Lover · Hindi

विलोम वन

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यह सागर की कहानी है—एक अनाथ और खोजी स्वभाव का युवक, जिसे पता चलता है कि असम के घने जंगलों में कहीं रहस्यमय विलोम वन मौजूद है। वह उस रहस्यमय वन की खोज में असम पहुँच जाता है।
कहानी की शुरुआत इस तरह रखी जा सकती है:
सागर की खोज
सागर बचपन से ही अनाथ था। उसका कोई अपना नहीं था, लेकिन उसमें एक चीज़ बाकी लोगों से अलग थी—अनजानी चीज़ों को खोजने की अद्भुत जिज्ञासा।
एक दिन पुरानी किताबों और रहस्यमय लोककथाओं की खोज करते हुए उसे एक विचित्र कथा मिली। उसमें असम के घने जंगलों के बीच छिपे एक रहस्यमय स्थान का उल्लेख था—विलोम वन।
कहा जाता था कि वह कोई साधारण जंगल नहीं था। जो व्यक्ति उसमें प्रवेश करता, उसका संसार ही उलट जाता था। पुरुष वहाँ से स्त्री बनकर निकलता और स्त्री पुरुष बनकर। सबसे रहस्यमय बात यह थी कि यह परिवर्तन हमेशा के लिए होता था।
सागर को पहले यह केवल एक पुरानी लोककथा लगी। लेकिन किताब में दिए नक्शे और कुछ पुराने संकेत इतने सटीक थे कि उसका विश्वास होने लगा कि विलोम वन वास्तव में मौजूद हो सकता है।
आखिरकार उसने अपना सामान बाँधा और असम के जंगलों की ओर निकल पड़ा।
कई दिनों की यात्रा के बाद सागर उस इलाके में पहुँचा जहाँ नक्शे के अनुसार विलोम वन कहीं छिपा हुआ था। सामने फैला घना जंगल देखकर उसके मन में पहली बार डर पैदा हुआ।
लेकिन डर के बावजूद उसने जंगल की ओर कदम बढ़ा दिए।
उसे अभी यह नहीं पता था कि विलोम वन की सीमा पार करते ही उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली थी।
सागर की यात्रा — पहला संकेत
सागर की यात्रा दिल्ली से शुरू होती है।
दिल्ली के एक पुराने सार्वजनिक पुस्तकालय में सागर अक्सर दुर्लभ और पुरानी पुस्तकों की तलाश किया करता था। उसे इतिहास, लोककथाओं और रहस्यमय स्थानों के बारे में पढ़ने का विशेष शौक था।
एक दिन पुस्तकालय के सबसे पुराने हिस्से में घूमते हुए उसकी नजर धूल से ढकी एक मोटी पुस्तक पर पड़ी। पुस्तक का नाम था—“वन पर्व”।
सागर ने पुस्तक को सावधानी से उठाया। उसके पन्ने पीले पड़ चुके थे और किनारे काफी पुराने थे। उसने पास की मेज पर बैठकर पुस्तक खोली।
पहले कुछ पन्नों में प्राचीन वनों, ऋषियों और रहस्यमय स्थानों का वर्णन था। सागर तेजी से पन्ने पलटता गया।
फिर अचानक एक अध्याय पर उसकी नजर रुक गई।
शीर्षक था—“विलोम वन”।
सागर की उत्सुकता बढ़ गई। उसने पढ़ना शुरू किया।
पुस्तक में लिखा था कि संसार के किसी अज्ञात कोने में एक ऐसा वन है, जहाँ प्रकृति के नियम सामान्य दुनिया से अलग हैं। उस वन को विलोम वन कहा जाता है। उसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं और उससे भी कम लोग वहाँ तक पहुँच पाए हैं।
सागर आगे पढ़ता गया।
एक पुराने विवरण में लिखा था कि विलोम वन पूर्वोत्तर भारत के घने जंगलों, विशेषकर असम के एक दुर्गम क्षेत्र में छिपा हुआ माना जाता है।
सागर ने पुस्तक को और करीब खींच लिया।
लेकिन अगले पन्ने पर पहुँचते ही उसकी आँखें फैल गईं।
वहाँ विलोम वन तक पहुँचने के लिए कुछ रहस्यमय संकेत और एक अधूरा नक्शा बना हुआ था।
सागर के मन में एक ही सवाल उठा—
“क्या विलोम वन सचमुच मौजूद है?”
उसने उसी क्षण तय कर लिया कि वह इस रहस्य की सच्चाई खोजकर रहेगा। दिल्ली से शुरू हुई उसकी यह खोज अब उसे असम के उन अज्ञात जंगलों तक ले जाने वाली थी, जहाँ शायद विलोम वन उसका इंतजार कर रहा था।
अध्याय 2 — असम की तैयारी
विलोम वन के बारे में पढ़ने के बाद सागर के मन में एक ही बात घूम रही थी—उसे असम जाना ही होगा।
लेकिन इतनी बड़ी और अनजान यात्रा वह अकेले नहीं करना चाहता था। उसने तुरंत अपने सबसे अच्छे दोस्त राजेश को फोन किया।
“राजेश, मुझे तुमसे बहुत जरूरी बात करनी है। अभी मेरे पास आओ।”
कुछ देर बाद राजेश पुस्तकालय पहुँच गया। उसने सागर के सामने रखी ‘वन पर्व’ की किताब देखी और पूछा, “क्या मिल गया?”
सागर ने बिना कुछ कहे किताब उसके सामने खोल दी।
“देख... विलोम वन। इस किताब के मुताबिक यह असम के जंगलों में कहीं मौजूद है। मैं इसे खोजने जा रहा हूँ।”
राजेश कुछ क्षण तक पन्नों को देखता रहा। फिर हँसते हुए बोला, “तू फिर किसी रहस्यमय कहानी के पीछे पड़ गया?”
“यह सिर्फ कहानी नहीं है,” सागर ने गंभीरता से कहा। “देख, इसमें जगह के संकेत भी दिए हुए हैं। मुझे लगता है कि विलोम वन सच में मौजूद है।”
राजेश ने सागर की आँखों में उत्साह देखा। वह जानता था कि सागर जब किसी रहस्य को खोजने की ठान लेता है, तो आसानी से पीछे नहीं हटता।
“ठीक है,” राजेश ने आखिरकार कहा, “अगर तू असम जा रहा है, तो मैं भी तेरे साथ चलूँगा।”
सागर के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“तो फिर देर किस बात की? आज ही तैयारी शुरू करते हैं।”
दोनों ने तय किया कि वे अगले कुछ दिनों में यात्रा की पूरी तैयारी करेंगे। नक्शा, टॉर्च, जरूरी कपड़े, भोजन, प्राथमिक चिकित्सा का सामान और जंगल में काम आने वाली दूसरी चीजें वे अपने साथ रखने वाले थे।
सागर ने ‘वन पर्व’ की वह किताब भी अपने बैग में रख ली।
उसे क्या पता था कि उस पुरानी किताब के पन्नों में छिपे संकेत उन्हें एक ऐसे रहस्य तक पहुँचाने वाले थे, जो उनकी कल्पना से कहीं बड़ा था।
अगला पड़ाव था—असम।
अध्याय 3 — असम की राजधानी
कई घंटों की लंबी यात्रा के बाद आखिरकार सागर और राजेश असम की राजधानी गुवाहाटी पहुँच गए।
यात्रा काफी थकाने वाली थी। दोनों अपने सामान के साथ स्टेशन से बाहर निकले। दिल्ली की भागदौड़ के मुकाबले गुवाहाटी का वातावरण उन्हें बिल्कुल अलग लगा। चारों ओर हरियाली, दूर दिखाई देते पहाड़ और हवा में नमी का एहसास था।
राजेश ने अपना बैग नीचे रखा और लंबी साँस लेते हुए कहा,
“आखिर पहुँच ही गए! अब बता, विलोम वन यहाँ से कितनी दूर है?”
सागर ने अपने बैग से ‘वन पर्व’ निकाली और उसमें बने पुराने नक्शे को ध्यान से देखने लगा।
“अभी असली यात्रा शुरू हुई है,” उसने कहा। “किताब के मुताबिक हमें शहर से बाहर जाना होगा। जंगल का रास्ता आसान नहीं होगा।”
राजेश ने चारों ओर देखा।
“तो पहले कहीं रुककर आराम करते हैं। उसके बाद आगे की योजना बनाएँगे।”
सागर ने सिर हिलाया।
दोनों शहर में एक छोटे से ठिकाने की तलाश में निकल पड़े। उनके पास किताब में दिए कुछ संकेत थे, लेकिन विलोम वन का सटीक स्थान अब भी एक रहस्य था।
शाम होते-होते सागर ने किताब का वह पन्ना फिर खोला, जिस पर विलोम वन का अधूरा नक्शा बना था।
नक्शे के एक कोने में एक अजीब-सा चिन्ह बना था।
सागर ने धीरे से कहा,
“राजेश... मुझे लगता है, अगला संकेत यहीं गुवाहाटी में कहीं छिपा है।”
राजेश ने उसकी ओर देखा।
“तो कल से उसकी तलाश शुरू करते हैं।”
दोनों को अभी अंदाजा भी नहीं था कि यह छोटा-सा संकेत उन्हें असम के उन घने जंगलों तक ले जाएगा, जहाँ विलोम वन सदियों से एक रहस्य बनकर छिपा हुआ था।
ध्याय 4 — गुवाहाटी से तलाश शुरू
अगली सुबह सागर और राजेश सूरज निकलने से पहले ही उठ गए। दोनों ने अपना सामान तैयार किया और ‘वन पर्व’ की किताब लेकर गुवाहाटी की गलियों में निकल पड़े।
सागर के पास वह पुराना नक्शा था, जिसमें विलोम वन तक पहुँचने के कुछ रहस्यमय संकेत दिए गए थे।
“हमें सबसे पहले इस निशान का मतलब समझना होगा,” सागर ने नक्शे को देखते हुए कहा।
राजेश ने पूछा, “लेकिन यह निशान हमें मिलेगा कहाँ?”
सागर ने किताब का एक और पन्ना खोला। उसमें लिखा था कि विलोम वन की खोज करने वालों को सबसे पहले एक पुराने मंदिर और उसके पास बहने वाली नदी का पता लगाना होगा।
दोनों ने गुवाहाटी के पुराने इलाकों में लोगों से पूछताछ शुरू की। कई लोगों ने उन्हें अलग-अलग जगहों के बारे में बताया, लेकिन किसी को भी विलोम वन का नाम मालूम नहीं था।
दोपहर तक दोनों काफी जगह घूम चुके थे।
अचानक एक बुजुर्ग व्यक्ति ने सागर को रोक लिया।
“तुम लोग किस जगह की तलाश कर रहे हो?” उसने पूछा।
सागर ने तुरंत अपनी किताब बंद कर दी।
“हम एक पुराने जंगल की तलाश कर रहे हैं। उसका नाम... विलोम वन है।”
बुजुर्ग के चेहरे का रंग बदल गया।
कुछ क्षण तक वह चुप रहा। फिर धीमी आवाज में बोला,
“विलोम वन का नाम तुमने कहाँ सुना?”
सागर और राजेश ने एक-दूसरे की ओर देखा।
सागर ने किताब आगे कर दी।
बुजुर्ग ने जैसे ही ‘वन पर्व’ का नाम देखा, उसकी आँखों में हैरानी दिखाई दी।
“यह किताब अभी भी तुम्हारे पास है?”
“हाँ,” सागर ने कहा, “क्या आप विलोम वन के बारे में जानते हैं?”
बुजुर्ग ने चारों ओर देखा और फिर धीमे स्वर में बोला,
“जानता तो नहीं... लेकिन मेरे दादा इसके बारे में एक कहानी सुनाया करते थे। अगर तुम सच में उसकी तलाश कर रहे हो, तो तुम्हें गुवाहाटी से बाहर एक पुराने रास्ते पर जाना होगा।”
सागर ने तुरंत पूछा, “कौन-सा रास्ता?”
बुजुर्ग ने अपनी उंगली से दूर पहाड़ियों की दिशा दिखाई।
“उस रास्ते पर तुम्हें एक टूटा हुआ पत्थर का द्वार मिलेगा। उसके आगे से तुम्हारी असली तलाश शुरू होगी।”
सागर ने नक्शे को देखा।
नक्शे पर बना चिन्ह उसी दिशा में था।
अब उसे यकीन हो गया था कि वे सही रास्ते पर हैं।
सागर ने राजेश से कहा,
“चलो। विलोम वन का पहला सुराग हमें मिल गया है।”
दोनों अपने बैग उठाकर उस रहस्यमय रास्ते की ओर चल पड़े।
अध्याय 5 — होटल में अगली योजना
गुवाहाटी में पूरे दिन तलाश करने के बाद सागर और राजेश शाम को वापस अपने होटल लौट आए। दोनों काफी थक चुके थे, लेकिन आज उन्हें जो सुराग मिला था, उसने उनकी उत्सुकता और बढ़ा दी थी।
कमरे में पहुँचकर राजेश ने अपना बैग नीचे रखा और बिस्तर पर बैठ गया।
“आज का दिन तो उम्मीद से ज्यादा दिलचस्प रहा,” उसने कहा। “लेकिन अब हमें बिना तैयारी के जंगल की तरफ नहीं जाना चाहिए।”
सागर ने सिर हिलाया और मेज पर ‘वन पर्व’ की किताब तथा पुराना नक्शा खोल दिया।
“बिल्कुल। कल हमें उस पुराने रास्ते की तलाश करनी है। उससे पहले हमें पूरी तैयारी करनी होगी।”
दोनों ने कागज पर अपनी योजना बनानी शुरू की।
सबसे पहले उन्होंने नक्शे में टूटे हुए पत्थर के द्वार की संभावित जगह चिन्हित की। फिर उन्होंने तय किया कि सुबह जल्दी निकलेंगे, रास्ते में जरूरी सामान खरीदेंगे और शहर से बाहर जाने के लिए उचित साधन की व्यवस्था करेंगे।
राजेश ने अपनी सूची देखते हुए कहा,
“टॉर्च, अतिरिक्त बैटरियाँ, पानी, सूखा खाना, प्राथमिक चिकित्सा का सामान और मजबूत जूते—सब जरूरी हैं।”
सागर ने किताब के पुराने पन्ने को ध्यान से देखा।
“और यह किताब हर हाल में मेरे पास रहेगी। इसमें अभी बहुत से संकेत हैं जिन्हें हमें समझना है।”
कुछ देर बाद दोनों ने अगले दिन की पूरी योजना तैयार कर ली।
लेकिन सोने से पहले सागर ने नक्शे को एक बार फिर देखा।
नक्शे पर बने जंगल के निशान के पास एक छोटा-सा वाक्य लिखा था—
“द्वार के पार रास्ता दिखाई नहीं देता, उसे खोजने वाला ही उसे देख पाता है।”
सागर कुछ क्षण तक उस वाक्य को देखता रहा।
उसे महसूस हो रहा था कि अगले दिन उनकी यात्रा पहले से कहीं अधिक रहस्यमय होने वाली थी।
अध्याय 6 — जंगल में जाने का परमिट
अगली सुबह सागर और राजेश जल्दी उठ गए। नाश्ता करने के बाद दोनों अपने जरूरी कागजात और ‘वन पर्व’ की किताब लेकर निकल पड़े।
उनका पहला काम था जंगल की ओर जाने के लिए आवश्यक परमिट हासिल करना। किताब में बताए रास्ते का कुछ हिस्सा संरक्षित वन क्षेत्र से होकर गुजरता था, इसलिए बिना अनुमति वहाँ जाना संभव नहीं था।
सागर ने राजेश से कहा,
“पहले परमिट ले लेते हैं। उसके बाद ही आगे की यात्रा शुरू करेंगे।”
दोनों संबंधित वन विभाग के कार्यालय पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपनी यात्रा का उद्देश्य बताया और जंगल में जाने की अनुमति के लिए आवेदन किया।
अधिकारी ने उनके कागजात देखे और पूछा,
“आप दोनों उस इलाके में क्यों जाना चाहते हैं?”
सागर ने शांत स्वर में जवाब दिया,
“हम पुराने जंगल और वहाँ मौजूद कुछ ऐतिहासिक स्थानों की जानकारी जुटाना चाहते हैं।”
अधिकारी ने उन्हें कुछ देर गौर से देखा और फिर बोला,
“वह इलाका काफी दुर्गम है। मौसम भी कभी-कभी अचानक बदल जाता है। नियमों का पालन करना जरूरी होगा।”
सागर ने तुरंत कहा,
“जी, हम सभी नियमों का पालन करेंगे।”
कुछ आवश्यक औपचारिकताओं के बाद उन्हें अगले दिन के लिए वन क्षेत्र में प्रवेश का परमिट मिल गया।
कार्यालय से बाहर निकलते ही राजेश ने राहत की साँस ली।
“एक काम तो पूरा हुआ। अब असली सफर शुरू होगा।”
सागर ने परमिट संभालकर अपने बैग में रखा और ‘वन पर्व’ के नक्शे को देखा।
“हाँ। अब हमारे पास रास्ता भी है और अनुमति भी।”
लेकिन दोनों को अभी यह पता नहीं था कि परमिट मिलने के बाद शुरू होने वाली उनकी यात्रा उन्हें धीरे-धीरे उस रहस्यमय जंगल की सीमा तक पहुँचा देगी, जहाँ विलोम वन का रहस्य उनका इंतजार कर रहा था।
अध्याय 7 — एक स्थानीय गाइड
परमिट मिलने के बाद सागर और राजेश ने तय किया कि इतने घने और अनजान जंगल में वे अकेले नहीं जाएँगे। उन्हें एक ऐसे स्थानीय गाइड की जरूरत थी, जिसे वहाँ के रास्तों और जंगल की परिस्थितियों की अच्छी जानकारी हो।
राजेश ने कहा, “हमें किसी अनुभवी आदमी को साथ लेना चाहिए। नक्शा हमारे पास है, लेकिन जंगल का असली रास्ता वही बता सकता है जो वहाँ जा चुका हो।”
सागर ने सहमति में सिर हिलाया।
दोनों ने स्थानीय लोगों से पूछताछ शुरू की। काफी खोजबीन के बाद उन्हें एक अनुभवी गाइड के बारे में पता चला, जिसका नाम बीरन था। वह कई वर्षों से असम के जंगलों में यात्रियों और शोधकर्ताओं को रास्ता दिखाता आया था।
सागर और राजेश उससे मिलने पहुँचे।
बीरन ने उनका परमिट देखा और फिर पूछा, “आप लोग जंगल के किस हिस्से में जाना चाहते हैं?”
सागर ने ‘वन पर्व’ का नक्शा उसके सामने रख दिया।
नक्शा देखते ही बीरन कुछ पल के लिए चुप हो गया।
“यह रास्ता...” उसने धीमी आवाज में कहा, “तुम लोगों को यह नक्शा कहाँ से मिला?”
सागर ने जवाब दिया, “एक बहुत पुरानी किताब में।”
बीरन ने नक्शे को ध्यान से देखा और फिर बोला, “मैं इस इलाके के कई रास्तों को जानता हूँ। लेकिन जिस दिशा में यह नक्शा ले जा रहा है, वहाँ बहुत कम लोग जाते हैं।”
राजेश ने पूछा, “क्या आप हमारे साथ चलेंगे?”
बीरन ने कुछ देर सोचा।
“परमिट तुम्हारे पास है, और अगर तुम दोनों सचमुच वहाँ जाना चाहते हो, तो मैं तुम्हें जंगल की सीमा तक ले जा सकता हूँ।”
सागर ने राहत की साँस ली।
“हमें यही चाहिए।”
इस तरह सागर और राजेश की यात्रा में बीरन एक स्थानीय गाइड के रूप में शामिल हो गया।
अब उनके पास परमिट था, जरूरी सामान था, पुराना नक्शा था और जंगल को जानने वाला एक अनुभवी गाइड भी।
अगली सुबह वे तीनों विलोम वन की दिशा में अपनी असली यात्रा शुरू करने वाले थे।
अध्याय 8 — जंगल का मुहाना
अगली सुबह सूरज निकलने से पहले ही सागर, राजेश और उनका गाइड बीरन अपनी यात्रा पर निकल पड़े।
शहर पीछे छूटता गया और रास्ता धीरे-धीरे सुनसान होता चला गया। कुछ दूर तक वाहन से जाने के बाद उन्हें आगे का रास्ता पैदल तय करना पड़ा। चारों ओर घनी हरियाली थी और दूर पहाड़ों के बीच बादल तैरते दिखाई दे रहे थे।
बीरन आगे-आगे चल रहा था। उसके हाथ में जंगल का पुराना नक्शा और एक मजबूत डंडा था।
कई घंटों की यात्रा के बाद अचानक वह रुक गया।
“यहीं से जंगल शुरू होता है,” उसने कहा।
सागर ने सामने देखा।
उनके सामने पेड़ों की एक विशाल दीवार जैसी कतार खड़ी थी। इतने घने पेड़ थे कि भीतर सूर्य की रोशनी भी मुश्किल से पहुँच रही थी। हवा में मिट्टी और गीली पत्तियों की गंध थी।
राजेश ने धीमे स्वर में कहा,
“तो यही है वह जंगल...”
सागर ने अपने बैग से ‘वन पर्व’ निकाली और नक्शे को सामने के रास्ते से मिलाने लगा।
कुछ क्षण बाद उसकी नजर एक पुराने पत्थर पर पड़ी। उस पर वही अजीब चिन्ह बना था, जो किताब के नक्शे पर था।
सागर की आँखों में उत्साह चमक उठा।
“राजेश... हमें सही रास्ता मिल गया।”
बीरन ने पत्थर को ध्यान से देखा। उसके चेहरे पर अचानक गंभीरता आ गई।
“यह निशान मैंने पहले भी देखा है,” उसने कहा, “लेकिन इसके आगे का रास्ता बहुत कम लोग जानते हैं।”
तीनों कुछ देर जंगल के मुहाने पर खड़े रहे।
सागर ने गहरी साँस ली और अपना बैग ठीक किया।
“तो फिर चलें।”
बीरन ने आखिरी बार पीछे की ओर देखा और फिर जंगल के भीतर पहला कदम बढ़ाया।
सागर और राजेश उसके पीछे चल पड़े।
उन्हें नहीं पता था कि जंगल के भीतर कुछ दूरी पर विलोम वन की सीमा उनका इंतजार कर रही थी।
अध्याय 9 — जंगल के रहवासी
सागर, राजेश और बीरन कई घंटों से जंगल के भीतर आगे बढ़ रहे थे। चारों ओर घने पेड़, ऊँची घास और अजीब-अजीब पक्षियों की आवाजें सुनाई दे रही थीं।
कुछ दूर जाने के बाद बीरन अचानक रुक गया।
“आगे कोई बस्ती है,” उसने धीमे स्वर में कहा।
सागर ने ध्यान से देखा। पेड़ों के बीच से हल्का-सा धुआँ ऊपर उठ रहा था।
तीनों उसी दिशा में बढ़े। थोड़ी देर बाद उन्हें जंगल के बीच एक छोटी-सी स्थानीय आदिवासी बस्ती दिखाई दी। कुछ लोग अपने दैनिक काम में व्यस्त थे और बच्चे पास में खेल रहे थे।
बस्ती के लोगों ने जैसे ही तीन अजनबियों को देखा, वे सतर्क हो गए।
बीरन ने स्थानीय भाषा में उनसे बात की और बताया कि सागर और राजेश जंगल के पुराने रास्तों और ऐतिहासिक स्थानों की जानकारी जुटाने आए हैं।
कुछ देर बाद बस्ती के एक बुजुर्ग उनके पास आए।
उन्होंने सागर को ध्यान से देखा और पूछा,
“तुम लोग जंगल के अंदर कहाँ जाना चाहते हो?”
सागर ने अपनी किताब ‘वन पर्व’ और पुराना नक्शा उनके सामने रख दिया।
बुजुर्ग की नजर नक्शे पर बने चिन्ह पर पड़ी तो उनका चेहरा गंभीर हो गया।
“यह निशान...” उन्होंने धीरे से कहा, “इसे बहुत कम लोग जानते हैं।”
राजेश ने उत्सुकता से पूछा,
“क्या आप इस जगह के बारे में जानते हैं?”
बुजुर्ग ने कुछ क्षण चुप रहने के बाद जंगल की गहराई की ओर इशारा किया।
“उस दिशा में एक पुराना रास्ता है। हमारे बुजुर्ग कहते थे कि बहुत पहले कुछ लोग उस रास्ते से आगे गए थे... लेकिन वापस नहीं लौटे।”
सागर ने तुरंत पूछा,
“क्या वह रास्ता विलोम वन तक जाता है?”
बुजुर्ग ने सीधे जवाब नहीं दिया। उन्होंने केवल इतना कहा,
“अगर तुम उसी जगह की तलाश कर रहे हो, तो आगे बहुत सावधानी से जाना। जंगल के उस हिस्से को हमारे लोग वर्जित क्षेत्र मानते हैं।”
सागर ने राजेश की ओर देखा।
उसे अब यकीन हो चुका था कि ‘वन पर्व’ में लिखी बातें केवल कल्पना नहीं थीं।
विलोम वन का रहस्य अब पहले से कहीं अधिक वास्तविक लग रहा था।
अध्याय 10 — मुखिया का प्रस्ताव
सागर और राजेश कुछ समय के लिए उस आदिवासी बस्ती में रुके। बस्ती के लोगों ने उनका स्वागत किया और जंगल की यात्रा के बारे में उनसे बातचीत की।
कुछ देर बाद बस्ती के मुखिया ने सागर को अपने पास बुलाया। मुखिया की बेटी भी वहीं बैठी थी।
मुखिया ने सागर से कहा,
“तुम दूर शहर से यहाँ तक आए हो। तुममें साहस है और तुम हमारे जंगल के रहस्य को समझना चाहते हो। हमारे रीति-रिवाजों के अनुसार, हम तुम्हें अपने परिवार का हिस्सा बनाना चाहते हैं।”
सागर यह सुनकर चौंक गया।
मुखिया ने स्पष्ट किया कि वह अपनी बेटी का विवाह सागर से करना चाहते हैं।
राजेश ने हैरानी से सागर की ओर देखा। सागर कुछ क्षण तक शांत रहा। वह इस प्रस्ताव की बिल्कुल उम्मीद नहीं कर रहा था।
सागर ने सम्मानपूर्वक कहा,
“मुखियाजी, आपने मुझे इतना बड़ा सम्मान दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। लेकिन विवाह जीवन का बहुत बड़ा निर्णय है। मैं बिना आपकी बेटी की इच्छा जाने कोई उत्तर नहीं दे सकता।”
मुखिया ने अपनी बेटी की ओर देखा और कहा,
“हमारे यहाँ भी उसकी इच्छा सबसे महत्वपूर्ण है। अंतिम निर्णय उसी का होगा।”
सागर ने राहत की साँस ली। दूसरी ओर, उसके मन में विलोम वन की खोज भी लगातार चल रही थी।
उसे महसूस हुआ कि इस जंगल में आने के बाद उसकी यात्रा केवल एक रहस्य की खोज नहीं रह गई थी—अब उसके सामने ऐसे फैसले भी आने वाले थे, जो उसकी पूरी जिंदगी बदल सकते थे।
अध्याय 11 — शांति का निर्णय
मुखिया ने अपनी बेटी की ओर देखा। कुछ क्षण तक बस्ती में शांति छाई रही।
मुखिया ने पूछा, “शांति, यह तुम्हारी जिंदगी का फैसला है। क्या तुम सागर से विवाह के लिए सहमत हो?”
शांति ने सागर की ओर देखा। सागर भी शांत खड़ा था और उसके निर्णय का इंतजार कर रहा था।
कुछ पल बाद शांति ने धीमे लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा,
“हाँ, मैं इस विवाह के लिए तैयार हूँ।”
यह सुनकर मुखिया के चेहरे पर खुशी आ गई। बस्ती के लोगों ने भी प्रसन्नता व्यक्त की।
राजेश ने सागर के पास आकर धीरे से कहा, “लगता है हमारी यात्रा ने एक नया मोड़ ले लिया है।”
सागर कुछ कह नहीं पाया। वह अभी भी इस अचानक आए प्रस्ताव और शांति के निर्णय के बारे में सोच रहा था।
शांति ने सागर से कहा,
“मैंने तुम्हें इसलिए चुना है क्योंकि तुम इस जंगल के रहस्य को जानने के लिए यहाँ तक आए हो। लेकिन मैं चाहती हूँ कि तुम मेरी और हमारे लोगों की परंपराओं का सम्मान करो।”
सागर ने सिर झुकाकर कहा,
“मैं तुम्हारे निर्णय और तुम्हारे परिवार का सम्मान करूँगा।”
मुखिया ने घोषणा की कि विवाह की तैयारी अगले दिन से शुरू होगी।
लेकिन सागर के मन में एक सवाल अब भी था—
क्या वह विवाह के बाद विलोम वन की अपनी खोज जारी रख पाएगा?
और उससे भी बड़ा सवाल था—
क्या शांति को विलोम वन के बारे में कोई ऐसा रहस्य पता था, जिसे वह अभी सागर से छिपा रही थी?
अध्याय 19 — पायल की आवाज़
सागर और शांति ने एक साथ विलोम वन की सीमा पार की।
जैसे ही सागर ने पहला कदम भीतर रखा, अचानक चारों ओर का वातावरण बदल गया। हवा बिल्कुल शांत हो गई। पेड़ों के बीच फैला कोहरा और घना दिखाई देने लगा।
तभी—
छन... छन... छन...
कहीं पास से पायल की धीमी आवाज़ सुनाई दी।
सागर तुरंत रुक गया।
“शांति... तुमने भी सुना?”
शांति ने सिर हिलाया।
“हाँ। पायल की आवाज़।”
दोनों ने चारों ओर देखा, लेकिन वहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
फिर वही आवाज़ थोड़ी दूर से सुनाई दी—
छन... छन... छन...
इस बार आवाज़ जंगल के और भीतर से आ रही थी।
सागर ने धीरे से कहा,
“यहाँ तो हमारे अलावा कोई नहीं है।”
शांति ने उसका हाथ थाम लिया।
“विलोम वन के बारे में कहा जाता है कि यहाँ कई ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं जिनका कोई दिखाई देने वाला स्रोत नहीं होता।”
सागर ने अपनी टॉर्च जलाई और आवाज़ की दिशा में रोशनी डाली।
कुछ भी नहीं था।
सिर्फ घने पेड़, कोहरा और जमीन पर गिरे सूखे पत्ते।
फिर अचानक उनके पीछे से पायल की आवाज़ आई—
छन... छन... छन...
दोनों ने एक साथ पीछे मुड़कर देखा।
वहाँ भी कोई नहीं था।
सागर ने धीमे स्वर में कहा,
“शांति... लगता है विलोम वन ने हमारे आने को महसूस कर लिया है।”
शांति ने उसका हाथ और मजबूती से पकड़ लिया।
“तो हमें सावधान रहना होगा।”
दोनों आवाज़ की दिशा में आगे बढ़ने लगे।
लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि जंगल की गहराई में बजती वह पायल किसकी थी और उन्हें अपने पास क्यों बुला रही थी।
अध्याय 20 — विलोम वन का राजा
पायल की आवाज़ धीरे-धीरे शांत हो गई। तभी घने कोहरे के बीच एक गंभीर आवाज़ गूँजी—
“सागर और शांति... तुम्हारा स्वागत है।”
दोनों अचानक रुक गए।
सागर ने चारों ओर देखा।
“कौन है?”
कोहरे के बीच से एक लंबा व्यक्ति धीरे-धीरे उनकी ओर आता दिखाई दिया। उसने राजसी वस्त्र पहन रखे थे और उसके हाथ में एक पुराना राजदंड था। उसके चेहरे पर गंभीरता के साथ एक रहस्यमय मुस्कान थी।
वह उनके सामने आकर रुक गया।
“मैं रूपसुंदर हूँ,” उसने कहा, “विलोम वन के इस राज्य का राजा।”
शांति ने आश्चर्य से पूछा,
“आपको हमारे नाम कैसे पता?”
रूपसुंदर मुस्कुराया।
“विलोम वन में कदम रखने वाले किसी भी व्यक्ति की आहट इस राज्य तक पहुँचती है। तुम्हारे आने की खबर हमें पहले ही मिल चुकी थी।”
सागर ने सावधानी से पूछा,
“आप हमें यहाँ क्यों बुला रहे हैं?”
रूपसुंदर ने अपने राजदंड को जमीन पर टिकाया।
“क्योंकि तुम दोनों यहाँ केवल घूमने नहीं आए हो। तुम विलोम वन का रहस्य जानने आए हो।”
सागर ने ‘वन पर्व’ की किताब की ओर देखा।
“तो इस किताब में लिखी बातें सच हैं?”
रूपसुंदर ने उत्तर दिया,
“उस किताब में जितना लिखा है, विलोम वन उससे कहीं अधिक रहस्यमय है।”
शांति ने सागर का हाथ थामे रखा।
रूपसुंदर ने दोनों को ध्यान से देखा और कहा,
“तुम दोनों ने इस वन में साथ प्रवेश किया है। अब तुम्हारे सामने इस राज्य के नियम खुलने वाले हैं।”
सागर ने दृढ़ आवाज़ में कहा,
“हम सच्चाई जानने के लिए तैयार हैं।”
रूपसुंदर मुस्कुराया।
“तो फिर मेरे साथ आओ। विलोम वन के असली रहस्य का द्वार अब तुम्हारे सामने खुलने वाला है।”
अध्याय 21 — श्रृंगार राज्य
रूपसुंदर ने अपना राजदंड उठाया और सागर तथा शांति को अपने पीछे आने का संकेत किया।
तीनों घने जंगल से होकर एक विशाल पत्थर के रास्ते पर पहुँचे। जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, जंगल का रूप बदलने लगा। पेड़ों के बीच रंग-बिरंगे फूल खिलने लगे और दूर से संगीत की मधुर ध्वनि सुनाई देने लगी।
कुछ देर बाद उनके सामने एक भव्य नगर दिखाई दिया।
रूपसुंदर ने कहा,
“सागर और शांति, तुम्हारा स्वागत है श्रृंगार राज्य में।”
नगर के प्रवेश द्वार को फूलों और दीपों से सजाया गया था। दोनों ओर राज्य के लोग खड़े थे और उनके स्वागत के लिए पारंपरिक वाद्य बज रहे थे।
शांति ने आश्चर्य से चारों ओर देखा।
“यह जंगल के बीच इतना बड़ा राज्य... हमने तो इसकी कल्पना भी नहीं की थी।”
रूपसुंदर मुस्कुराया।
“विलोम वन के भीतर कई राज्य हैं। हर राज्य का अपना नियम, अपनी संस्कृति और अपना रहस्य है।”
सागर ने पूछा,
“और यह श्रृंगार राज्य?”
रूपसुंदर ने उत्तर दिया,
“यह विलोम वन का पहला राज्य है जहाँ बाहरी यात्रियों का स्वागत किया जाता है। यहाँ आने वाले लोगों को पहले इस राज्य के नियम समझने होते हैं, तभी वे आगे जा सकते हैं।”
तभी महल की ओर से फूलों की वर्षा होने लगी।
राज्य के लोगों ने एक स्वर में कहा—
“श्रृंगार राज्य में आपका स्वागत है!”
सागर और शांति ने एक-दूसरे की ओर देखा।
उन्हें एहसास हो गया कि विलोम वन की यात्रा अब केवल जंगल की खोज नहीं रही थी।
वे एक ऐसी रहस्यमय दुनिया में प्रवेश कर चुके थे, जिसके बारे में बाहर की दुनिया को लगभग कुछ भी पता नहीं था।
अध्याय 22 — राजकुमारी सुंदरा
श्रृंगार राज्य के महल में सागर और शांति का स्वागत चल ही रहा था कि अचानक राजमहल के मुख्य द्वार खुल गए।
संगीत की धुन के बीच एक युवती धीरे-धीरे बाहर आई। उसने राजसी वस्त्र पहने हुए थे और उसके व्यक्तित्व में आत्मविश्वास तथा शालीनता झलक रही थी।
रूपसुंदर ने उसकी ओर देखकर कहा,
“सागर, शांति, इनसे मिलो। यह मेरी पुत्री और श्रृंगार राज्य की राजकुमारी सुंदरा हैं।”
सुंदरा ने दोनों का स्वागत करते हुए कहा,
“श्रृंगार राज्य में आपका स्वागत है। विलोम वन में बाहर की दुनिया से किसी का आना बहुत दुर्लभ है।”
सागर ने विनम्रता से कहा,
“आपसे मिलकर खुशी हुई, राजकुमारी।”
शांति ने भी उसका अभिवादन किया।
सुंदरा की नजर कुछ क्षण के लिए ‘वन पर्व’ की किताब पर पड़ी।
“क्या यही वह पुस्तक है जिसके संकेतों का पीछा करते हुए तुम दोनों यहाँ तक पहुँचे हो?”
सागर चौंक गया।
“आपको इसके बारे में पता है?”
सुंदरा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“विलोम वन में कुछ रहस्य ऐसे हैं जिनके बारे में बाहर की दुनिया से आने वाले लोगों को कोई जानकारी नहीं होती।”
फिर उसने गंभीर स्वर में कहा,
“अगर तुम दोनों सच में विलोम वन के रहस्य को जानना चाहते हो, तो तुम्हें आगे जाने से पहले श्रृंगार राज्य का एक महत्वपूर्ण नियम समझना होगा।”
सागर और शांति ने ध्यान से उसकी ओर देखा।
सुंदरा उन्हें महल के भीतर ले जाने लगी।
उनकी यात्रा का अगला अध्याय अब राजमहल के अंदर शुरू होने वाला था।
अध्याय 23 — राजसी भोज
श्रृंगार राज्य में स्वागत के बाद राजकुमारी सुंदरा ने सागर और शांति को राजमहल के विशाल भोजन कक्ष में आमंत्रित किया।
महल का भोजन कक्ष दीपों और फूलों से सजा हुआ था। बीच में लंबी मेज लगी थी, जिस पर राज्य के पारंपरिक व्यंजन परोसे गए थे।
रूपसुंदर ने कहा,
“हमारे राज्य में आने वाले अतिथियों का स्वागत राजसी भोज से करना हमारी पुरानी परंपरा है।”
सागर और शांति अपने स्थान पर बैठ गए। राजकुमारी सुंदरा भी उनके साथ बैठी।
सागर ने चारों ओर देखकर कहा,
“मैंने कभी नहीं सोचा था कि विलोम वन के भीतर इतना भव्य राज्य भी हो सकता है।”
सुंदरा मुस्कुराई।
“यह तो केवल श्रृंगार राज्य की एक झलक है। विलोम वन के भीतर इससे भी कई रहस्यमय स्थान हैं।”
भोज के दौरान रूपसुंदर ने सागर से उसकी यात्रा के बारे में पूछा। सागर ने दिल्ली से शुरू हुई अपनी खोज, ‘वन पर्व’ की किताब, असम की यात्रा और जंगल तक पहुँचने की पूरी कहानी सुनाई।
राजा ध्यान से सुनता रहा।
भोज समाप्त होने के बाद उसने कहा,
“सागर, तुम्हारी यात्रा साधारण नहीं है। तुमने जिस रहस्य की तलाश शुरू की थी, अब तुम उसके केंद्र में पहुँच चुके हो।”
सागर ने पूछा,
“क्या आप मुझे विलोम वन का पूरा रहस्य बताएँगे?”
रूपसुंदर मुस्कुराया।
“समय आने पर। अभी तुम्हें इस राज्य को समझना होगा।”
सागर ने शांति की ओर देखा। दोनों समझ गए कि उनकी यात्रा अभी लंबी थी।
राजसी भोज समाप्त हो चुका था, लेकिन विलोम वन के रहस्य अब धीरे-धीरे उनके सामने खुलने लगे थे।
अध्याय 26 — राजकुमारी रूपा
रूपवती राज्य के राजमहल के सामने सागर और शांति के स्वागत के लिए राजकुमारी रूपा खड़ी थी।
रूपा का व्यक्तित्व पहली नजर में ही प्रभावशाली था। उसका चेहरा शांत और आत्मविश्वास से भरा हुआ था। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, जैसे वह इस रहस्यमय राज्य के कई राज अपने भीतर छिपाए हुए हो।
उसके लंबे, सजे हुए बाल उसके राजसी व्यक्तित्व को और निखार रहे थे। उसने सुंदर पारंपरिक राजसी पोशाक पहन रखी थी, जिस पर बारीक कढ़ाई की गई थी।
लेकिन उसकी सबसे खास बात उसका बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि उसका व्यवहार और आत्मविश्वास था। वह अपने राज्य की जिम्मेदारियों को समझने वाली एक बुद्धिमान और दृढ़ राजकुमारी लग रही थी।
रूपा ने मुस्कुराकर कहा,
“सागर और शांति, रूपवती राज्य में तुम्हारा स्वागत है।”
सागर ने विनम्रता से अभिवादन किया।
शांति ने रूपा को ध्यान से देखा और कहा,
“आपके राज्य की तरह आप भी बहुत प्रभावशाली हैं।”
रूपा हल्के से मुस्कुराई।
“हर राज्य की अपनी पहचान होती है। लेकिन याद रखो—विलोम वन में जो दिखाई देता है, जरूरी नहीं कि वही उसका असली रहस्य हो।”
सागर को यह बात सुनकर फिर अपनी यात्रा का उद्देश्य याद आ गया।
उसे लगने लगा कि राजकुमारी रूपा केवल इस राज्य की शासक नहीं, बल्कि विलोम वन के किसी बड़े रहस्य की जानकार भी है।
अध्याय 29 — छोटे बदलाव
रूपवती राज्य के दर्पणों से दूर निकलने के बाद सागर और शांति कुछ देर महल के एक शांत कक्ष में बैठे।
सागर ने अपने हाथों को देखा। उसकी त्वचा पहले से भी अधिक मुलायम लग रही थी। उसके चेहरे की बनावट में भी बहुत हल्का बदलाव दिखाई दे रहा था।
शांति ने भी महसूस किया कि उसके शरीर में छोटे-छोटे परिवर्तन शुरू हो गए थे। उसके चेहरे की रेखाएँ थोड़ी बदल गई थीं और उसकी आवाज में हल्का परिवर्तन आया था।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
सागर ने कहा,
“लगता है विलोम वन का असर धीरे-धीरे बढ़ रहा है।”
शांति ने शांत स्वर में जवाब दिया,
“हाँ। लेकिन अभी ये बहुत छोटे बदलाव हैं।”
राजकुमारी रूपा उनके पास आई और बोली,
“यह केवल शुरुआत है। विलोम वन में परिवर्तन हमेशा अचानक नहीं होते। कभी-कभी वे धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, ताकि व्यक्ति अपने बदलते रूप को समझ सके।”
सागर ने पूछा,
“क्या ये बदलाव वापस हो सकते हैं?”
रूपा ने गंभीरता से कहा,
“इसका उत्तर तुम्हें आगे के राज्यों में मिलेगा। विलोम वन हर यात्री की परीक्षा अलग तरह से लेता है।”
सागर और शांति ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया।
वे जानते थे कि उनके शरीर में बदलाव शुरू हो चुके थे, लेकिन उनका निर्णय अब भी वही था—
जो भी परिवर्तन आए, वे उसका सामना साथ मिलकर करेंगे।
अध्याय 30 — नया राज्य
अगली सुबह सागर और शांति ने रूपवती राज्य से आगे जाने की तैयारी की। राजकुमारी रूपा उन्हें राज्य की सीमा तक छोड़ने आई।
रूपा ने कहा,
“अब तुम्हारी यात्रा का अगला चरण शुरू होगा। आगे का राज्य पहले दोनों राज्यों से बिल्कुल अलग है।”
सागर ने पूछा, “उस राज्य का नाम क्या है?”
रूपा ने दूर फैले जंगल की ओर देखते हुए कहा,
“उसका नाम है कल्याणी राज्य।”
शांति ने पूछा,
“वहाँ हमें किस तरह की परीक्षा का सामना करना पड़ेगा?”
रूपा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“यह मैं नहीं बता सकती। विलोम वन हर यात्री को उसकी अपनी परीक्षा देता है।”
सागर और शांति आगे बढ़ने लगे।
काफी देर तक घने जंगल में चलने के बाद पेड़ों के बीच सुनहरी रोशनी दिखाई देने लगी। जैसे ही वे आगे पहुँचे, उनके सामने एक विशाल पत्थर का द्वार दिखाई दिया।
द्वार पर लिखा था—
“कल्याणी राज्य में आपका स्वागत है।”
द्वार अपने आप खुल गया।
सागर और शांति ने एक-दूसरे की ओर देखा और भीतर प्रवेश कर गए।
उन्हें नहीं पता था कि कल्याणी राज्य उनके लिए विलोम वन की अब तक की सबसे कठिन परीक्षा लेकर आया है।
अध्याय 31 — राजकुमारी सुरा
कल्याणी राज्य में प्रवेश करते ही सागर और शांति ने देखा कि यह राज्य बाकी दोनों राज्यों से बिल्कुल अलग था। यहाँ वातावरण शांत था और चारों ओर सफेद फूलों से सजे रास्ते दिखाई दे रहे थे।
तभी महल के मुख्य द्वार से एक राजसी युवती बाहर आई।
उसने सागर और शांति के सामने आकर कहा,
“कल्याणी राज्य में आपका स्वागत है। मैं राजकुमारी सुरा हूँ।”
सागर और शांति ने उसका अभिवादन किया।
सुरा ने दोनों को ध्यान से देखा। फिर उसकी नजर सागर के चेहरे और हाथों पर गई।
“तुम दोनों पर विलोम वन का प्रभाव शुरू हो चुका है,” उसने कहा।
सागर ने पूछा,
“आपको कैसे पता?”
सुरा ने उत्तर दिया,
“कल्याणी राज्य में आने वाले हर यात्री के भीतर होने वाले बदलाव हमें दिखाई देते हैं।”
शांति ने पूछा,
“क्या आगे भी हमारे शरीर में बदलाव होते रहेंगे?”
सुरा ने गंभीर स्वर में कहा,
“हाँ। लेकिन याद रखो—विलोम वन केवल शरीर को नहीं बदलता। यह व्यक्ति के धैर्य, पहचान और निर्णयों की भी परीक्षा लेता है।”
सागर ने दृढ़ता से कहा,
“हम अपनी यात्रा पूरी करेंगे।”
सुरा मुस्कुराई।
“तब तुम्हें मेरे राज्य की परीक्षा से गुजरना होगा। अगर तुम उसमें सफल हुए, तभी आगे जाने का मार्ग खुलेगा।”
सुरा ने महल के विशाल द्वार की ओर संकेत किया।
“आओ। तुम्हारी अगली परीक्षा वहीं से शुरू होगी।”
सागर और शांति ने एक-दूसरे की ओर देखा और राजकुमारी सुरा के पीछे महल की ओर बढ़ गए।
अध्याय 33 — झरने के पार
राजकुमारी सुरा ने सागर को झरने के पास जाने का संकेत किया।
“सागर, इस झरने को पार करके दूसरी ओर जाओ। यह तुम्हारी परीक्षा का पहला चरण है।”
सागर धीरे-धीरे शरबत के झरने की धारा के नीचे से होकर आगे बढ़ा। मीठी बूँदें उसके शरीर पर पड़ती रहीं और कुछ ही क्षणों में वह दूसरी ओर पहुँच गया।
जैसे ही उसने कदम बाहर रखा, उसके आसपास अचानक गुलाब जैसी हल्की और मधुर खुशबू फैल गई।
शांति ने आश्चर्य से कहा,
“सागर, तुम्हारे शरीर से गुलाब की खुशबू आ रही है!”
सागर ने अपने हाथ को सूँघकर देखा। सचमुच उसके शरीर से हल्की गुलाब की सुगंध आ रही थी।
राजकुमारी सुरा मुस्कुराई।
“कल्याणी के शरबत-झरने का यही रहस्य है। यह केवल शरीर को नहीं छूता, बल्कि अपने प्रभाव की एक पहचान भी छोड़ता है।”
सागर ने पूछा,
“क्या यह भी विलोम वन के बदलाव का हिस्सा है?”
सुरा ने कहा,
“शायद। इस वन में हर परिवर्तन का अपना संकेत होता है। तुम्हें आगे बढ़ते हुए इन संकेतों को समझना होगा।”
शांति सागर के पास आई।
“खुशबू तो अच्छी है, लेकिन अब मुझे लग रहा है कि विलोम वन का असर लगातार बढ़ रहा है।”
सागर ने शांत स्वर में कहा,
“जो भी हो, हम अपनी यात्रा जारी रखेंगे।”
दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा और आगे बढ़ने के लिए तैयार हो गए।
अध्याय 34 — सुगंधित भोजन
झरने की परीक्षा पूरी करने के बाद राजकुमारी सुरा सागर और शांति को कल्याणी राज्य के राजमहल में वापस ले आई।
महल के भोजन कक्ष में पहुँचते ही दोनों को चारों ओर अद्भुत सुगंध महसूस हुई। मेज पर तरह-तरह के पारंपरिक व्यंजन सजे हुए थे। हर व्यंजन से अलग खुशबू आ रही थी और पूरा कक्ष सुगंध से भर गया था।
सुरा ने कहा,
“यह कल्याणी राज्य का विशेष सुगंधित भोजन है। हमारे यहाँ अतिथियों का स्वागत इसी भोजन से किया जाता है।”
सागर और शांति भोजन के लिए बैठ गए।
सागर ने जैसे ही पहला व्यंजन चखा, उसके चेहरे पर आश्चर्य दिखाई दिया।
“इसका स्वाद तो बिल्कुल अलग है।”
सुरा मुस्कुराई।
“इस भोजन में हमारे राज्य के विशेष फूलों और जड़ी-बूटियों की सुगंध का उपयोग किया जाता है।”
भोजन के दौरान सागर को फिर अपने शरीर में हल्का बदलाव महसूस हुआ। उसके आसपास गुलाब की खुशबू पहले से थोड़ी अधिक स्पष्ट हो गई थी।
शांति ने कहा,
“लगता है झरने का प्रभाव अभी भी बना हुआ है।”
सुरा ने गंभीरता से उत्तर दिया,
“विलोम वन में कुछ प्रभाव तुरंत समाप्त नहीं होते। वे अगले चरण तक व्यक्ति के साथ रहते हैं।”
भोजन समाप्त होने के बाद सुरा ने दोनों को महल की खिड़की से बाहर देखने को कहा।
दूर एक नया रास्ता दिखाई दे रहा था।
“कल तुम्हारी यात्रा अगले राज्य की ओर बढ़ेगी,” सुरा ने कहा।
सागर ने ‘वन पर्व’ को अपने बैग में सुरक्षित रखा।
विलोम वन का रहस्य हर कदम के साथ और गहरा होता जा रहा था।
अध्याय 35 — नया परिवर्तन
कल्याणी राज्य के सुगंधित भोजन के बाद सागर को अपने शरीर में एक और बदलाव महसूस हुआ।
उसने देखा कि उसके शरीर की बनावट पहले की तुलना में धीरे-धीरे बदल रही थी। छाती के आकार में हल्का स्त्री-सदृश विकास दिखाई देने लगा था। सागर कुछ क्षण के लिए चुप रह गया।
शांति ने उसके चेहरे की चिंता देखकर पूछा,
“क्या हुआ?”
सागर ने धीमे स्वर में कहा,
“लगता है विलोम वन का प्रभाव अब और स्पष्ट हो रहा है।”
राजकुमारी सुरा ने भी इस बदलाव को देखा और गंभीरता से बोली,
“यह परिवर्तन उसी क्रम का हिस्सा है। विलोम वन तुम्हारे शरीर को धीरे-धीरे अपने नियमों के अनुसार बदल रहा है।”
सागर ने गहरी साँस ली।
“तो आगे और बदलाव भी हो सकते हैं?”
सुरा ने उत्तर दिया,
“हाँ, लेकिन हर परिवर्तन धीरे-धीरे होगा। तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है।”
शांति ने सागर का हाथ पकड़कर कहा,
“हमने शुरुआत में ही तय किया था कि चाहे तुम्हारे या मेरे शरीर में कितने भी बदलाव आएँ, हम एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे।”
सागर ने सिर हिलाया।
अब उसे समझ आने लगा था कि विलोम वन की शक्ति केवल एक भ्रम नहीं थी।
उसके शरीर में सचमुच परिवर्तन शुरू हो चुके थे।
अध्याय 36 — ध्वनि राज्य
अगली सुबह सागर और शांति ने कल्याणी राज्य से आगे की यात्रा शुरू की। राजकुमारी सुरा उन्हें राज्य की सीमा तक छोड़ने आई।
सुरा ने कहा,
“अब तुम्हारी अगली मंजिल है—ध्वनि राज्य।”
सागर ने पूछा, “ध्वनि राज्य में ऐसा क्या खास है?”
सुरा ने उत्तर दिया,
“वहाँ तुम्हें आँखों से ज्यादा कानों पर भरोसा करना होगा। उस राज्य में आवाजें ही रास्ता दिखाती हैं और वही तुम्हारी परीक्षा भी लेंगी।”
शांति ने सागर की ओर देखा।
“तो हमें बहुत सावधान रहना होगा।”
दोनों आगे बढ़ते गए। कुछ समय बाद जंगल का वातावरण बदलने लगा। हवा में अजीब कंपन महसूस होने लगा और दूर से अलग-अलग दिशाओं से संगीत, घंटियों और फुसफुसाहट जैसी आवाजें आने लगीं।
आखिरकार उनके सामने एक विशाल पत्थर का द्वार दिखाई दिया।
द्वार पर लिखा था—
“ध्वनि राज्य में आपका स्वागत है।”
जैसे ही सागर और शांति ने द्वार पार किया, उनके पीछे का रास्ता अचानक शांत हो गया।
सामने से एक मधुर आवाज आई—
“स्वागत है, यात्रियों।”
दोनों ने चारों ओर देखा, लेकिन वहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
सागर ने कहा,
“आवाज तो बिल्कुल पास से आई... लेकिन यहाँ कोई है ही नहीं।”
शांति ने उसका हाथ पकड़ लिया।
तभी चारों ओर कई आवाजें एक साथ गूँजने लगीं।
“सागर...”
“शांति...”
“इधर आओ...”
दोनों समझ गए कि ध्वनि राज्य की परीक्षा शुरू हो चुकी थी।
अध्याय 37 — राजकुमारी स्वर लता
ध्वनि राज्य में गूँजती अलग-अलग आवाजों के बीच अचानक एक मधुर और स्पष्ट स्वर सुनाई दिया।
“बस... अब इन आवाजों को बंद करो।”
क्षणभर में चारों ओर का शोर शांत हो गया।
सागर और शांति ने सामने देखा। एक राजसी युवती महल की सीढ़ियों से उनकी ओर आ रही थी। उसके चेहरे पर शांति और आत्मविश्वास था।
उसने मुस्कुराकर कहा,
“मैं स्वर लता, ध्वनि राज्य की राजकुमारी हूँ।”
सागर और शांति ने उसका अभिवादन किया।
स्वर लता ने कहा,
“तुम दोनों के आने की खबर हमें पहले ही मिल चुकी थी। विलोम वन में तुम्हारी यात्रा को यहाँ सभी जानते हैं।”
सागर ने पूछा,
“अभी जो आवाजें हमें अलग-अलग दिशाओं से बुला रही थीं, वे क्या थीं?”
स्वर लता ने उत्तर दिया,
“वे इस राज्य की ध्वनि-माया थीं। यहाँ आवाजें तुम्हें भ्रमित कर सकती हैं। अगर तुम हर आवाज पर विश्वास करोगे, तो रास्ता भूल जाओगे।”
शांति ने पूछा,
“तो सही आवाज को कैसे पहचानेंगे?”
स्वर लता मुस्कुराई।
“सही आवाज वह होगी जिसे सुनकर तुम्हारे मन में डर नहीं, बल्कि विश्वास पैदा हो।”
फिर उसने सागर की ओर देखा।
“और तुम्हारे भीतर विलोम वन के परिवर्तन भी आगे बढ़ रहे हैं। ध्वनि राज्य में तुम्हें अपने मन के साथ-साथ अपनी पहचान की भी परीक्षा देनी होगी।”
सागर ने दृढ़ स्वर में कहा,
“हम तैयार हैं।”
स्वर लता ने महल के द्वार की ओर इशारा किया।
“तो आइए। आपकी अगली परीक्षा स्वर-मंडप में आपका इंतजार कर रही है।”
अध्याय 38 — संगीत की माया
राजकुमारी स्वर लता सागर और शांति को ध्वनि राज्य के विशाल स्वर-मंडप में लेकर गई।
जैसे ही वे अंदर पहुँचे, चारों ओर से मधुर संगीत की धुनें सुनाई देने लगीं। कभी बाँसुरी की आवाज आती, कभी वीणा की, तो कभी दूर से घंटियों जैसी मधुर ध्वनि।
स्वर लता ने कहा,
“यह है संगीत की माया। इस मंडप में बजने वाला संगीत केवल कानों से नहीं, मन से सुना जाता है।”
सागर ने ध्यान से सुना। अचानक उसे ऐसा लगा जैसे संगीत के भीतर उसके बचपन की यादें छिपी हों। उसे दिल्ली का पुराना पुस्तकालय, अपनी पहली खोज और राजेश के साथ की यात्रा याद आने लगी।
दूसरी ओर शांति को अपने बचपन और अपने परिवार की यादें सुनाई देने लगीं।
शांति ने आँखें बंद कर लीं।
“सागर... यह संगीत हमारी यादों को जगा रहा है।”
स्वर लता ने कहा,
“यही इस माया की शक्ति है। अगर तुम यादों में खो गए, तो यह संगीत तुम्हें अपने भीतर कैद कर सकता है।”
सागर ने शांति का हाथ पकड़ लिया।
“हम यहाँ अपनी यादों में खोने नहीं, आगे बढ़ने आए हैं।”
दोनों ने आँखें बंद कीं और संगीत को सुनते हुए अपने मन को शांत किया।
कुछ ही क्षणों बाद संगीत धीरे-धीरे शांत होने लगा।
स्वर लता मुस्कुराई।
“तुम दोनों ने पहली परीक्षा पार कर ली। तुमने संगीत को सुना, लेकिन उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।”
सागर ने पूछा,
“अब आगे क्या?”
स्वर लता ने उत्तर दिया,
“अब तुम्हें उस धुन का सामना करना होगा, जो तुम्हारे अपने भीतर से निकलती है।”
सागर और शांति ने एक-दूसरे की ओर देखा।
ध्वनि राज्य का असली रहस्य अभी बाकी था।
अध्याय 39 — सात स्वरों की माया
स्वर लता सागर और शांति को स्वर-मंडप के एक विशाल कक्ष में लेकर गई। कक्ष के बीच सात चमकते हुए दीपक जल रहे थे।
स्वर लता ने कहा,
“ये सात दीपक सात स्वरों का प्रतीक हैं—सा, रे, ग, म, प, ध और नि।”
जैसे ही उसने हाथ उठाया, सातों दिशाओं से अलग-अलग स्वर गूँजने लगे।
सा... रे... ग... म... प... ध... नि...
धीरे-धीरे उन स्वरों ने मिलकर एक अद्भुत धुन बना दी। सागर को लगा जैसे पूरा कक्ष उस संगीत की लय में साँस ले रहा हो।
स्वर लता ने समझाया,
“सात स्वरों की माया व्यक्ति के मन और इंद्रियों को प्रभावित कर सकती है। हर स्वर तुम्हारे भीतर की किसी भावना को जगाता है।”
पहला स्वर सुनते ही सागर को अपने बचपन की याद आई। दूसरे स्वर ने उसे अपनी यात्रा याद दिलाई। तीसरे स्वर के साथ उसके मन में शांति के साथ बिताए पल उभरने लगे।
शांति के सामने भी अलग-अलग दृश्य बनने लगे।
सागर ने उसका हाथ थाम लिया।
“इन दृश्यों को सच मत समझना। ये सिर्फ माया है।”
शांति ने सिर हिलाया।
दोनों ने सातों स्वरों को ध्यान से सुना, लेकिन किसी भी दृश्य के पीछे जाने के बजाय अपने वर्तमान पर ध्यान बनाए रखा।
कुछ देर बाद सातों दीपक एक साथ चमक उठे और संगीत शांत हो गया।
स्वर लता मुस्कुराई।
“तुम दोनों ने सात स्वरों की माया को समझ लिया। याद रखना—संगीत रास्ता दिखा सकता है, लेकिन निर्णय तुम्हें स्वयं लेना होगा।”
सागर ने कहा,
“अब हमें अगला रास्ता बताइए।”
स्वर लता ने महल के पीछे खुलते एक नए द्वार की ओर इशारा किया।
“विलोम वन का अगला राज्य तुम्हारा इंतजार कर रहा है।”
अध्याय 40 — मन पर प्रभाव
सात स्वरों की माया समाप्त होने के बाद सागर और शांति को लगा कि सब कुछ शांत हो गया है। लेकिन कुछ ही देर में दोनों ने महसूस किया कि संगीत का हल्का प्रभाव अभी भी उनके मन पर बना हुआ था।
सागर को आसपास की आवाजें सामान्य से अधिक स्पष्ट सुनाई देने लगीं। छोटी-सी आहट भी उसे बहुत दूर से आती हुई महसूस होती।
शांति ने भी अपने भीतर एक अजीब-सी मानसिक थकान महसूस की।
“सागर, मुझे लग रहा है कि उन स्वरों का असर अभी खत्म नहीं हुआ।”
सागर ने धीरे से सिर हिलाया।
“मुझे भी ऐसा ही लग रहा है। हमें कुछ देर शांत रहना चाहिए।”
राजकुमारी स्वर लता ने उन्हें ध्यान से देखा।
“सात स्वरों की माया शरीर से ज्यादा मन पर प्रभाव डालती है। कुछ समय तक तुम्हारे विचार, स्मृतियाँ और भावनाएँ सामान्य से अधिक तीव्र महसूस हो सकती हैं।”
सागर ने पूछा,
“क्या यह प्रभाव स्थायी है?”
स्वर लता ने कहा,
“नहीं। यदि तुम अपने मन को शांत रखोगे तो प्रभाव धीरे-धीरे कम हो जाएगा। लेकिन आगे के राज्यों में तुम्हें अपने मन पर और अधिक नियंत्रण रखना होगा।”
शांति ने सागर का हाथ पकड़ लिया।
“हम साथ हैं, इसलिए संभाल लेंगे।”
सागर मुस्कुराया।
“हाँ। हमें विलोम वन की माया को समझना है, उससे डरना नहीं।”
दोनों ने कुछ देर आँखें बंद करके गहरी साँस ली। धीरे-धीरे उनके मन की बेचैनी कम होने लगी।
स्वर लता ने कहा,
“अब तुम आगे जाने के लिए तैयार हो।”
सागर और शांति ने अगले द्वार की ओर कदम बढ़ाए। उन्हें पता था कि विलोम वन की अगली परीक्षा उनके मन और शरीर—दोनों को चुनौती देने वाली थी।
अध्याय 41 — राजकुमारी की संगीत चुनौती
राजकुमारी स्वर लता ने सागर को महल के एक विशाल संगीत कक्ष में बुलाया। कक्ष के बीच एक पुरानी वीणा रखी थी और चारों ओर सात स्वरों के प्रतीक बने हुए थे।
स्वर लता ने कहा,
“सागर, तुमने सात स्वरों की माया को पार कर लिया है। अब तुम्हारे सामने मेरी एक विशेष संगीत चुनौती है।”
सागर ने पूछा,
“मुझे क्या करना होगा?”
स्वर लता ने मुस्कुराकर कहा,
“मैं एक छोटी-सी धुन बजाऊँगी। तुम्हें उसे ध्यान से सुनकर उसी क्रम में दोहराना होगा। लेकिन इस कक्ष की माया तुम्हें भ्रमित करने की कोशिश करेगी।”
सागर तैयार होकर बैठ गया।
स्वर लता ने वीणा पर सात स्वरों की एक धुन बजाई।
सा... रे... ग... म... प... ध... नि...
फिर उसने वही धुन अलग क्रम में दोहराई, ताकि सागर भ्रमित हो जाए।
सागर ने आँखें बंद कीं और ध्यान से केवल मूल धुन को याद किया। उसके मन में कई दूसरी आवाजें गूँजने लगीं, लेकिन उसने उन पर ध्यान नहीं दिया।
फिर उसने वीणा उठाई और धीरे-धीरे वही धुन बजाने लगा।
कमरे में अचानक तेज प्रकाश फैल गया।
स्वर लता मुस्कुराई।
“सही! तुमने माया के बीच भी असली धुन पहचान ली।”
शांति ने खुशी से कहा,
“मुझे पता था सागर कर लेगा।”
स्वर लता ने कहा,
“तुमने केवल संगीत की परीक्षा नहीं पास की। तुमने यह साबित किया है कि भ्रम के बीच भी तुम अपने निर्णय पर भरोसा कर सकते हो।”
सागर ने वीणा वापस रखी।
“अब क्या हम आगे जा सकते हैं?”
स्वर लता ने महल के पीछे का द्वार खोल दिया।
“हाँ। तुम्हारी अगली यात्रा अब शुरू हो सकती है।”
सागर और शांति ने एक-दूसरे की ओर देखा और नए रास्ते पर आगे बढ़ गए।
अध्याय 42 — आवाज़ में बदलाव
संगीत की चुनौती पूरी होने के बाद सागर और शांति महल से बाहर निकलने लगे। तभी सागर ने शांति से कुछ कहने के लिए मुँह खोला।
“शांति, हमें अब आगे...”
लेकिन अपनी ही आवाज़ सुनकर सागर अचानक रुक गया।
उसकी आवाज़ पहले जैसी नहीं थी। उसमें हल्की स्त्री-सदृश कोमलता आ गई थी।
सागर ने हैरानी से पूछा,
“शांति... मेरी आवाज़ बदल गई है?”
शांति ने ध्यान से उसकी बात सुनी और सिर हिलाया।
“हाँ। तुम्हारी आवाज़ पहले से काफी अलग लग रही है।”
सागर ने फिर बोलकर देखा। इस बार भी उसकी आवाज़ उसी बदले हुए स्वर में निकली।
राजकुमारी स्वर लता उनके पास आई और बोली,
“यह ध्वनि राज्य का प्रभाव है। सात स्वरों की माया ने तुम्हारी आवाज़ पर भी अपना प्रभाव छोड़ा है।”
सागर ने चिंतित होकर पूछा,
“क्या यह बदलाव स्थायी है?”
स्वर लता ने कहा,
“अभी कहना कठिन है। विलोम वन में होने वाले बदलाव क्रमशः बढ़ते हैं। लेकिन याद रखो—आवाज़ बदलने से तुम्हारी पहचान या तुम्हारे निर्णय नहीं बदलते।”
शांति ने मुस्कुराकर कहा,
“आवाज़ चाहे जैसी भी हो, मेरे लिए तुम वही सागर हो।”
सागर भी मुस्कुरा दिया।
“और तुम वही शांति।”
दोनों ने आगे बढ़ना शुरू किया।
अब सागर को महसूस हो रहा था कि विलोम वन का प्रभाव उसके शरीर के साथ-साथ उसकी आवाज़ पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा था।
अध्याय 43 — नयनवर्त राज्य
ध्वनि राज्य से विदा लेने के बाद सागर और शांति आगे की यात्रा पर निकल पड़े। जंगल का रास्ता धीरे-धीरे बदलने लगा। पेड़ों के बीच नीली रोशनी दिखाई देने लगी और हवा में हल्की चमक तैर रही थी।
काफी देर चलने के बाद वे एक विशाल पत्थर के द्वार के सामने पहुँचे।
द्वार पर लिखा था—
“नयनवर्त राज्य में आपका स्वागत है।”
सागर ने आश्चर्य से कहा,
“यह राज्य बाकी राज्यों से बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा है।”
शांति ने चारों ओर देखते हुए कहा,
“हाँ। ऐसा लगता है जैसे यहाँ हर चीज़ देखने और दिखाई देने से जुड़ी है।”
तभी महल की ओर से एक संदेशवाहक उनके पास आया।
“राजकुमारी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं। कृपया हमारे साथ चलिए।”
सागर और शांति उसके पीछे महल की ओर बढ़ने लगे।
महल के रास्ते में उन्हें अनेक विशाल दर्पण दिखाई दिए। लेकिन उन दर्पणों में उनका प्रतिबिंब हर बार अलग दिखाई दे रहा था।
सागर ने अपनी बदली हुई आवाज़ में कहा,
“यहाँ भी विलोम वन की कोई नई माया हमारा इंतजार कर रही है।”
शांति ने उसका हाथ थाम लिया।
“तो इस बार भी हम साथ मिलकर उसका सामना करेंगे।”
महल के मुख्य द्वार खुल गए।
अंदर से एक राजसी आवाज़ आई—
“नयनवर्त राज्य में आपका स्वागत है, सागर और शांति।”
दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
उन्हें पता था कि उनकी अगली परीक्षा अब शुरू होने वाली थी।
अध्याय 44 — राजकुमारी नयना
नयनवर्त राज्य के राजमहल का विशाल द्वार खुला। सामने एक राजसी युवती खड़ी थी। उसकी आँखों में असाधारण चमक और चेहरे पर गंभीर शांति थी।
उसने आगे बढ़कर कहा,
“मैं राजकुमारी नयना, नयनवर्त राज्य की राजकुमारी हूँ। तुम दोनों का हमारे राज्य में स्वागत है।”
सागर और शांति ने उसका अभिवादन किया।
नयना की नजर कुछ क्षण सागर पर ठहरी। फिर उसने कहा,
“तुम पर विलोम वन का प्रभाव अब काफी स्पष्ट हो चुका है।”
सागर ने पूछा,
“आपको यह कैसे पता?”
नयना ने सामने रखे एक बड़े दर्पण की ओर संकेत किया।
“नयनवर्त में आँखें केवल सामने की चीजें नहीं देखतीं। यहाँ दर्पण व्यक्ति के भीतर होने वाले परिवर्तनों की छवि भी दिखाते हैं।”
सागर और शांति ने दर्पण की ओर देखा।
इस बार सागर का प्रतिबिंब पहले से थोड़ा अधिक स्त्री-सदृश दिखाई दे रहा था, जबकि शांति का प्रतिबिंब पुरुष-सदृश दिखाई दे रहा था।
शांति ने गंभीरता से पूछा,
“क्या ये बदलाव आगे भी बढ़ेंगे?”
नयना ने उत्तर दिया,
“विलोम वन का प्रभाव अपनी गति से आगे बढ़ता है। लेकिन यहाँ तुम्हारी परीक्षा शरीर से अधिक दृष्टि और सत्य को पहचानने की होगी।”
सागर ने पूछा,
“हमें क्या करना होगा?”
नयना मुस्कुराई।
“नयनवर्त राज्य में तुम्हें यह सीखना होगा कि जो दिखाई देता है और जो वास्तव में सत्य है, उनमें अंतर कैसे पहचाना जाए।”
नयना ने महल के भीतर एक चमकते हुए द्वार की ओर संकेत किया।
“आओ। तुम्हारी पहली परीक्षा वहीं से शुरू होगी।”
सागर और शांति उसके पीछे चल पड़े। उन्हें पता था कि नयनवर्त राज्य में उनकी यात्रा एक नई चुनौती लेकर आई थी।
अध्याय 45 — आँखों का जादू
राजकुमारी नयना सागर और शांति को नयनवर्त राज्य के एक विशाल कक्ष में लेकर गई। कक्ष की दीवारों पर अनगिनत दर्पण लगे थे और बीच में एक गोल मंच बना हुआ था।
नयना ने कहा,
“नयनवर्त की सबसे बड़ी शक्ति है आँखों का जादू। यहाँ दृष्टि केवल चीजों को देखती नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी माया को भी प्रभावित कर सकती है।”
सागर ने पूछा,
“हमें इससे क्या करना होगा?”
नयना ने कहा,
“तुम दोनों को एक-दूसरे की आँखों में देखकर कुछ क्षण बिना विचलित हुए खड़ा रहना होगा। इस दौरान तुम्हें कई भ्रम दिखाई देंगे।”
सागर और शांति आमने-सामने खड़े हो गए।
जैसे ही उन्होंने एक-दूसरे की आँखों में देखा, कक्ष की दीवारें बदलती हुई दिखाई देने लगीं। कभी उन्हें घना जंगल दिखाई देता, कभी दिल्ली का पुस्तकालय, तो कभी उनका रास्ता बिल्कुल अलग दिशा में जाता हुआ नजर आता।
सागर ने आँखें बंद करने की कोशिश की, लेकिन नयना ने कहा,
“दृष्टि से मत भागो। जो दिखाई दे रहा है, उसे पहचानो और फिर तय करो कि वह सत्य है या माया।”
सागर ने फिर शांति की आँखों में देखा।
शांति ने कहा,
“सागर, जो भी दिखाई दे, हम एक-दूसरे पर भरोसा रखेंगे।”
धीरे-धीरे भ्रम कम होने लगे।
कुछ ही क्षणों बाद कक्ष फिर सामान्य हो गया।
नयना मुस्कुराई।
“तुम दोनों ने पहली परीक्षा पार कर ली। आँखों का जादू तुम्हें भ्रमित कर सकता है, लेकिन अगर तुम्हारा विश्वास मजबूत हो, तो माया तुम्हें नियंत्रित नहीं कर सकती।”
सागर ने राहत की साँस ली।
लेकिन नयना ने गंभीर स्वर में कहा,
“याद रखना—यह तो केवल शुरुआत थी। नयनवर्त की अगली परीक्षा में तुम्हारी अपनी आँखें ही तुम्हारे सामने सबसे बड़ा रहस्य रखेंगी।”
अध्याय 51 — राजकुमारी वस्त्रा
वस्त्रमूल राज्य के महल का विशाल द्वार खुला। अंदर से एक राजसी युवती बाहर आई। उसने सुंदर पारंपरिक पोशाक पहन रखी थी और उसके हाथ में बारीक कढ़ाई वाला एक पुराना वस्त्र था।
उसने मुस्कुराकर कहा,
“मैं राजकुमारी वस्त्रा हूँ। वस्त्रमूल राज्य में तुम्हारा स्वागत है, सागर और शांति।”
सागर और शांति ने उसका अभिवादन किया।
वस्त्रा ने सागर को ध्यान से देखा। उसके चेहरे के बदले हुए नयन-नक्श और स्त्री-सदृश आवाज़ को देखकर वह समझ गई कि विलोम वन का प्रभाव उस पर लगातार बढ़ रहा है।
“तुम्हारे भीतर परिवर्तन काफी आगे बढ़ चुका है,” वस्त्रा ने कहा।
सागर ने पूछा,
“क्या इस राज्य में भी कोई परीक्षा होगी?”
वस्त्रा ने हाथ में पकड़ा हुआ पुराना वस्त्र उठाया।
“हाँ। यहाँ की परीक्षा वस्त्र और पहचान से जुड़ी है।”
शांति ने पूछा,
“क्या वस्त्र भी इस वन की माया का हिस्सा हैं?”
वस्त्रा ने गंभीरता से कहा,
“विलोम वन में वस्त्र केवल शरीर को ढकते नहीं। यहाँ वे कभी-कभी व्यक्ति के बाहरी रूप को बदलकर उसे यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि उसकी पहचान क्या है।”
सागर ने शांत स्वर में कहा,
“मेरा रूप बदल सकता है, लेकिन मेरे निर्णय मेरे अपने हैं।”
राजकुमारी वस्त्रा मुस्कुराई।
“यही बात तुम्हें इस राज्य की पहली परीक्षा में काम आएगी।”
उसने महल के भीतर एक विशाल कक्ष की ओर संकेत किया।
“आओ। वस्त्रमूल की परीक्षा अब शुरू होती है।”
ध्याय 52 — वस्त्रमूल की पहली परीक्षा
राजकुमारी वस्त्रा सागर और शांति को महल के एक विशाल कक्ष में ले गई। वहाँ चारों ओर अलग-अलग रंगों और डिज़ाइन के वस्त्र रखे हुए थे।
वस्त्रा ने कहा,
“यह है वस्त्रमूल राज्य की पहली परीक्षा। यहाँ तुम्हें ऐसे वस्त्र दिखाई देंगे जो तुम्हें अलग-अलग रूपों में दिखाएँगे।”
सागर ने सामने रखे दर्पणों की ओर देखा। हर दर्पण में उसका रूप थोड़ा अलग दिखाई दे रहा था।
वस्त्रा ने समझाया,
“याद रखो—वस्त्र बाहरी रूप बदल सकते हैं, लेकिन वे तुम्हारी पहचान तय नहीं करते।”
अचानक एक वस्त्र अपने आप हवा में उठकर सागर के सामने आ गया। वह बिल्कुल साधारण दिख रहा था, लेकिन उसके पास जाते ही दर्पण में सागर का रूप फिर बदल गया।
शांति ने कहा,
“सागर, ध्यान रखना। यह भी माया हो सकती है।”
सागर ने कुछ क्षण सोचा और वस्त्र को छुए बिना पीछे हट गया।
“पहले मुझे समझना होगा कि परीक्षा मुझसे चाहती क्या है।”
वस्त्रा मुस्कुराई।
“बहुत अच्छा। पहली परीक्षा में तुम्हें माया के प्रभाव में तुरंत निर्णय नहीं लेना, बल्कि सोच-समझकर चुनाव करना है।”
सागर ने सही वस्त्र की पहचान करने के लिए दर्पणों, रंगों और उनके आसपास बने प्रतीकों को ध्यान से देखना शुरू किया।
कुछ देर बाद उसे एक छोटा-सा चिन्ह दिखाई दिया जो बाकी सभी वस्त्रों पर नहीं था।
“यही है,” सागर ने कहा।
वस्त्रा ने सिर हिलाया।
“सही। तुमने पहली परीक्षा का पहला चरण पार कर लिया।”
लेकिन तभी कक्ष के दूसरे छोर से कई नए वस्त्र हवा में उठने लगे।
वस्त्रा ने कहा,
“अब परीक्षा का अगला चरण शुरू होता है।”
अध्याय 53 — वस्त्रों में नया रूप
वस्त्रमूल की परीक्षा के दौरान अचानक कक्ष में रखे सभी वस्त्र चमकने लगे। एक हल्की सुनहरी रोशनी सागर के चारों ओर फैल गई।
जैसे ही सागर ने सामने लगे दर्पण में देखा, वह कुछ क्षण के लिए चुप रह गया।
दर्पण में उसका रूप पहले से काफी अलग दिखाई दे रहा था। उसके बदले हुए नयन-नक्श, मुलायम चेहरे और लंबे बालों के साथ वह एक सुंदर स्त्री के रूप में दिखाई दे रहा था।
सागर ने हैरानी से कहा,
“यह... मेरा रूप है?”
शांति ने दर्पण को ध्यान से देखा।
“हाँ, लेकिन याद रखो—यह विलोम वन की माया भी हो सकती है।”
राजकुमारी वस्त्रा ने समझाया,
“वस्त्रमूल में वस्त्र व्यक्ति के बाहरी रूप को उसकी संभावित दिशा में दिखाते हैं। लेकिन दर्पण में दिखाई देने वाला रूप तुम्हारी पूरी पहचान नहीं है।”
सागर ने अपने प्रतिबिंब को कुछ देर देखा। फिर शांत स्वर में कहा,
“रूप बदल सकता है, लेकिन मैं अपने निर्णय खुद लूँगा।”
वस्त्रा मुस्कुराई।
“यही इस परीक्षा का उद्देश्य है—अपने बदलते रूप से घबराना नहीं और उसे अपनी पूरी पहचान न मान लेना।”
शांति ने सागर का हाथ थाम लिया।
“चलो, अब अगली परीक्षा का सामना करते हैं।”
सागर ने सिर हिलाया।
वस्त्रमूल की माया अब उसके बदलते रूप को और स्पष्ट रूप से सामने ला चुकी थी।
अध्याय 54 — दर्पणों में अनेक रूप
वस्त्रमूल के विशाल कक्ष में सागर धीरे-धीरे एक दर्पण से दूसरे दर्पण के सामने जाने लगा। हर दर्पण में उसका एक अलग स्त्री-रूप दिखाई दे रहा था।
पहले दर्पण में वह साधारण ग्रामीण लड़की के रूप में दिखाई दिया—सादा कपड़े, सरल चेहरा और शांत भाव।
दूसरे दर्पण में उसका रूप कुछ भरा हुआ दिखाई दे रहा था, जैसे किसी अलग जीवन की कल्पना हो।
तीसरे दर्पण में वह एक सुंदर, सजी-सँवरी युवती के रूप में दिखाई दी।
चौथे दर्पण में सागर ने स्वयं को एक आदिवासी युवती के रूप में देखा, जिसके वस्त्र और आभूषण विलोम वन की परंपरा से जुड़े थे।
पाँचवें दर्पण में वह एक राजकुमारी के रूप में दिखाई दे रहा था—राजसी वस्त्र, मुकुट और गंभीर व्यक्तित्व के साथ।
सागर हैरान रह गया।
“इतने सारे रूप... इनमें से मेरा असली रूप कौन-सा है?”
शांति उसके पास आकर बोली,
“शायद यही परीक्षा है। ये सभी रूप तुम्हें अपनी ओर खींच रहे हैं, लेकिन इनमें से कोई भी तुम्हारी पूरी पहचान नहीं है।”
राजकुमारी वस्त्रा ने कहा,
“बिल्कुल। ये दर्पण तुम्हें अलग-अलग संभावनाएँ दिखा रहे हैं। कोई रूप तुम्हें आकर्षित कर सकता है, कोई तुम्हें असहज कर सकता है, लेकिन तुम्हें यह तय करना होगा कि तुम स्वयं को किस आधार पर पहचानते हो।”
सागर ने सभी दर्पणों को एक बार फिर देखा।
फिर उसने कहा,
“मैं इन रूपों से भागूँगा नहीं। लेकिन मैं किसी एक दर्पण को अपनी पूरी सच्चाई भी नहीं मानूँगा।”
वस्त्रा मुस्कुराई।
“अब तुम वस्त्रमूल की असली परीक्षा समझने लगे हो।”
तभी सभी दर्पण एक साथ चमक उठे और कक्ष के बीच एक नया द्वार दिखाई दिया।
परीक्षा का अगला चरण सामने था।
अध्याय 55 — सुंदरता और कुरूपता की परीक्षा
राजकुमारी वस्त्रा ने सागर और शांति को एक नए कक्ष में पहुँचाया। वहाँ दो विशाल दर्पण आमने-सामने लगे थे।
पहले दर्पण में सागर का अत्यंत सुंदर स्त्री-रूप दिखाई दे रहा था—सजे हुए वस्त्र, शांत चेहरा और राजसी आभा।
दूसरे दर्पण में उसका बिल्कुल विपरीत रूप दिखाई दिया। कपड़े साधारण थे और चेहरा थका हुआ तथा अस्त-व्यस्त दिखाई दे रहा था।
वस्त्रा ने कहा,
“यह सुंदरता और कुरूपता की परीक्षा है। दोनों दर्पण तुम्हें अलग-अलग रूप दिखाएँगे। तुम्हारा काम किसी एक को श्रेष्ठ मानना नहीं, बल्कि यह समझना है कि बाहरी रूप व्यक्ति का मूल्य तय नहीं करता।”
सागर ने पहले दर्पण को देखा, फिर दूसरे को।
कुछ देर बाद उसने कहा,
“अगर मैं केवल सुंदर रूप को अपना मानूँगा, तो दूसरे रूप को देखकर खुद को कम समझूँगा। लेकिन दोनों ही केवल बाहरी रूप हैं।”
शांति मुस्कुराई।
“यही सही उत्तर है।”
सागर ने दोनों दर्पणों के बीच खड़े होकर कहा,
“मेरा रूप चाहे जैसा दिखाई दे, मेरी पहचान मेरे कर्मों और मेरे फैसलों से होगी।”
अचानक दोनों दर्पणों की चमक एक जैसी हो गई।
राजकुमारी वस्त्रा ने कहा,
“तुमने परीक्षा पूरी कर ली। तुमने सुंदरता को अहंकार नहीं बनने दिया और कुरूपता को कमजोरी नहीं माना।”
सागर ने राहत की साँस ली।
तभी महल के दूर वाले हिस्से से एक घंटी बजी।
वस्त्रा ने कहा,
“अब वस्त्रमूल की अगली परीक्षा तुम्हारा इंतजार कर रही है।”
अध्याय 56 — मन की सुंदरता: अंतिम परीक्षा
वस्त्रमूल राज्य की अंतिम परीक्षा के लिए राजकुमारी वस्त्रा सागर और शांति को महल के सबसे शांत कक्ष में ले गई।
कक्ष के बीच एक विशाल दर्पण था, लेकिन उसमें चेहरा नहीं, बल्कि व्यक्ति के विचार और भावनाएँ दिखाई देती थीं।
वस्त्रा ने कहा,
“यह वस्त्रमूल की अंतिम परीक्षा है—मन की सुंदरता। यहाँ तुम्हारे बाहरी रूप का कोई महत्व नहीं होगा।”
सागर दर्पण के सामने खड़ा हुआ।
उसमें उसकी यात्रा के कई दृश्य दिखाई देने लगे—दिल्ली का पुस्तकालय, राजेश, असम का जंगल, शांति से उसका विवाह और विलोम वन में अब तक हुए बदलाव।
फिर दर्पण ने उसे कठिन विकल्प दिखाए।
एक ओर वह अकेले आगे बढ़कर विलोम वन का रहस्य जल्दी जान सकता था। दूसरी ओर शांति और अपने साथियों की मदद करने के लिए उसे रुकना पड़ता।
सागर ने बिना देर किए कहा,
“मैं अकेला आगे नहीं जाऊँगा। मेरी यात्रा सिर्फ मेरे लिए नहीं है। जिन लोगों ने मेरा साथ दिया है, उनके प्रति मेरी जिम्मेदारी भी है।”
दर्पण की चमक बढ़ गई।
वस्त्रा मुस्कुराई।
“यही मन की सुंदरता है—दूसरों के प्रति सम्मान, विश्वास और जिम्मेदारी।”
शांति ने सागर का हाथ थाम लिया।
तभी दर्पण टूटने के बजाय प्रकाश में बदल गया और पूरे कक्ष को रोशन कर दिया।
वस्त्रा ने घोषणा की,
“सागर, तुमने वस्त्रमूल की अंतिम परीक्षा सफलतापूर्वक पार कर ली।”
महल का अगला द्वार खुल गया।
सागर और शांति ने एक-दूसरे की ओर देखा।
विलोम वन की यात्रा अब एक और रहस्यमय राज्य की ओर बढ़ने वाली थी।
अध्याय 57 — मन का परिवर्तन
वस्त्रमूल की अंतिम परीक्षा पूरी होने के बाद सागर कुछ देर शांत बैठा रहा। उसके भीतर एक अजीब-सी अनुभूति हो रही थी।
अब तक विलोम वन ने उसके शरीर, चेहरे, आवाज़ और बाहरी रूप में कई बदलाव किए थे। लेकिन इस बार उसे महसूस हुआ कि बदलाव उसके मन के स्तर पर भी असर डाल रहा है।
सागर ने शांति से कहा,
“मुझे लगता है... मेरे विचारों और भावनाओं में भी बदलाव हो रहा है।”
शांति ने पूछा,
“कैसा बदलाव?”
सागर कुछ पल सोचकर बोला,
“पहले मैं अपने आपको केवल पुरुष के रूप में ही देखता था। लेकिन अब मुझे अपने भीतर स्त्री-सदृश भावनाएँ भी स्वाभाविक लगने लगी हैं। ऐसा लगता है जैसे विलोम वन मेरे मन को भी एक नए अनुभव से गुजार रहा है।”
राजकुमारी वस्त्रा ने गंभीरता से कहा,
“यही विलोम वन का सबसे गहरा प्रभाव है। यह केवल बाहरी रूप नहीं बदलता; कभी-कभी व्यक्ति को अपनी पहचान और भावनाओं को नए तरीके से समझने के लिए भी मजबूर करता है।”
सागर ने दर्पण में अपने बदले हुए रूप को देखा।
“तो शायद यह भी मेरी यात्रा का एक हिस्सा है।”
शांति ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
“जो भी महसूस करो, उसे समझने के लिए तुम्हें समय लेना चाहिए। मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
सागर ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
विलोम वन में उसका परिवर्तन अब केवल शरीर का नहीं, बल्कि उसके भीतर की सोच और आत्म-पहचान का भी रहस्य बन चुका था।
अध्याय 58 — नई रुचि
वस्त्रमूल राज्य में कुछ दिन बिताने के बाद सागर ने महसूस किया कि उसके भीतर एक और बदलाव आया है।
अब उसे महिला-वस्त्रों के रंग, डिज़ाइन और कढ़ाई पहले से कहीं अधिक आकर्षित करने लगे थे। महल में रखे सुंदर वस्त्रों को देखकर वह उनके कपड़े और पारंपरिक शैली के बारे में जानने लगा।
राजकुमारी वस्त्रा ने यह बदलाव देखा तो पूछा,
“सागर, क्या तुम्हें ये वस्त्र पसंद आने लगे हैं?”
सागर ने सहजता से कहा,
“हाँ। पहले मैंने कभी इन चीज़ों पर इतना ध्यान नहीं दिया था, लेकिन अब इनके रंग और डिज़ाइन मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।”
शांति मुस्कुराई।
“तुम्हें जो पसंद आता है, उसे पसंद करने में कोई बुराई नहीं।”
वस्त्रा ने कहा,
“रुचियाँ बदलना स्वाभाविक है। लेकिन याद रखो—किसी विशेष तरह के वस्त्र पसंद करने से किसी व्यक्ति की पूरी पहचान तय नहीं होती।”
सागर ने एक सुंदर पारंपरिक वस्त्र को देखकर कहा,
“शायद विलोम वन मुझे अपने बारे में ऐसी बातें समझा रहा है, जिनके बारे में मैंने पहले कभी सोचा ही नहीं था।”
शांति ने जवाब दिया,
“तो उन्हें समझने की कोशिश करो। जल्दी में कोई निष्कर्ष मत निकालो।”
सागर ने सिर हिलाया।
अब उसके लिए महिला-वस्त्र केवल विलोम वन की माया का हिस्सा नहीं रहे थे—उनमें उसकी अपनी एक नई रुचि भी पैदा हो चुकी थी।
अध्याय 59 — मोहिनी मुस्कान राज्य
वस्त्रमूल से आगे बढ़ते हुए सागर और शांति कई घंटों तक घने जंगल में चलते रहे। रास्ते में पेड़ों पर चमकीले फूल और हवा में मीठी सुगंध फैलती जा रही थी।
अचानक सामने एक विशाल सुनहरा द्वार दिखाई दिया।
उस पर लिखा था—
“मोहिनी मुस्कान राज्य में आपका स्वागत है।”
सागर ने आश्चर्य से कहा,
“यह नाम तो बाकी राज्यों से भी अलग है।”
शांति ने मुस्कुराकर कहा,
“विलोम वन में अब हमें किसी भी चीज़ पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए।”
द्वार खुलते ही सामने एक सुंदर नगर दिखाई दिया। वहाँ के लोग हमेशा मुस्कुराते हुए दिखाई दे रहे थे और पूरे राज्य में मधुर संगीत सुनाई दे रहा था।
तभी महल की ओर से एक राजसी युवती उनकी ओर आई।
“सागर और शांति,” उसने मुस्कुराते हुए कहा, “मोहिनी मुस्कान राज्य में आपका स्वागत है।”
सागर ने पूछा,
“क्या आप यहाँ की राजकुमारी हैं?”
युवती ने मुस्कुराकर उत्तर दिया,
“हाँ। मेरा नाम मोहिनी है।”
मोहिनी ने सागर के बदलते रूप और उसके चेहरे पर आई कोमलता को ध्यान से देखा।
“तुम पर विलोम वन का प्रभाव अब बहुत गहरा हो चुका है।”
शांति ने पूछा,
“इस राज्य की परीक्षा कैसी होगी?”
मोहिनी की मुस्कान थोड़ी रहस्यमय हो गई।
“यहाँ तुम्हें पता चलेगा कि एक मुस्कान भी कितनी शक्तिशाली माया बन सकती है।”
सागर और शांति ने एक-दूसरे की ओर देखा।
मोहिनी ने महल के द्वार खोलते हुए कहा,
“आओ। तुम्हारी अगली परीक्षा अब शुरू होती है।”
अध्याय 60 — राजकुमारी मोहिनी
मोहिनी मुस्कुराते हुए सागर और शांति को राजमहल के भीतर ले गई। महल की दीवारों पर मुस्कुराते हुए चेहरों और फूलों की सुंदर आकृतियाँ बनी थीं।
मुख्य सभागार में पहुँचकर मोहिनी ने अपना परिचय दिया—
“मैं राजकुमारी मोहिनी, मोहिनी मुस्कान राज्य की राजकुमारी हूँ।”
सागर ने विनम्रता से कहा,
“आपके राज्य का नाम जितना अनोखा है, उतना ही इसका वातावरण भी।”
मोहिनी हँसते हुए बोली,
“क्योंकि यहाँ मुस्कान केवल खुशी की निशानी नहीं है। यहाँ यह एक शक्ति है।”
शांति ने पूछा,
“क्या मुस्कान भी विलोम वन की माया का हिस्सा हो सकती है?”
मोहिनी ने गंभीर होकर कहा,
“हाँ। इस राज्य में किसी की मुस्कान तुम्हारे मन पर प्रभाव डाल सकती है। लेकिन तुम्हारी पहली परीक्षा यह पहचानना होगी कि कौन-सी मुस्कान सच्ची है और कौन-सी माया।”
सागर ने कहा,
“तो हमें फिर से भ्रम का सामना करना होगा।”
“बिल्कुल,” मोहिनी ने उत्तर दिया। “लेकिन इस बार आँखों और आवाज़ के बजाय तुम्हें अपने मन की अनुभूति पर भरोसा करना होगा।”
महल के पीछे से अचानक घंटी की आवाज आई।
मोहिनी ने कहा,
“समय आ गया है। मोहिनी मुस्कान की पहली परीक्षा शुरू होने वाली है।”
सागर और शांति उसके पीछे चल पड़े।
अध्याय 61 — मोहिनी का रहस्य
राजकुमारी मोहिनी ने सागर और शांति को महल के एक शांत कक्ष में बैठाया। उसके चेहरे पर वही रहस्यमयी मुस्कान थी।
मोहिनी ने कहा,
“मेरे राज्य में आने वाला लगभग हर व्यक्ति मेरी मोहिनी मुस्कान से प्रभावित हो जाता है। लेकिन तुम दोनों अभी तक इससे पूरी तरह प्रभावित नहीं हुए। खासकर सागर... तुम अलग हो।”
सागर ने हैरानी से पूछा,
“मैं अलग क्यों हूँ?”
मोहिनी ने उत्तर दिया,
“क्योंकि तुम्हारे भीतर विलोम वन का प्रभाव पहले से चल रहा है। तुम्हारा शरीर, आवाज़ और रूप बदल रहे हैं, लेकिन तुम्हारा मन अभी भी अपने निर्णय खुद ले रहा है। शायद इसी कारण मेरी मुस्कान तुम्हें पूरी तरह अपने वश में नहीं कर पा रही।”
शांति ने कहा,
“तो क्या यह भी परीक्षा का हिस्सा है?”
मोहिनी मुस्कुराई।
“हाँ। अब मैं जानना चाहती हूँ कि सागर अपने मन पर कितना नियंत्रण रख सकता है।”
सागर ने दृढ़ स्वर में कहा,
“मैं किसी भी माया को बिना समझे स्वीकार नहीं करूँगा।”
मोहिनी की मुस्कान और गहरी हो गई।
“तो फिर तैयार हो जाओ। मोहिनी मुस्कान की असली परीक्षा अब शुरू होती है।”
अध्याय 63 — पुरुष-मोह की माया
मोहिनी मुस्कुराई और कक्ष में एक रहस्यमय प्रकाश फैल गया। सागर के सामने कई आकर्षक पुरुष-रूप दिखाई देने लगे। यह मोहिनी मुस्कान की माया थी, जिसका उद्देश्य सागर के मन को उलझाना था।
सागर कुछ क्षणों के लिए उन दृश्यों में खो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कौन-सा दृश्य वास्तविक है और कौन-सा भ्रम।
शांति ने उसे पुकारा,
“सागर, मेरी आवाज़ सुनो। याद रखो—यह परीक्षा है।”
सागर ने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली। धीरे-धीरे उसके सामने के सारे दृश्य धुंधले पड़ने लगे।
मोहिनी ने कहा,
“सागर, तुम माया में फँसे जरूर, लेकिन उससे बाहर निकलने का निर्णय स्वयं लिया। यही तुम्हारी असली जीत है।”
सागर ने शांति की ओर देखकर कहा,
“अब मैं समझ गया हूँ कि विलोम वन केवल मेरा रूप नहीं बदल रहा—यह मेरी भावनाओं और इच्छाओं की भी परीक्षा ले रहा है।”
शांति ने मुस्कुराकर कहा,
“और हर परीक्षा में तुम्हें अपना निर्णय खुद लेना है।”
मोहिनी ने अगला द्वार खोल दिया।
मोहिनी मुस्कान की परीक्षा का अगला चरण शुरू होने वाला था।
अध्याय 62 — मोहिनी का आकर्षण
राजकुमारी मोहिनी की मुस्कान और उसके आत्मविश्वास से भरे व्यक्तित्व ने सागर के मन पर गहरा प्रभाव डाला। कुछ क्षणों के लिए वह उसकी ओर देखता ही रह गया।
सागर को महसूस हुआ कि वह मोहिनी के शारीरिक आकर्षण से प्रभावित होकर अपने आसपास की बातें भूलने लगा है।
शांति ने तुरंत उसे पुकारा,
“सागर!”
सागर जैसे नींद से जागा। उसने सिर झटककर अपने विचारों को संभाला।
मोहिनी ने गंभीर स्वर में कहा,
“यही मेरी शक्ति है। मेरी मुस्कान और आकर्षण लोगों के मन को अपनी ओर खींचते हैं। लेकिन तुमने समय रहते स्वयं को संभाल लिया।”
सागर ने गहरी साँस ली।
“तो यह भी आपकी परीक्षा का हिस्सा था?”
मोहिनी मुस्कुराई।
“हाँ। असली परीक्षा आकर्षण को महसूस करना नहीं, बल्कि उसके प्रभाव में अपने विवेक को खोने से बचना है।”
शांति ने सागर का हाथ पकड़ लिया।
सागर ने कहा,
“अब मैं समझ गया। विलोम वन की माया से बचने के लिए केवल शरीर नहीं, मन को भी मजबूत रखना होगा।”
मोहिनी ने सिर हिलाया।
“अब तुम अगली परीक्षा के लिए तैयार हो।”
अध्याय 65 — शांति का परिवर्तन
मोहिनी की परीक्षा समाप्त होने के बाद अचानक शांति के चारों ओर भी वही रहस्यमय प्रकाश फैल गया।
सागर ने चिंतित होकर पूछा,
“शांति, तुम्हें क्या हो रहा है?”
शांति ने कुछ क्षण आँखें बंद रखीं। जब प्रकाश धीरे-धीरे कम हुआ, तो उसके रूप में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देने लगा। उसके चेहरे के नयन-नक्श बदल गए, आवाज़ में भी परिवर्तन आया और उसका बाहरी रूप पुरुष-सदृश हो गया।
सागर ने आश्चर्य से कहा,
“शांति... विलोम वन का प्रभाव अब तुम पर भी पूरी तरह दिखाई दे रहा है।”
शांति ने अपने नए रूप को देखकर कुछ क्षण चुप रहने के बाद कहा,
“तो अब मैं भी बदल गया हूँ।”
राजकुमारी मोहिनी ने गंभीर स्वर में कहा,
“यही विलोम वन का नियम है। यहाँ परिवर्तन केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। लेकिन याद रखो—रूप बदलने से किसी व्यक्ति का मूल्य या उसके प्रति सम्मान नहीं बदलता।”
सागर ने शांति का हाथ थाम लिया।
“हमने शुरुआत में जो वादा किया था, वह आज भी वही है। चाहे हमारा रूप कुछ भी हो, हम एक-दूसरे का साथ देंगे।”
शांति मुस्कुराया।
“हाँ। अब हम दोनों इस रहस्य को साथ मिलकर समझेंगे।”
दोनों ने नए रूप में एक-दूसरे की ओर देखा।
विलोम वन की शक्ति ने अब सागर और शांति दोनों के बाहरी रूपों को पूरी तरह बदल दिया था, लेकिन उनकी साझा यात्रा अभी खत्म नहीं हुई थी।
अध्याय 66 — कामरति राज्य
मोहिनी मुस्कान राज्य से आगे बढ़ते हुए सागर और शांति कई घंटों तक घने जंगल में चलते रहे। रास्ता धीरे-धीरे बदलने लगा। हवा में चंदन और फूलों की हल्की सुगंध फैल गई और दूर से मधुर संगीत सुनाई देने लगा।
कुछ समय बाद उनके सामने एक विशाल द्वार आया। उस पर लिखा था—
“कामरति राज्य में आपका स्वागत है।”
सागर ने द्वार को देखकर कहा,
“विलोम वन का यह राज्य बाकी राज्यों से अलग लगता है।”
शांति ने उत्तर दिया,
“शायद यहाँ भी कोई नई परीक्षा हमारा इंतजार कर रही है।”
द्वार खुला तो सामने सुंदर बगीचे, शांत जलाशय और फूलों से सजे रास्ते दिखाई दिए। वातावरण आकर्षक था, लेकिन उसमें एक रहस्यमय गंभीरता भी थी।
तभी महल से एक राजसी संदेशवाहक बाहर आया।
“सागर और शांति, राजकुमारी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं।”
दोनों उसके पीछे महल की ओर चल पड़े।
महल के मुख्य द्वार पर पहुँचते ही एक आवाज गूँजी—
“कामरति राज्य में आपका स्वागत है। यहाँ तुम्हारी परीक्षा इच्छाओं और आत्म-संयम से जुड़ी होगी।”
सागर और शांति ने एक-दूसरे की ओर देखा।
उन्हें समझ आ गया कि विलोम वन की अगली परीक्षा पहले की सभी परीक्षाओं से अलग होने वाली थी।
अध्याय 67 — राजकुमारी रति
कामरति राज्य के महल में प्रवेश करते ही सागर और शांति ने देखा कि पूरा सभागार फूलों और दीपों से सजा हुआ था। सामने एक राजसी युवती खड़ी थी।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“मैं राजकुमारी रति, कामरति राज्य की राजकुमारी हूँ। तुम दोनों का स्वागत है।”
सागर और शांति ने उनका अभिवादन किया।
रति ने दोनों को ध्यान से देखा और कहा,
“विलोम वन ने तुम्हारे रूप और मन में बहुत परिवर्तन किए हैं। लेकिन यहाँ की परीक्षा शरीर के बारे में नहीं होगी।”
शांति ने पूछा,
“तो फिर किस बारे में?”
रति ने उत्तर दिया,
“भावनाओं, इच्छाओं और आत्म-संयम की।”
उसने महल के बीच बने एक शांत कमल-तालाब की ओर संकेत किया।
“यहाँ तुम्हें अपने मन में उठने वाली भावनाओं को पहचानना होगा। किसी भावना को दबाना नहीं है, लेकिन उसके कारण अपने विवेक को खोना भी नहीं है।”
सागर ने गंभीरता से कहा,
“तो हमें अपने मन को समझना होगा।”
रति मुस्कुराई।
“बिल्कुल। और याद रखो—प्रेम, आकर्षण और स्नेह जैसी भावनाएँ अपने आप में गलत नहीं हैं। असली शक्ति यह जानना है कि उनका सम्मानपूर्वक सामना कैसे किया जाए।”
फिर उसने महल के अंदर एक सुनहरे द्वार की ओर इशारा किया।
“आओ। कामरति राज्य की पहली परीक्षा अब शुरू होती है।”
अध्याय 68 — पहली परीक्षा: आकर्षण
राजकुमारी रति सागर और शांति को कमल-तालाब के पास बने एक शांत कक्ष में ले गई।
रति ने कहा,
“यह कामरति राज्य की पहली परीक्षा है—आकर्षण की परीक्षा। यहाँ तुम्हें कई तरह के आकर्षण महसूस होंगे, लेकिन तुम्हें अपने विवेक को बनाए रखना होगा।”
कक्ष में हल्की सुगंध फैल गई और चारों ओर सुंदर दृश्य उभरने लगे। कभी राजसी महल, कभी सुंदर बगीचे और कभी ऐसे लोग दिखाई देने लगे जिनके प्रति सागर और शांति स्वाभाविक रूप से आकर्षण महसूस कर सकते थे।
सागर कुछ क्षणों के लिए उन दृश्यों में उलझ गया। फिर उसने आँखें बंद करके गहरी साँस ली।
“यह परीक्षा मुझे आकर्षण से भागने के लिए नहीं, बल्कि उसे समझने के लिए कह रही है।”
शांति ने भी स्वयं को संभाला।
रति ने कहा,
“सही। आकर्षण महसूस होना स्वाभाविक है; उसके प्रभाव में अपना विवेक खो देना अलग बात है।”
सागर और शांति ने अपने मन को शांत रखा। धीरे-धीरे सारे भ्रम समाप्त होने लगे।
रति मुस्कुराई।
“तुम दोनों ने पहली परीक्षा का पहला चरण पार कर लिया। अब अगला चरण तुम्हारी भावनात्मक समझ की परीक्षा लेगा।”
सामने एक नया द्वार खुला।
कामरति राज्य की परीक्षा अभी जारी थी।
अध्याय 69 — दूसरी परीक्षा: कामना पर नियंत्रण
राजकुमारी रति ने सागर और शांति को एक शांत कक्ष में पहुँचाया। वहाँ चारों ओर दीपक जल रहे थे और बीच में एक कमल के आकार का आसन था।
रति ने कहा,
“पहली परीक्षा में तुमने आकर्षण को पहचाना। अब दूसरी परीक्षा है—कामना पर नियंत्रण।”
सागर ने पूछा,
“इसका अर्थ क्या है?”
रति ने समझाया,
“कामना या इच्छा होना स्वाभाविक है। परीक्षा यह है कि इच्छा कितनी भी तीव्र क्यों न हो, तुम उसके कारण अपने विवेक और दूसरे व्यक्ति की इच्छा का सम्मान करना न छोड़ो।”
कक्ष में तरह-तरह के भ्रम दिखाई देने लगे। सागर और शांति ने महसूस किया कि उनका ध्यान बार-बार उन दृश्यों की ओर खिंच रहा है।
सागर ने आँखें बंद करके कहा,
“मैं अपनी इच्छा को पहचान सकता हूँ, लेकिन उसका गुलाम नहीं बनूँगा।”
शांति ने भी कहा,
“किसी भी रिश्ते में दोनों की इच्छा और सहमति सबसे जरूरी है।”
यह सुनते ही कक्ष की माया कमजोर पड़ने लगी।
राजकुमारी रति मुस्कुराई।
“बहुत अच्छा। तुमने समझ लिया कि आत्म-संयम का अर्थ भावनाओं को मिटाना नहीं, बल्कि उन्हें समझदारी से संभालना है।”
दोनों ने परीक्षा सफलतापूर्वक पार कर ली।
रति ने अगले द्वार की ओर संकेत किया।
“अब तुम्हारे सामने कामरति राज्य की अंतिम परीक्षा होगी।”
अध्याय 70 — अंतिम परीक्षा: स्त्री-पुरुष मिलन
राजकुमारी रति सागर और शांति को कामरति राज्य के अंतिम कक्ष में लेकर गई। वहाँ दो विशाल दीपक जल रहे थे—एक पर स्त्री और दूसरे पर पुरुष का प्रतीक बना था।
रति ने कहा,
“यह इस राज्य की अंतिम परीक्षा है। इसे स्त्री-पुरुष मिलन कहा जाता है। इसका अर्थ केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों के बीच प्रेम, विश्वास, सम्मान और सहमति का मिलन है।”
सागर और शांति एक-दूसरे के सामने खड़े हुए।
रति ने कहा,
“विलोम वन ने तुम्हारे शरीर और रूप बदल दिए हैं। अब देखना यह है कि इन बदलावों के बावजूद तुम अपने रिश्ते को कैसे समझते हो।”
सागर ने शांति का हाथ थामकर कहा,
“हमारे रूप बदल सकते हैं, लेकिन हमारे बीच का विश्वास हमारी अपनी पसंद है।”
शांति ने उत्तर दिया,
“और कोई भी रिश्ता तभी सच्चा होता है जब दोनों की इच्छा और सहमति हो।”
दोनों दीपक अचानक एक साथ जल उठे। पूरे कक्ष में सुनहरी रोशनी फैल गई।
राजकुमारी रति मुस्कुराई।
“तुमने कामरति राज्य की अंतिम परीक्षा सफलतापूर्वक पार कर ली। तुमने सिद्ध किया कि सच्चा मिलन केवल शरीर का नहीं, मन और विश्वास का भी होता है।”
महल का अंतिम द्वार खुल गया।
सागर और शांति अब विलोम वन के अगले रहस्यमय राज्य की ओर बढ़ने के लिए तैयार थे।
अध्याय 75 — सागर के हाथ का जादुई फल
कबीले में स्वागत के बाद सागर और शांति को मुखिया ने एक प्राचीन मंदिर में बुलाया। मंदिर के बीचोंबीच एक विशाल वृक्ष था, जिसकी केवल एक शाखा पर चमकता हुआ फल लगा था।
मुखिया ने कहा,
“यह विलोम फल है। इसे केवल वही व्यक्ति छू सकता है जिसने विलोम वन की सभी परीक्षाएँ पूरी की हों।”
सागर ने हाथ आगे बढ़ाया।
जैसे ही उसने फल को छुआ, उसके हाथ में सुनहरी रोशनी फैल गई। फल पर बने चिह्न चमकने लगे और पूरे मंदिर में हल्की घंटियों जैसी आवाज गूँज उठी।
शांति ने आश्चर्य से पूछा,
“क्या यह फल तुम्हारे बदलाव को वापस कर सकता है?”
मुखिया ने गंभीरता से कहा,
“इसकी शक्ति केवल शरीर बदलने की नहीं है। यह उस व्यक्ति को उसकी सच्ची इच्छा और सच्ची पहचान समझने में मदद करता है।”
सागर ने फल को ध्यान से देखा।
उसके सामने दो प्रकाशमय दृश्य उभरे—एक में वह अपने पुराने पुरुष रूप में था और दूसरे में अपने वर्तमान स्त्री रूप में।
सागर ने दोनों दृश्यों को देखा और कहा,
“मैं किसी एक रूप को केवल इसलिए नहीं चुनूँगा कि वह पुराना है या नया। पहले मुझे समझना होगा कि मैं वास्तव में क्या चाहता हूँ।”
फल की चमक और तेज हो गई।
मुखिया मुस्कुराया।
“यही सही उत्तर है। जादुई फल तुम्हें चुनाव की शक्ति देगा, लेकिन चुनाव तुम्हें स्वयं करना होगा।”
अध्याय 76 — सागर का निर्णय
सागर ने अपने हाथ में पकड़े जादुई फल को ध्यान से देखा। फल से सुनहरी रोशनी निकल रही थी।
मुखिया ने कहा,
“यदि तुम इसे स्वीकार करते हो, तो विलोम वन का प्रभाव समाप्त हो सकता है और तुम्हारा शरीर धीरे-धीरे तुम्हारे पुराने पुरुष रूप में लौट सकता है।”
सागर कुछ देर शांत रहा। फिर उसने फल को दोनों हाथों में थाम लिया।
“मैं अपने पुराने रूप में लौटना चाहता हूँ,” उसने दृढ़ स्वर में कहा।
जैसे ही उसने फल को स्वीकार किया, सुनहरी रोशनी उसके पूरे शरीर में फैल गई। विलोम वन के प्रभाव से हुए परिवर्तन धीरे-धीरे कम होने लगे—उसकी आवाज़ पहले जैसी होने लगी, चेहरे के नयन-नक्श पुराने रूप में लौटने लगे और उसका शरीर भी धीरे-धीरे उसके मूल पुरुष रूप में वापस आने लगा।
शांति उसके पास खड़ा रहा।
कुछ देर बाद रोशनी समाप्त हो गई।
सागर ने अपने हाथों और चेहरे को देखा।
“मैं वापस अपने पुराने रूप में आ गया।”
मुखिया ने कहा,
“हाँ, लेकिन याद रखो—तुम्हारे भीतर जो अनुभव और समझ पैदा हुई है, उसे कोई जादू वापस नहीं ले सकता।”
सागर मुस्कुराया।
“मैंने अपने पुराने रूप को वापस पाया है, लेकिन विलोम वन ने मुझे अपने बारे में बहुत कुछ सिखाया है।”
शांति ने कहा,
“और हमारी दोस्ती भी पहले जैसी ही है।”
दोनों मुस्कुराए।
सागर की विलोम वन की यात्रा आखिरकार एक नए मोड़ पर पहुँच चुकी थी।
अध्याय 77 — विलोम वन से विदाई
सागर ने आखिरकार अपने पुराने पुरुष रूप को वापस पा लिया था। अब वह विलोम वन से विदा लेने के लिए तैयार था।
कबीले के लोग उन्हें जंगल की सीमा तक छोड़ने आए। राजेश भी वहाँ पहुँच चुका था। इतने लंबे समय बाद अपने दोस्त को देखकर उसने सागर को गले लगा लिया।
“यार, तुम्हारी यात्रा तो किसी सपने जैसी थी!”
सागर हँसकर बोला,
“सपना नहीं, राजेश... लेकिन ऐसा अनुभव जिसे मैं कभी नहीं भूलूँगा।”
उसकी पत्नी शांति भी उनके साथ खड़ी थी। दोनों ने आखिरी बार पीछे मुड़कर विलोम वन को देखा।
घना जंगल शांत था। दूर विजय झरने की आवाज सुनाई दे रही थी।
मुखिया ने कहा,
“सागर, तुम यहाँ एक खोजी बनकर आए थे। लेकिन यहाँ से अपने बारे में बहुत कुछ जानकर जा रहे हो। इस वन का रहस्य किसी और को बताने से पहले सोच-समझकर निर्णय लेना।”
सागर ने सिर झुकाकर कहा,
“मैं इस वन और यहाँ के लोगों का रहस्य सुरक्षित रखूँगा।”
राजेश ने अपना सामान उठाया।
“चलो, अब घर वापस चलें!”
सागर ने शांति का हाथ थामा और राजेश के साथ जंगल से बाहर निकल पड़ा।
विलोम वन का विशाल द्वार उनके पीछे धीरे-धीरे बंद हो गया।
सागर ने आखिरी बार पीछे देखा और कहा—
“विदा, विलोम वन। तुमने मुझे बदलकर नहीं, मुझे समझाकर विदा किया है।”
तीनों आगे बढ़ गए।
उनकी लंबी यात्रा समाप्त हो चुकी थी—लेकिन सागर की जिंदगी की नई कहानी अब शुरू होने वाली थी।

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Discussion (2)

Maha
Maha 1 month, 2 weeks ago

Sister wonderful story....you have taken many references I think...The kingdom names is also great...you specified the kingdom names as per our feelings,person nature...super story sister...If you add pictures and you write as many parts the curiosity will increase...But mostly some of our sisters only like this story ..Becoz they are expecting the feminization parts, crossdressing feelings...But you keep on write this kind of stories....I loved this.... especially you story going in different way and the references I liked it....All the best sister...🤛

vidhya
vidhya Author 1 month, 2 weeks ago

thanks dear for your support i think u also must read the story of third gender i hope you like this one also

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