल्कि उसकी आवाज़ और हाव-भाव में भी समा गया था। मीरा के संवादों में ऐसी नफासत और दर्द था कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। हर भाव इतना सहज था मानो वह किरदार उसी के लिए रचा गया हो।
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच नाटक समाप्त हुआ। बैकस्टेज लौटकर जैसे ही कबीर ने कमरबंद की गांठ खोली, जादू धीरे-धीरे हवा में विलीन हो गया और वह वापस अपने असली रूप में आ गया। बक्से के ढक्कन पर अब एक सुनहरी लिखावट उभर आई थी: "यह परिधान केवल रूप नहीं बदलता, यह उस छिपी हुई कला को बाहर लाता है जिसे दुनिया देखने से डरती है।"
कबीर समझ गया कि वह जादुई पोशाक महज़ छलावा नहीं, बल्कि उसकी दबी हुई प्रतिभा को जगाने का ज़रिया थी। उसने उस पोशाक को सहेज कर रख लिया—यह जानते हुए कि मंच और कला किसी एक दायरे में बंधे नहीं होते।

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