मीना एक सांगर्ष.

Savrali

  | March 24, 2026


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Part 1

​​दोपहर के दो बज रहे थे। चिलचिलाती धूप खिड़की के कांच को चीरकर अंदर आ रही थी। मुंबई के परेल इलाके की एक पुरानी चॉल के उस छोटे से कमरे में उमस इतनी थी कि सांस लेना भारी था। कमरे में तीन बिस्तर लगे थे। एक पर राहुल और दूसरे पर विक्की गहरी नींद में सो रहे थे, उनके खर्राटों की आवाज़ टीवी के शोर जैसी लग रही थी।
​मैं, जिसे दुनिया 'नीलेश' के नाम से जानती थी, अपने बिस्तर पर बैठा पुरानी फाइलों को देख रहा था। पर मेरा ध्यान फाइलों में नहीं, बल्कि विक्की के बिस्तर के नीचे दबे उस प्लास्टिक के छोटे से बैग पर था, जिसमें मैंने कल रात चुपके से एक सस्ती सी लिपस्टिक और एक जोड़ी नकाब (Wig) लाकर छिपाया था।​मेरा नाम नीलेश है, उम्र २५ साल। कद-काठी से मैं एक सामान्य नौजवान दिखता हूँ—साफ रंग, थोड़ी दबी हुई मूंछें और शांत स्वभाव। ऑफिस में लोग मुझे 'रिजर्व' या 'अंतर्मुखी' कहते हैं। मैं एक आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर डेवलपर हूँ। दिमाग लॉजिक और कोडिंग में चलता है, पर दिल... दिल किसी और ही लय पर धड़कता है। बचपन से ही मुझे लड़कों के खेल, क्रिकेट या शोर-शराबे से चिढ़ थी। मुझे रंगों, कपड़ों की सरसराहट और खुशबू से प्यार था। मैं एक ऐसा इंसान था जो अपनी ही खाल में अजनबी महसूस करता था ​मेरा ताल्लुक पुणे के एक बेहद रूढ़िवादी मध्यमवर्गीय मराठी परिवार से है। पिता जी रेलवे में थे—अनुशासन के पक्के और हाथ के थोड़े कच्चे। मां बेचारी घर की चारदीवारी में सिमटी एक सीधी-सादी महिला, जिनका काम बस सबकी सेवा करना था। मेरे दो बड़े भाई हैं, दोनों ही 'पक्के मर्द'—जिम जाना, लड़ना और औरतों को कमतर समझना उनकी फितरत थी।​बचपन में एक बार जब मां की साड़ी का पल्लू अपने सिर पर ओढ़कर मैं आईने में देख रहा था, तो पिता जी ने देख लिया था। उस दिन जो मार पड़ी थी, उसकी नीली निशानियां हफ्तों तक मेरी पीठ पर रही थीं।
​"मर्दों की तरह रहना सीख, वरना घर से निकाल कर हिजड़ों की टोली में छोड़ आऊंगा!"​पिता जी के वो शब्द आज भी मेरे कान में किसी तेज़ाब की तरह गिरते हैं। उस दिन के बाद से मैंने 'नीलेश' का मुखौटा पहन लिया, पर मेरे अंदर की 'मीना' मर नहीं पाई, बस वह गहरी नींद में चली गई थी।
​तभी राहुल की नींद खुली। उसने अंगड़ाई ली और मुझे घूरते हुए बोला, "अबे नीलेश! तू अभी तक सोया नहीं? ऑफिस की फाइलों में ही घुसा रहेगा क्या? चल, शाम को मैच खेलने जाना है, विक्की ने ग्राउंड बुक किया है।"
​मेरा गला सूख गया। "नहीं यार, मुझे थोड़ा काम है। और वैसे भी मुझे क्रिकेट पसंद नहीं, तुम लोग जाओ।"
​विक्की भी जाग गया था। उसने तकिये के नीचे हाथ डाला—वहीं जहाँ मेरा बैग छिपा था। मेरा दिल हलक में आ गया। धड़कन इतनी तेज़ थी कि लगा सीना फाड़ देगी।
"अबे ये क्या है?" विक्की ने बैग खींचते हुए पूछा।
​मैंने झपटकर उसके हाथ से बैग छीन लिया। "कुछ नहीं है! ऑफिस का सामान है, खराब हो जाएगा। हाथ मत लगा।"
​विक्की हंसने लगा, "अबे साले! इतना क्यों भड़क रहा है? कहीं अपनी गर्लफ्रेंड के लिए कुछ मंगाया तो नहीं? वैसे भी तू बड़ा छुपा रुस्तम है। दिन भर चुप रहता है, रात को क्या गुल खिलाता है?"
​राहुल ने चुटकी ली, "गर्लफ्रेंड? इसके नसीब में कहाँ! ये तो खुद ही लड़कियों की तरह शर्माता रहता है। इसके हाथ की कलाई देख, कितनी पतली है, जैसे किसी लड़की की हो।"
​दोनों खिलखिला कर हंसने लगे। उनकी हंसी मेरे कानों में नश्तर की तरह चुभ रही थी। मुझे नफरत हो रही थी इस कमरे से, इन लोगों से और अपनी इस बेबसी से। मैं खामोश रहा, पर अंदर ही अंदर आग सुलग रही थी।
​वह बड़ा फैसला
​उस शाम, जब वो दोनों मैच खेलने चले गए, मैंने कमरे को अंदर से कुंडी लगाई। आईने के सामने खड़ा होकर मैंने खुद को देखा। शर्ट-पेंट में एक बेजान नीलेश खड़ा था। मैंने अलमारी खोली और अपना वो किराए के घर का एग्रीमेंट निकाला जिसे मैंने कल ही साइन किया था।
​"अब और नहीं," मैंने खुद से फुसफुसाते हुए कहा। "अब नीलेश मरेगा और मीना जिएगी।"
​मैंने अपना सारा सामान—जो बहुत कम था—एक बैग में भरा। मेरी नौकरी अच्छी थी, बैंक में बैलेंस था। अब मुझे किसी की गालियां सुनने या छिपकर जीने की ज़रूरत नहीं थी। मैंने तय कर लिया था कि आज की रात मेरी इस चॉल में आखिरी रात होगी।
​पुरानी चॉल की वो सीलन भरी दीवारें और विक्की-राहुल की वो घटिया बातें अब बर्दाश्त के बाहर थीं। शाम के सात बज रहे थे। जैसे ही वो दोनों मैच खेलने के लिए निकले, मैंने अपना बैग उठाया। दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे कोई चोरी करने जा रहा हो।
​"साले कुत्ते... खुद को बहुत बड़ा मर्द समझते हैं," मैंने दांत पीसते हुए बुदबुदाया। उनकी वो गंदी गालियां मेरे कान में गूंज रही थी— 'हिजड़ा', 'जनाना', 'फट्टू'। "आज देख लेना, ये फट्टू अपनी दुनिया खुद बसाएगा।"
​मैंने टैक्सी पकड़ी और सीधे अंधेरी के उस नए 1BHK फ्लैट की ओर निकल पड़ा। टैक्सी की खिड़की से आती हवा मुझे छू रही थी, पर मुझे लग रहा था जैसे वो मेरे चेहरे से 'नीलेश' का नकाब उतार रही हो।​फ्लैट का दरवाज़ा खोलते ही एक अजीब सी शांति मिली। यह घर छोटा था, पर यहाँ विक्की की सड़ांध नहीं थी, राहुल का उपहास नहीं था। यहाँ सिर्फ मैं था। मैंने हफ़्तों पहले ही यहाँ कुछ ज़रूरी सामान भिजवा दिया था—एक बड़ा ड्रेसिंग टेबल, मखमली परदे और एक बंद अलमारी।
​मैंने बैग पटका और सीधे अलमारी की ओर झपटा। कांपते हाथों से ताला खोला। अंदर सलीके से टंगे थे—चमकते हुए रेशमी अंतःवस्त्र (Lingerie), साड़ियाँ और मेकअप का ढेर।
​"अब देख नीलेश, तू कौन है," मैंने खुद से कहा। शर्ट के बटन खोलते वक्त मेरी उंगलियां थरथरा रही थीं। वो मर्दानी शर्ट फर्श पर ऐसे गिरी जैसे कोई बोझ उतर गया हो।​सबसे पहले मैंने वो काली लेस वाली ब्रा और पेंटी निकाली। उसे पहनते ही जो कसावट महसूस हुई, उसने मेरे बदन में बिजली दौड़ा दी। आईने में देखा, तो वो सपाट सीना अब उभरा हुआ लग रहा था (पैडिंग की मदद से)। मैंने अपनी कमर पर हाथ फेरा, "हाय... कितनी कोमल लग रही है ये त्वचा।"
​फिर मैंने एक पारदर्शी, सिल्क की मैरून नाइट गाउन पहनी। उसका कपड़ा जब मेरी जांघों से टकराया, तो रोंगटे खड़े हो गए। अब बारी थी चेहरे की। मैंने फाउंडेशन लगाया, कंसीलर से उन दागों को छिपाया जो 'नीलेश' की पहचान थे। आंखों में गहरा काजल और मस्कारा लगाते ही मेरी नजरें ही बदल गईं। अब उनमें वो डर नहीं था, बल्कि एक नशीली चमक थी।
​अंत में, मैंने वो गाढ़ी लाल लिपस्टिक उठाई। होंठों पर उसे फेरते वक्त मुझे ऐसा लगा जैसे मैं खुद को चूम रही हूँ। आईने में अब नीलेश नहीं था... वहां 'मीना' खड़ी थी। एक ऐसी औरत जो अपनी आज़ादी की आग में जल रही थी।
​वह बेकाबू आग (The Intense Desire)
​तैयार होने के बाद मैंने लाइट डिम कर दी। कमरे में मद्धम संगीत बज रहा था। आईने में खुद के इस रूप को देखकर मेरे अंदर एक ऐसी आग भड़क उठी जिसे मैंने सालों से दबा रखा था। वो सिर्फ वासना नहीं थी, वो अपनी पहचान को पूरी तरह अपनाने की एक तड़प थी।
​मेरे हाथ खुद-ब-खुद अपनी देह पर रेंगने लगे। नाइट गाउन के ऊपर से ही मैंने अपने स्तनों को सहलाया। "उफ़... मीना, तू कितनी हसीन है," मेरी आवाज़ अब भारी नहीं, बल्कि एक कोमल फुसफुसाहट बन गई थी।
​तनाव इतना बढ़ गया था कि रहा नहीं गया। मैं बिस्तर पर लेट गई। गाउन को थोड़ा ऊपर सरकाया। अपनी रेशमी पेंटी के ऊपर से ही मैंने खुद को महसूस किया। पर वो काफी नहीं था। सालों की घुटन, वो गालियां, वो अपमान... सब एक चरम सुख (Orgasm) में तब्दील होना चाहते थे।
​मैंने करवट ली और अपनी एक उंगली को अपने शरीर के उस हिस्से की ओर ले गई जहाँ से अक्सर मुझे 'अपवित्र' होने का अहसास कराया गया था। जैसे ही उंगली ने स्पर्श किया, मेरे मुंह से एक लंबी आह निकली। "आह... कोई देखे मुझे... कोई बताए कि मैं कितनी सुंदर हूँ।"
​मैं खुद की ही उंगली के दबाव के साथ एक अलग ही दुनिया में खोने लगी। वो सन्नाटा, वो खुशबू और मेरा अपना स्पर्श। धीरे-धीरे मेरी सांसें तेज होने लगीं। पसीना मेरे माथे से रिसकर गर्दन तक जा रहा था। हर एक हरकत के साथ मुझे लग रहा था जैसे मैं उन विक्की और राहुल जैसे 'मर्दों' के मुंह पर तमाचा मार रही हूँ।​"मैं औरत हूँ... मैं पूरी तरह औरत हूँ!" चिल्लाने का मन था, पर आवाज़ दबी हुई थी। शरीर कांपने लगा और अंत में एक गहरे सुकून के साथ मैं निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ी। आंखों से दो बूंद आंसू निकल आए—खुशी के आंसू।​उसी हाल में, आधे खुले गाउन और बिखरे हुए मेकअप के साथ, मुझे कब नींद आ गई पता ही नहीं चला। उस रात मैं पहली बार चैन से सोई थी, क्योंकि उस बिस्तर पर नीलेश नहीं, 'मीना' सो रही थी।.......


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